भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 183 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180

पाप को छोड, परमात्मा संग प्यार कर, परमात्मा ही सच जान सब से बढ़ कर। विचार ऐसा कर के अन्तर मेल नाश हो कर परमात्मा के दर्शन रूपी फल पावे गा, जिस फल प्रभाव पापों का क्षय लग कर परमात्मा का प्रेम उपज कर अन्तर का सब विकार भाव नाश रूप भानवे। अब तो तू समझ कर विचार ऐसा हृदय धार जो संसार रूपी भ्रम से सच कर, आप अपना काज खो कर जो तूने कर्म से परमात्मा रूपी अमृत रूपी खजाने को बन्द कर के छोड़े? अज्ञाना प्रगट रूपी अज्ञान रूपी पाषाण पर, जो प्रकटाया गया जब तक मन का फेर, ना तो अन्तर ज्ञान हो सका; संसार का काम कर, सब जगत भर का भार सिर पर लेकर तो क्या फल पा सका मन के फेर, प्रगट कर, जो अज्ञानता संशय रूपी है? क्या तो मिला? क्या हाथ लगा? सब-तो खाली चला गया जो तू कुछ काम न कर सका जो अन्तर का फेर था सो तो न मिटाया पर और ही विचार किया, जिस कर के सब मन के भ्रम का फेर मन विकार संशय रूप में लग कर जो जीव के विचार न लग कर सब का सब, ना कुछ हाथ लग सका, अज्ञानता ही तो हाथ रही? जिस को ज्ञान रूपी फल अन्तर का दर्शन पा कर सब काम से खाली हो--ना अज्ञाना फल जान कर विचार से काम करे; जिस के घट का भ्रम ज्ञान रूपी काम से नाश हो कर अन्तर रूपी ज्ञान का दर्शन हो, सो सब से बड़ा है, जिस के अन्तर दया भाव का ज्ञान हो कर दया, उपकार रूपी नाम को जान कर सब दया रूप में सब को एक भाव से सब का काम करने से जाने सो। ना कुछ कर, ना मन के फेर से अज्ञानता कर, देख तो, सब को जान, ना भरम हो--जिस मन के अज्ञान रूपी संशय अज्ञानता विकार को त्याग कर विचार तो कर जो अन्तर दया रूपी रूप का ज्ञान दाता अन्तर रूप दया कर, ना तो अन्तर दया रूप का ज्ञान; अन्तर ही तो दया रूपी ज्ञान का फल दया रूप, दया ही तो दया रूपी? सब का भला जो सब रूप सब रूप का दाता--ना संशय कर न मन फेर; अन्तर ही जो दया रूप सब का भला? संशय त्याग के सब में घट दया रूप संशय भ्रम अज्ञान को दूर कर सब दया रूप जान के, अन्तर दया से सब पहचान? ना भ्रम अज्ञानता में घट को जान ना दया से रहित घट को जान जो बिना दया रूप सब घट व्यर्थ, शून्य जान! घट का सब ज्ञान दया रूपी--भाव, काम-क्रोध का त्याग जो सब घट रूपी दया रूप जान कर न विकार रूप दया को, अन्तर दयावान जान ले! ऐसा ज्ञान पा कर, ऐसा विचारवान हो कर सब दया रूप जान कर के सब घट का एक नाम जान कर त्याग, दया रूपी घट का ज्ञान पा कर ऐसा जान दयावान रूप से जान, दया रूप का सब रूप जान, ना सब घट ज्ञान रूप संसार के अज्ञान का रूप जान कर अज्ञान रूप भ्रम को दूर कर सब में सब जान जो सब घट दया रूप है, दया ही दया भान; दया ही दया से घट, घट का ज्ञान जान सब दयावान दयावान का प्रकाश सब पर दया कर दया रूप दया रूप जान, दया अज्ञान, दया भ्रम, अज्ञानता नाश हो कर सब का एक रूप जान कर अन्तर रूप को दयावान कर, सब दया जान। दयावान के प्रकाश रूप, दयावान के प्रकाश दयावान सब घट, घट रूप दया रूप में भान, ना तो कोई घट दया बिना दूजा सब घट दया रूप दयावान के प्रकाश प्रकाश में; सब रूप में दया रूप, ना कि दया बिन घट रूप दयावान के अन्तर प्रकाश में घट--ना घट, ना घट, अज्ञान ना, ना घट, अज्ञानता ना, दया ना, दया ना, दया हो--ना दया सब घट सब दयावान के, सब घट रूप में दया रूप, घट दया रूप न हो तो दयावान रूप न जान, जो दया रूप में जान; दयावान का रूप दया रूप जान, दयावान के रूप दया को, दया दयावान से घट घट दया रूप घट घट के सब प्रकाश, सो सब दया रूप सब दया, घट घट में दया का सब घट, सो दया ही दया रूप दया के घट जान 180