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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 183 में से

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इसके बाद सत्यसंकल्प श्रीरामचन्द्र जी बिना ही भय के सब ओर बाण बरसाकर स्थित रहे, पर मेघनाद के सामने न गये। यद्यपि वे सबल थे, तथापि जो अपने भक्त, दास, या प्रिय का वचन, मान वा प्रण हो उसे, कभी मिटाया वा, कभी तोड़ा नहीं करते इसलिये उस समय मेघनाद के उन अस्त्रों का निरादर करके स्वयं घायल हो गये वा, घायल होने का ढोंग; रच दिया, जो सब संसार इनके बाणों चलाये से डरता, सो स्वयं घायल हो लक्ष्मण सहित मूर्च्छित पड़ गये। इन सब को मूर्च्छित देख उस दुष्ट मेघ ने न जाना विचरकर इनको बाण मारे थे, श्रीरामचन्द्र जी सब कुछ सह--लिया पर जब मेघ उस दुष्ट का बाण अपने सुकुमार श्री अङ्ग पर लगा, तनिक भी नहीं चलायमान हुए। मेघनाद तो सब ओर बाणों; को छोड़ कर हँसने लगा, मेघनाद को श्रीरामचन्द्र जी पर बाण बरसाने से आनन्द बहुत ही हुआ था, पर मन मार कर रह ही तो जाता था। सच तो यह, कि मेघनाद के बाणों द्वारा न श्रीराम मारे गये और न लक्ष्मण। मेघनाद इन दोनों भाइयों को बाणों द्वारा नहीं मार सकता था॥ सब ओर से बाणों द्वारा श्रीरामचन्द्र जी को घायल कर मेघनाद तो यह समझ गया, श्रीराम लक्ष्मण दोनों मारे गये। रावण को भी मेघनाद सब समाचार जा कहेगा, पर मेघनाद इस बात का भेद न जानता था कि श्रीराम बाण, केवल अपने घायल होने का स्वांग--रचा था। सब वानर बड़े दुखी हुए, मेघनाद प्रसन्न हो कर अपने घर चला गया। सुग्रीव, अङ्गद, नल, नील आदि, बाण लगने से व्याकुल तो थे ही, फिर मेघनाद के चले जाने पर यह सब श्री राम लक्ष्मण के पास आये। श्रीरामचन्द्र जी बाणों के लगने से अपने को अचेत सा दिखाते हुए पड़े थे, लक्ष्मण जी मेघनाद द्वारा नाग पाश में बंधे थे, वानर व्याकुल थे; विभीषण, जो अपने साथ में ले कर विभीषण के मन्त्रियों को साथ लंकापति मेघनाद चला था, मेघनाद द्वारा इन सब को नाग पाश से छुड़ाने के उपरान्त सुग्रीव अपने पास लंकापति विभीषण को, बैठा कर श्रीराम जी के पास विभीषण जी बाणों द्वारा स्वयं को भी घायल हुआ तो भी विभीषण सब को, समझाते थे, सब रोते थे, इस विपद् में धीरज धर कर श्रीरामचन्द्र जी को देखते थे। इन सब का मन यह न था कि श्रीराम लक्ष्मण को इस दशा में छोड़ कर लंका में वानरों को भेज दिया जावे। विभीषण, सुग्रीव, अङ्गद, नल आदि सब श्रीरामचन्द्र जी के पास बैठे हुए सोच विचार रहे थे, इतने में ही मेघनाद ने जाकर रावण को समझाकर कहा कि अब न श्रीराम बचे, लक्ष्मण ही मेघनाद ने, इन दोनों भाइयों को, बाण मार कर रण भूमि में ही गिरा दिया है। यह सब समाचार सुन कर रावण बहुत ही प्रसन्न हुआ और फिर मेघनाद को शाबाशी दी, पर स्वयं गया, यह देखने के लिये कि श्रीराम लक्ष्मण बच न जावें और वानर क्या दशा कर रहे हैं॥ मेघनाद का हाल सुन कर लंका भर में आनन्द मनाया गया, रावण उस ही समय रथ सजा कर, राक्षस अपने साथ ले लंकापति; श्रीराम जी, को देखने चला॥ श्रीरामचन्द्र की मूर्च्छा पर विलाप श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण दोनों ही बाणों से घायल थे, उधर सब के सब वानर दल श्रीरामचन्द्र जी सम्मुख रोने लग गये। सब ओर चिन्ता व्याप गयी, सब शोक में निमग्न थे; उधर रावण, भी देखने को; आ गया था कि क्या हो गया है। त्रिजटा राक्षसी को ले साथ में सब सीता जी को विमान में बिठाकर रण स्थल दिखलाने को लाया; सब वानर तो रोते थे। कैसा था वह समय? कैसा था वह दुःख का समय? वह शोक; सब वानर तो लंका को भूल? श्रीरामचन्द्र अपने पास थे, जिनकी गोद में लक्ष्मण पड़े छटपटाते थे। सो उन को भी होश न था! सब की यह दशा हो रही थी श्रीरामचन्द्र स्वयं बाण लगाये हुए तो अचेत दिखलाई पड़ते थे। सीता जी क्या न रोतीं? सब ही शोक में डूबे हुए थे। जब इन सब को शोक में डूबा देखा तो सब ही रोने लगे। सब यह कहते थे कि हमारे सब दुःख अब कैसे दूर हो सकेंगे? हमारे सब सुख तो श्रीरामचन्द्र से ही थे। अब दुःख का अन्त कैसे होगा? श्रीरामचन्द्र जी बाण खाये पड़े हैं, सो वे कब उठेंगे।

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