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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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यह भी तो सब जानता हुआ कि सब कार्य विनाशीक हैं, पर यह सब कुछ करता रहता है, जिसे कि यह कुछ समझ रक्खे कि भला ऐसा करनेके पश्चात् तो मैं सुखी होऊँगा अर्थात् न सुखीके पश्चात् कभी कोई दुःख ही न होगा ऐसी समझ, जिसे पक्की हो वह संसारी जीव भले ही भोगों का संग्रह करे अथवा, पर ऐसा कोई भी तो यहां पर सुखी नहीं! जिस किसी भी विषय का भोग करो; चाहे वह बड़ा सुख ही हो पर अन्त उसका दुःख अथवा दुःख रूपी फल लिये ही--तो फिर व्यर्थ अपने सच्चे स्वरूप को भूल संसार के इन मिथ्या सम्बंधों की ही चाट में क्यों लग कर न केवल, पर जीवन को निष्फल करता हुआ सब कुछ इसी तरह नष्ट करके पश्चात्ताप स्वरूप नरक आदि योनियोंके सख्त दुःख भोगने तय्यार हो रहा है यह सब कुछ न हुआ तो क्या हुआ जो कि इस जीव ने अपनी इस आयु, या समय का सदुपयोग न कर अपने जीवन व जन्म दोनों नाश कर दिये तो इस जीव को क्या लाभ हुआ जो कि इस तरह सांसारिक पदार्थों में ही सारा दम भर रहा कि जिन्हें अपने साथ नहीं लेजा सकता था परन्तु संसार से उलटा भारी पापों रूपी-गठरी अपने सिर लादकर जो अगले जन्म रूपी-नये सफर में भयानक दुःखदायी हो, जिससे कि, जिससे बच कर ही आगे सुख मार्ग पाना बनता था, सो वैसा तो न बनाकर या विचार कर उस तरफ कदम उठाया वरन और ही पथ तय करने लगा जो विषय कि सब तरह दुखदायी ही सिद्ध, जब अज्ञानता से ही संसारी पदार्थों रूप या सांसारिक ही यह सर्व सुखी है? सो इस का क्या कोई सच्चा या भला फल अथवा लाभ यह समझ कर ले रहा है कि जिसका अन्त ही सब का सब ही, फिर अज्ञान होकर अपनी वर्तमान अवस्था को क्यों न सोच समझ कर ही तय कर आगे बढ़ना योग्य था। सो जो विचारवान् विवेकशील है वह सब इस सब सांसारिक या प्रपंच रूप जगत, अज्ञानियों के, सो जो इन सब बंधनों रूप या माया जाल आदि से बचकर अपने निज आत्म स्वरूप का ज्ञान करके अपने स्वरूप को समझ, सच्चा ही आनन्द पद प्राप्त करके स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर अपना जीवन सफल कर इस संसार से जन्ममरण पीड़ा से सदाके वास्ते ही छूट कर सुखी बन जाता है क्योंकि न यहां का संसार का पदार्थ ही सच्चा व सुख देने वाला; जैसे कि, बालू रेतकी भीत; जैसे ओले, जिन का कि, नाम भर ही सब कुछ ही देखने मात्रका; फिर उस संसार के सम्बंध व रूप रूप--का जो सम्बंधी सम्बंधी ही बनता है सो सब आगे जाकर दुःखदायी सिद्ध होता हुआ जो कोई भी तो नजर नहीं आता कि, ऐसा भी है? सम्बन्धी है? उस रूप-सम्बन्धी है? माता-पिता सम्बन्धी या अन्य कोई; इस पर कौन? आज जो अपना बनता है, कलको वही उस का दुश्मन हो जाता रूप बन, या अपना ही अपना रूप बन, जो आज अपना तो कल ही दुश्--मन का रूप बन? सम्बन्धी है? माता-पिता कौन या कैसा? कैसा पिता और कैसा सम्बन्धी रूप है, अपना रूप ही तो सब का सब हुआ? सो संसार तो सिर्फ इस माया प्रपंच अथवा सब धोखे की खान अथवा छलका ही तो रूप बना हुए सब इस तरह के प्रपंच का सम्बंधी, अपने बस का, अपने वश का होने पर ही तक, अपने तक सदा साथ निभाने या सम्बंधी बन कर नहीं रह सकता है सिर्फ एक काम-चलाऊ दशा ही, उस तरह सम्बंध का काम रहा, जिसे कि सब इस के लिये अपना सब कुछ तन मन धन से भी नष्ट करके अंत समय अपने को--इस निपट मूर्ख अज्ञानता स्वरूप बना कर ही सब तरफ से न केवल खाली हाथ, मन्द किस्मत, भारी अपराधी, सजा भुगतने योग्य ही उस मालिक प्रभु की ओर गया संसार के सम्बंधों से जो विवेकशील जन सो तो सम्बंध तो रख कर भी इन का मोह त्याग कर के, अपने कर्त्तव्य पालन रूप में रख कर ही सत्य को, अपने निज आत्म रूप को ही जानने व साधन करने में लगा, सांसारिक सुख-साधन के सब साधन को भी करता, पर अनासक्त रूप सब को न तो सब का समझ अपना रूप में ही समझ सबमें परमात्मा स्वरूप व एक रस ही परमात्मा सत्ता को व्यापक रूप में जाना; इसलिये सांसारिक पदार्थों काज या काम न ही तो उनका त्याग ही किया सांसारिक सब काम को करता हुआ संसार से इस तरह से; मन ही मन समझ कर ही सब व्यवहार से दूर ही दूर रहता हुआ अपना सच्चा सुख, स्वरूप जो अपने मन को अपने निज आनन्द स्वरूप में, अपने सत स्वरूप रूप परमात्मा के साक्षात्कार साधन से ही पाना बना, 168