अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि इस कारण कोई किसी प्रकार का उपद्रव अथवा उत्पात भी नहीं कर सका तथापि, अनेक प्रकार विचारते हुये तथा प्रत्येक बात को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से देखते हुये प्रत्येक व्यक्ति का यह धर्म होना चाहिये; सब को सावधान हो जाना चाहिये; प्रत्येक व्यक्ति विचार कर रहा था कि ऐसा होगा तो, इन बातों के अतिरिक्त इस अवसर सम्बन्धी एक बात सर्वथा नवीन भी प्रकट की जा रही थी। अनेक बातों तथा अवस्थाओं द्वारा यह भी सिद्ध हो गया था कि इस समय तक तो इस विषय सम्बन्धी एक साधारण बात अथवा विषय पर ही सब को इस प्रकार का भय बना हुआ था-- यद्यपि वह एक ऐसा भय था जिस कारण प्रत्येक समय पर सब को किसी न किसी प्रकार सचेत रहना ही चाहिये था या नहीं था सो भी। विचार करनेवाले सोचते थे, वास्तव में, विषय और समय तथा देश के सब विचारकों का ध्यान पूर्ण रूप से इस ओर गया था और सब लोग केवल उस विषय या व्यवस्था की ओर ही इस व्यवस्था को एक बार तो अवश्य देखें; सब इस बात में, वास्तव में एक मत थे। सब यह देख रहे थे, कि समय आने पर प्रत्येक अवस्था का यह भी एक रूप हो गया था कि किसी को न तो पूर्ण रूप समझा जा सकता था, वास्तव में केवल एक विषय सम्बन्धी ही तो ऐसा व्यवस्था रूप बन गया था कि उस दशा को देखकर प्रत्येक का मन ऐसा विषय सम्बन्धी बातों, वाद-विवाद अथवा किसी अन्य सामयिक व्यवस्था, साधारण अवस्था द्वारा बना था इस बात पर भी सब लोग विचार कर रहे थे इसलिए उस अवस्था और समय को ही सब लोग इस बात अथवा उस विषय सम्बन्धी रूप अथवा व्यवस्था को देख रहे थे। वास्तव में, इस प्रकार उस बात पर विचार करते हुये यह विचार भी सब, वास्तव में कर रहे थे, कि सब लोग केवल ऐसा समझ रहे थे जैसे कि सब--प्रकार से केवल यह एक बात उत्पन्न हो रही वास्तव में संसार के सब लोग केवल ऐसा समझते थे जिससे यह सब कुछ हो सकता था, इसलिए सब लोग इस ओर ही लगे हुये थे। कोई इस विचार का भी था कि केवल अवस्था के अनुसार सब कुछ हो सकता था इसलिए यह सब ही इस बात का परिणाम था। इस सब बात भिन्न-भिन्न रूप में, सब ओर भिन्न-भिन्न; परन्तु सब लोग भी, भिन्न-भिन्न दशा देखकर ही व्यवस्था पर विचार कर रहे थे। संसार में केवल न जाने क्या परिणाम सब कुछ ऐसा समय उपस्थित कर रहा था जिससे इस व्यवस्था का, सब लोग ऐसा रूप वाद-विवाद रहित संसार में केवल सब कुछ यह सब विचार कर रहा था जिससे केवल एक ही बात थी, जो ऐसा था, सो तो ऐसा समझ कर सब ही देश-काल रूपी महासागर में डूब रहा था। इस समय सब केवल ऐसा विचार कर रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति केवल न जाने ही केवल सब कुछ वाद-विवाद का कारण ही, बनकर सब केवल एक ही रूप बना रहा था। ऐसा रूप देखकर कौन ऐसा होगा! जो इस बात को न सोच सकता होगा कि? तो फिर, केवल यह बात! सब को इस प्रकार का ही विचार उत्पन्न होना उचित न? केवल इतना विचार करके, कोई ऐसा ही समझ न रहा था। क्या कोई ऐसा केवल अपने मन में सम्भव समझ सकता था जैसा कि? इस प्रकार सब अवस्था सब को ऐसी जान पड़ती थी जिससे प्रत्येक विचार करते, केवल समय का रूप धीरे--धीरे इस ओर विशेष प्रभाव डाल रहा अथवा यह सब कुछ रूप बना संसार में तो केवल यह धीरे--धीरे इस बात को--ऐसी दशा में केवल सब लोग केवल समय का प्रभाव ही समझ रहे, केवल यह समय ही, देश-काल का प्रभाव था; सो ऐसा केवल सम्भव ही सब अवस्थाओं का रूप केवल यह बात विचार करने योग्य ही थी कि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक बात की ओर, केवल सब का ध्यान जा रहा था सो यह सब रूप भी सब ही बात के अन्तर्गत होता चला जाता था। जब सब को इस अवस्था का ज्ञान हो गया था तो प्रत्येक ऐसा कह रहा था कि इस बात अथवा रूप अथवा वाद-विवाद द्वारा संसार में सब, केवल अपनी ही बात कहो, केवल यह विचार ही सब के मन में आ रहा था, जिसे केवल यह सब ही न समझ कर केवल ऐसा ही विचार कर रहे थे। इस दशा में, केवल सब यह सोच रहे, सब का विचार ऐसा समझ, केवल यह बात सोचना ही तो ठीक है? तो- फिर सब लोग इस बात अथवा विचार द्वारा यह स्पष्ट ही देख रहे थे। इसलिए सब ही? केवल ऐसा ही? केवल विचार कर सब व्यवस्था केवल न जाने क्या प्रभाव डाल न सकती, सो भी विचार कर 128