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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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जायेगा; विचारवान् पुरुष इसे दूर हटायेंगे व इसका सेवन कर प्रतिष्ठा को खो बैठेंगे या अयोग्य स्थान, समय, रीति अपनाकर सब कुछ खो न बैठेंगे। ऐसा देश-काल का प्रभाव विशेष हो सकता है अथवा यह भी सम्भव है कि इस योग मार्ग को सदा सब जन सर्वव्यापक नहीं बना सके। इसमें अपनी ही शक्ति सहायता दे सकती है; अन्य साधन तो बाह्यबल देते हैं जिससे यह प्रकट रूप सदा चमकता रह सके। हाँ, विचार शक्ति का उदय तो प्रत्येक में हो रहा, तब इस योग साधना द्वारा परम लाभ उठा सकेंगे। इसमें सन्देह ही क्या रहा कि यह विद्या साधन केवल जीवन को सुखी और उच्च बनाने भर के लिये नहीं साधन की गई थी वरन् परम आनन्द स्वरूप में लीनतादि के पद को भी इसी द्वारा प्राप्त किया जाता है, मुक्ति को भी इसका ही, या राजयोगादि का केवल ही साक्षात्कार से उत्पन्न न माना जाय तो भी इसका अभ्यास अवश्य ही उस उच्च स्थान आनन्द स्वरूप में पहुंचाने में सहायक तो माना ही जाय तथा इसमें भी सन्देह क्या रहा, अतः किसी भी उपाय इसका प्रचार जन समाज में होना ही चाहिये, चाहे किसी रूप अथवा साधन द्वारा ही क्यों न किया जाय, सदा काल में इस प्रकार का ही यत्न आवश्यक हो रहेगा, देश-काल के प्रभाव गुण-दोष, परिस्थिति, भाव का विचार--जो प्राकृतिक रूप से सब पर न्यूनाधिक रूप में होता रहेगा, अवश्य किया जाये; परन्तु योग पर इसका प्रभाव पड़ता ही जाता है, यह समझ कर छोड़, त्याग ही दिया जाय वा यह समझा जाय कि केवल प्राचीन काल के ही जन इस योग्य थे तथा अब तो देश-काल ऐसा विपरीत आया कि इसका नाम मिट जाय। यह विचार उन लोगों का हो गया प्रतीत होता है जो अपने आपको ही केवल विचारवान् मान अन्य साधारण जन तथा वर्तमान परिस्थिति सम्बन्धी आवश्यकताओं आवश्यकताओं को, अकारण विचार बैठते इस अज्ञानता युक्त विचार जनित प्रभाव के कारण प्रचार बन्द प्रायः रहा...। जब कि यह साधन ही ऐसा प्रभाव रखता है कि मन को वश में रखने के उपयोगी उपायों व अन्य सिद्धियों का देश-काल विशेष प्रभाव अवश्य-विशेष ही इस पर असर करता है, देश-काल ही तो सब कुछ नहीं करा-सकता तो फिर यह ही विचार क्यों न; देश-काल जैसा भी समय आ जाय मन--इन्द्रिय का योग, उनका ही यत्न रूप में प्रभाव रखता ही रहेगा केवल स्वरूप भेद ही हो रहा हो इस प्रकार विचार होना ही ठीक समझा जा सकता था परन्तु सब दशा को सदा समान न पा वा समझने में समर्थ न होने का कारण यह रहा व अन्य लोग भी भ्रम में पड़ गये वा पड़ते रहे कि केवल या कुछ विशेष ही इसका लाभ उठा सके वा, सब का अधिकार न मान कर भ्रम उत्पन्न कर अभ्यास को आवश्यकता से अधिक कष्ट साध्य, असाध्य, असम्भव माना वा इसका प्रचार बन्द करना आरम्भ किया वा हो गया कि यह योग सब का काम ही नहीं रहा वा हो सकता था इस लिये जन समाज में से यह लुप्त होता चला गया, वा इस प्रकार की दशा में पड़ा रहा कि बहुत कुछ जन भ्रम जन अविश्वास युक्त विचार को ही सब कुछ मान, इसे कष्ट, क्लेश का ही घर समझ बैठे जिसका परिणाम अन्त में, जो हो गया वही न था। हां, केवल राज योग साधन के प्रचार का फल यह हुआ कि कुछ न कुछ साधन बचा रहा वा इस देश-काल विशेष में काम कर सका; यदि ऐसा भी न हो तो सब कुछ नष्ट हो--गया ही समझा जाता, वा समझना पड़ता तो इस पर विचार करने से भी तो, विचार शक्ति को बल प्राप्त हो ही सकता है। केवल यह हठ योगीय अंग इस से दूर हो गये थे। इसका एक परिणाम सदा ही देखने आया कि, किसी भी परिस्थिति का प्रचार बन्द करा देने से अथवा साधन न कराने व रुकावट डालने से यह तो हो सकता रहा जिससे उस का नाम भी न रहे परन्तु विद्या तो विद्या, रस तो रस रहा; साधन ही तो जन का साधन व आनन्द प्रदान कराने के ढङ्ग को फेर--बदल सकता सम्भवतः था। 145