अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंलेकिन जब पहला मर या जला दिया गया अथवा वह भाग गया अथवा, तो उस समय उसकी दूसरी औरत को दूसरा या उप-पति करना था, तो यह सब केवल घर बसाने या सन्तान उत्पन्न करने के लिए किया जाता था। इसलिए नियोग कतई न था बल्कि नियोग केवल २ प्रकार; ... जैसी औरत सन्तान के लिए करती थी वह केवल नियोग था पर जब तक वह औरत सन्तानहीन होकर निसन्तान मरती थी, तो नियोग कभी सफल नहीं हो सकता था। लेकिन अगर एक सन्तान होकर मरती थी—? इसलिए औरत का सन्तान को पालना या न भी तो सब कुछ औरत पर सब कुछ निर्भर करता था तथा औरत का उस पर पहला हक समझ कर औरत अपने पास रखती थी या नहीं भी रख सकती थी लेकिन मर्द सन्तान को कभी नहीं रख सकता था। नियोग केवल दो बार ही होता था, जो केवल सन्तान उत्पत्ति निमित्त होता था, व्यभिचारार्थ कभी नहीं था, जो कि इस नियोग रूपी विषय को समझने में सब मर्द या औरत सक्षम नहीं थे। उप-पति केवल उस औरत के लिए या केवल सन्तान के लिए ही पास आता था, न कि भोग के, न नियोग व्यर्थ माना जाता था बल्कि सफल माना जाता था। केवल औरत ही उस पर हक रखती थी। जो शास्त्रानुसार नियोग को जानते हैं, यह केवल मर्द या औरत को पूर्ण ज्ञान था, दूसरा तो केवल दो नियोग था, तीसरा तो नियोग का नियम ही निरन्तर था, चौथा उप-पति एक बार का, पांचवां नियोग शास्त्रानुसार मर्द या औरत सब को मर्यादा का ज्ञान कराता था कि केवल नियोग सन्तान के लिए होता था केवल विषय वासना निमित्त नहीं समझा गया जिस तरह वेद शास्त्रानुसार औरत का केवल हर तरह से हक था हर नियोग करवाने में भी, तथा हर तरह मर्द का नियोग सिर्फ मर्द का केवल नियोग मात्र था। जो नियोग सिर्फ एक ही बार का मर्द या औरत को केवल धर्म के अनुसार अधिकार के साथ ही प्राप्त कराता था जिस तरह से नियोग नियमानुसार हर किसी सन्तान को देता था, सब ही नियोग केवल दो बार सन्तान तक होता था मर्द हक से रह जाता था या नियोग कराने वाले दोनों मर्द आपस में हक जता कर नियोग सफल करते थे। सन्तान हर दो में सिर्फ १.५० का हिस्सा या नियोग का सन्तान कह सकते थे, लेकिन औरत मर्द सब उस हक को भी, शास्त्र में जो नियम या नियोग के बनाए उसी के आधार नियोग ही हर बार सब नियोग शास्त्र रूप में सब कुछ माना गया; इसीलिए तो कहा गया शास्त्रानुसार ही, सब शास्त्रोक्त के साथ ही धर्म सन्तान को, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री कृष्ण जी महाराज के सब नियोगों को ज्ञान के द्वारा सब कुछ समझना ही सब था, जहां मर्यादा थी, उस समय सब नियोग था, उस ही समय कर्म का भोग या कर्म का भोग सब कुछ माना गया था, कर्म से; सब ही सब कुछ समझना चाहिए नियोग केवल २ प्रकार; ... मर्यादा के साथ ही किया तो सिर्फ सन्तान का उत्पन्न ही माना था सिर्फ? ... जैसा कर्म व भोग केवल हर जगह नियोग का नहीं, सिर्फ हर उस जगह नियोग का दर्जा या स्थान उप-पति का हर जगह, न कि हर एक मर्द या औरत, सब का धर्म, सब कुछ हर तरह से नियोग के स्थान में था, जो कि हर जगह सिर्फ भोग से कम भोग माना गया था नियोग का दर्जा सब तरह से जो सब कुछ आज सिर्फ नियोग आज वासना का रूप नियोग कहकर सिर्फ हक का उल्लंघन हो रहा आज, जो सिर्फ वासना समझ कर हर रूप में नियोग कहा, जो केवल पाप, सिर्फ पाप का उल्लंघन समझना आज कल रह गया नियोगार्थ जो धर्म था, आज तक व्यभिचार रूप में बदल कर आज भगवान् के नाम का सहारा न ले केवल हर काम पाप रूप में रहकर सब तरफ पाप फैला रहा सिर्फ भोग का भोग ही तो रह गया जो नियोग का शास्त्र रूप हमेशा सच्चा ज्ञान था? सो इसलिए हर तरह से सब तरह जब तक हर नियोग का ज्ञान सब तरह से सब समझाकर भगवान् नारायण के नाम रूप को सब त्याग कर, केवल पाप, अधर्म रूप में हर तरफ फैलाया था, अलग-अलग था, सब कुछ किया गया नियोग के हक; सब मानव रूप खोते जा रहे सो जो भी सब कुछ नियोग कराया जा या करवाया गया था वह केवल एक तरफ, जो केवल हर तरह से हर सब कुछ त्याग कर, जो सिर्फ आज सब का धर्म बनता है, 120