भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 183 में से

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कथा का प्रवाह किसी ओर बह रहा था। स्वामी जी जब कथा कह रहे थे तब सब लोग स्तब्ध थे, केवल उनके मुख मण्डल तथा उनकी उस प्रतिभा को निहारते जा सकते थे। उसके पश्चात जब व्यास गद्दी किसी दूसरे महात्मा को सौंपी गयी तो सब लोग उठ कर कथा मण्डप से दूर परस्पर गप लड़ाने लगे। प्रद्युम्नसिंह जनसमूहके साथ आगे बढ़ा। आगे जाकर वह एक साधु महाराज के पास बैठा; और उनके चरण दबाने लगा। कुछ देर के पश्चात साधु महाराज को कुछ चेतना आयी; फिर वह आंखें खोल कर, इधर उधर देखकर कुछ चकित हुआ, आश्चर्य प्रकट करता हुआ साधु क्या कहने लगा? प्रद्युम्नसिंह को देखकर साधु कहने लगा कि बेटा! तुम कौन हो। किसी को खोजते हो क्या--प्रद्युम्नसिंह ने कहा स्वामी जी आप अन्तर्यामी हैं। सब कुछ जानते हैं फिर मुझ जैसे पापी से पूछने की क्या आवश्यकता है। आप यह बतलायें कि हम जो कुछ करते हैं, उसका परिणाम तो हमें न कभी न कभी भुगतना ही पड़ेगा। साधु कहने लगे अवश्य ही कर्म-फल भोगना ही पड़ता है। कर्म सिद्धान्त का चक्र; फिर कौन सी ऐसी बात समझना चाहते हो। प्रद्युम्न ने हाथ जोड़कर कहा कि यह तो बतलाओ कि मनुष्य अपने कर्मों का फल कब तक और किस प्रकार से भोगता है। साधु महाराज ने कहा-- "कर्मों का फल कर्म-फल के रूप में, जो रूप धारण करता है अवश्य होगा" इतना सुनते ही प्रद्युम्न सिंह के मुख से पश्चाताप की एक लहर सी उठी। कि इस संसार चक्र में इस कर्म के बन्धन से कौन छूट सकता है? उसने कहा साधु जी महाराज ! यह बात किसी प्रकार से मिट नहीं सकती क्या? यदि ऐसा नहीं; फिर उपाय क्या है? प्रद्युम्न ने अपने उस पाप को याद करके एक आह भरी और कहने लगा, क्या उपाय? उस समय साधु ने कहा कि अरे भाई! तू तो सब कुछ जान कर भी अनजान सा क्यों बनता है! जब तक ईश्वर की शरण में नहीं जाओगे तब तक छुटकारा मिल पाना असम्भव है। "कर्म-फल से त्राण भगवत्-कृपा से मिल गया तो, तुम बच जाओगे अन्यथा तो भुगतना होगा" प्रद्युम्न को फिर कुछ शान्ति मिली। जब वह स्वामी जी महाराज के पास से जाने लगा तब, एक आवाज सुनायी दी, एक व्यक्ति कहता चला, जा रहा था कि कन्हैया तुम्हारे कारण, सब लोग अपना काम छोड़ कर आ गये। हमारा काम बिगड़ गया; नुकसान बहुत हुआ। उस समय कन्हैया चुप था। वह केवल इतना ही बोला कि! नुकसान सचमुच हुआ होगा पर हम सब का सहारा तो भगवान ही हैं न? कन्हैया ने कहा सच कहना तो, सब बिगड़ जाता! "कन्हैया ने सच ही कहा था।" उस समय प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि कन्हैया ठीक कहता है, हर बात सच ही होनी चाहिए, सच को कोई कैसे छुपा सकता है। साधु महाराज सच कह रहे थे। सच से बचा तो जा सकता है, पर झूठ से नहीं। प्रद्युम्न ने विचार किया कि उसने जीवन में क्या सच कहा? किया या सुना? प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि? जो अत्याचार किया उसका परिणाम कितना भुगतना पड़ेगा? उसे अब समझ आ रहा था कि पाप का परिणाम सच से अधिक भयंकर होता है, पाप कभी छिपता नहीं केवल पाप से छुटकारा पा लेना ही श्रेयस्कर है, प्रद्युम्न को अपनी भूल दिखाई पड़ने लगी थी। प्रद्युम्न का पश्चाताप और गहरा होने लगा। प्रद्युम्न का शरीर, लरजने लगा। वह कांपने लगा; प्रद्युम्न सिंह एक ओर जाकर बैठ गया। रात को जब सब सो गये तो प्रद्युम्न ने स्वयं को असहाय सा अनुभव किया; प्रद्युम्न अपनी अकर्मण्यता पर रोने लगा, कि भगवान् अब; प्रद्युम्न अपने पापों के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। उसके पश्चाताप के आंसू निकल रहे थे। वह रात भर सो न सका। वह स्वयं को बहुत ही नीच; पापी और कुकर्मी समझता हुआ रात भर तड़पता रहा; प्रद्युम्न ने सोचा कि ईश्वर की शरण में जाने के लिए अब देर न करनी चाहिए, प्रातः काल प्रद्युम्न सिंह ने सोचा कि प्रद्युम्न को अब कर्म--फल भोगना ही होगा, ईश्वर दयालु और समर्थ हैं। प्रद्युम्न के मन में अब ईश्वर के प्रति श्रद्धा जागने लगी। वह उठकर बैठ गया और भगवान के चरणों में ध्यान लगाने लगा। इस प्रकार वह ईश्वर के नाम का जप करते हुए, प्रद्युम्न सिंह ने निश्चय किया कि अब सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए; ईश्वर बड़ा दयालु, कृपालु और सर्वव्यापी है। प्रद्युम्न ने अपने मन को ईश्वर के प्रति एकाग्र किया। 45

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