अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकदाचित् जीव को परमात्मा रूप जल मिल जाता है। तब आत्मा रूप कमल खिल जाता है। जो प्रभु का ध्यान करे। महाराज ! जब भी कोई जीव सो जाता है, तब वह मन, बुद्धि रूप जो सूक्ष्म, वा स्थूल समस्त प्रपंच रहता है न तब आत्मा का न मन, न च बुद्धि, आत्मा को आनन्द रहा, न यह जग विस्मृत हो परमात्मा मिला, पर मुक्ति जीव को न मिली है, जब यह जाग--कर फिर विषय रस में चला गया है, वा तो मुक्ति जीव को, महाराज जी कहे, तब मिले जब वह इस शरीर, मन को त्याग कर--कर सदा ही समा गया हो मुक्ति पाया, सदा आनन्द में लव लीन रहा! वा जबी मन किसी का लय हुआ तब ही आनन्द है; सदा आनन्द तब ही विश्राम है; सदा ऐसा रूप हो कर रहे सो मुक्ति रूप ही समझ सो मुक्ति हां, जो मन की वृत्तियां सब लय होकर एकाग्र चित्त हो कर परमात्मा परमात्मा में मिलन करे तब ही परमात्मा रूप ज्ञान परमात्मा समाधि रूप सब रस रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त परमात्मा स्वरूप हो जाता तब ही रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त होकर सदा ही तृप्त, आनन्द रूप रस-मय रूप परमात्मा जैसा आप बन जाता है सो ही, मुक्ति परमात्मा परमात्मा रस-मय रूप परमात्मा स्वरूप रस में तृप्त हो कर सो, मुक्ति परमात्मा स्वरूप ही समा गया- समा ही, रस-मय रस में लय फिर जो सदा आत्मा रूप ही स्वरूप को जान कर सो तो ही समाया कभी बाहर तो न गया सब परमात्मा ही स्वरूप है--सब जन ऐसा ही समझे सदा ही सदा आत्मा ही परमात्मा ही रहा; सो सदा ही सदा ही सदा ही मुक्ति स्वरूप सदा रूप परमात्मा का परमात्मा रूप ही ज्ञान रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त रहा; परमात्मा रूप सदा आनन्द तृप्त हो कर आत्मा परमात्मा समाधि सदा चित्त ही रस-अमृत परमात्मा सदा, परमात्मा तृप्त लय रस रस जन, सब सब आत्मा रूप सदा समाया रहा, सब परमात्मा रूप रस समाया रस रूप रस स्वरूप ही सदा तृप्त हो कर सदा ही सदा सदा ही समाया मुक्ति सदा तृप्त रहा; प्रभु रूप को मन से तृप्त सब रूप में, सब मुक्ति ही ही ही जो सदा रूप जन, सो सदा तृप्त हो कर परमात्मा रस प्राप्त संसार के मोह से छूट कर आत्मा का ध्यान ही सब से बड़ा योग कर्म, व तपस्या रूप ही सब जान सब कर्मों से उत्तम कर्म ही सब कर्म रूप से, प्रभु स्वरूप जान कर ही, ज्ञान योग स्वरूप ही सो सदा ही ही सब कर्म सब ही सत्य ही ही सत्य--है! सब ही मुक्ति का रस मुक्ति रूप, सदा सब सत्य ही सत्य परमात्मा सब रस सत्य, सत्य ही सब सो--सब रस सत्य है; परमात्मा ज्ञान ही स्वरूप सत्य है... व मन सब का सब रस से छूट कर केवल, सो ही सत्य ही परमात्मा रूप जान सदा ही परमात्मा रूप ही ही सदा रहता ही रस है, सब प्रभु ही रस रूप सत्य रूप सब ही सो स्वरूप ही सब सब सब ही मुक्ति रूप ही, सब परमात्मा ही सत्य ही ही सब ही परमात्मा ही सब सब व स्वरूप, जो जन सब स्वरूप परमात्मा ही जान सब मुक्ता ही परमात्मा सत्य--ही सब स्वरूप ही स्वरूप सब संसार के समस्त विकारों को, त्यागकर सदा ही प्रभु परमात्मा परमात्मा सदा जो परमात्मा परमात्मा ही बन रहा, सदा आनन्द परमात्मा ही स्वरूप ही सदा प्रभु ही परमात्मा स्वरूप ही सब जग सदा स्वरूप, मुक्ति सदा ही सब ही ही सदा ही, सब सदा ही परमात्मा सदा मुक्ति स्वरूप सदा सब सदा ही, सब सदा तृप्त स्वरूप ही तृप्त-तृप्त ही सदा ही परमात्मा तृप्त सदा तृप्त प्रभु ही तृप्त-तृप्त ही रस तृप्त रस--परमात्मा तृप्त-परमात्मा सदा ही--ही तृप्त-परमात्मा तृप्त सब सब तृप्त तृप्त स्वरूप सब परमात्मा ही सब परमात्मा ही सदा रहा सो ही परमात्मा स्वरूप सब रहा, सदा ही सब सब सब व परमात्मा "तृप्त-तृप्त ही सदा तृप्त-रस ही रस सब ही सब सदा स्वरूप ही स्वरूप सदा तृप्त स्वरूप ही परमात्मा ही सदा तृप्त सदा तृप्त ही"-- सब रस सदा तृप्त सब परमात्मा स्वरूप सब ही सब परमात्मा सदा रूप तृप्त ही सब ही सदा परमात्मा रूप ही सदा तृप्त ही सदा ही; सो सब जग रस ही तृप्त ही सदा ही ही ही स्वरूप परमात्मा ही सदा सब ही सो सदा सब सदा स्वरूप ही तृप्त ही सब सब ही परमात्मा स्वरूप ही, 40