अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब यह बात संसार जान गया कि राम जैसा धर्मात्मा भी विपत्ति को न्योता दिए बिना रहता, विपत्ति पड़ी, विपत्ति भोगने विवश हुए; तब सामान्य मानव का क्या कहना जिनके पग-पग प्रमाद भरा जीवन ही अपराध बनता रहता गया जिसके कारण पग-पग वे प्राकृतिक दंड के रूप तीन प्रकार अर्थात् आधिभौतिक और आधिदैविक व आध्यात्मिक नाम से जाने जाते कष्टों को भोगते चले आ रहे भी भोगते चले जाते न हों; उनका कोई ऐसा उपाय तो हो न हो, पर संतोष न कर "जो कुछ होगा, सो सब देखा जायगा न? पहले से सोचकर क्यों अपने सुख को छी-छीन करें?" देखा तो सब कुछ जायगा ही फिर ऐसा क्यों? पहले से सचेत हो छी-छन को, दुःख- दारिद्रय को रोका न जाय? असम्भव बात तो थी नहीं किन्तु मानव समाज ने इस दिशा पग ही न उठाये किन्तु-परन्तु का खेल खेलते रहकर समय बिताता रहा कि एक अध्यात्मवादी, धर्म रक्षक, जो अध्यात्मवाद को ही सत्य, केवल सत्य मानता था समझा, जो अध्यात्म का उद्गाता जिसने देखा कि राम तक विपत्ति भोगने विवश हुए तब उनका अध्यात्म कैसा जो इस प्रकार के राम को दुःख दिया न टले? "कैसा अध्यात्म जो अपने परम भक्त को विपत्ति से बचा न सके? सो केवल मन बहलाव बनकर रह गया जीवन का साधन नहीं" जिसने केवल विचार तक नहीं दिया कि इस विपत्ति को मिटाने वैज्ञानिक विज्ञान का सहारा ले दुःख दारिद्रय मिटा सुख साधन को क्यों जुटाएं? जिसने वैज्ञानिक की खोज द्वारा सुख का साधन जुटा भी दिया पर वह केवल शारीरिक सुख बनकर रह गया पर भीतर मन तो तब तक केवल अशान्त ही भटकता रहा; सुख साधन भी मानव को सुख नहीं देकर केवल अशान्ति देकर सुख छीन ही तो रहे थे। तब विज्ञान के आधार पर केवल सुख भोग ही तो हो सकता था पर भीतर का सन्तोष नहीं; तो विज्ञान द्वारा सुख साधन पा कर सब सुखी हो सकते यह असम्भव ही बना रहा। साथ ही यह विज्ञान ऐसा बन बैठा कि केवल धन से धन द्वारा खरीदा जा सकता था। जिसके पास धन न था उसके लिए! तो वैज्ञानिक खोज का मानव को क्या सुख मिला जो साधन सब खरीद सकने असमर्थ ही बना रहा अध्यात्म से शांति न मिली; केवल जप, पूजन मात्र से शांति हो भी सकती थी, केवल मन का वहम मात्र फिर विज्ञान का सहारा खोजा गया क्या वह सुख दे सका? जो भी था वह बाहर तक सिमट कर रह गया। भीतर की अशान्ति को मिटाने विज्ञान के पास कोई उपाय न था। मानव सुखी अध्यात्म से रह नहीं सकता था; फिर धीरे-धीरे विज्ञान का सहारा बढ़ तो चला, लेकिन अध्यात्म को छोड़ना पड़ा नहीं; सो अध्यात्म का आडम्बर, पाखण्ड तो बढ़ता ही चला गया किन्तु उस आडम्बर को भी सुख न--देना ही सम्भव बना मानव को विज्ञान धीरे-धीरे पग, अध्यात्म धीरे-धीरे ढहता गया, पर परिणाम दोनों का सन्तोष जनक न निकल कर और अशान्तिकारक सिद्ध हुआ; जिसे केवल तन तक सुख मिला; केवल भोगों ने घेरा; पर मन फिर भी अतृप्त ही रहा। इस प्रकार अशान्त मानव ने विज्ञान को सुख साधन माना जरूर, पर सन्तोष नहीं पाया! तब विज्ञान की खोज बेकार सिद्ध होने लगी, जिसे अध्यात्म ही! तो भी नहीं भुला सका क्योंकि वह भी केवल बाहर तक सोच कर ही रह गया था। "सो दोनों ही बेकार सिद्ध हो गए ऐसा ही कहा जाय" तब एक बात यह विचार विचार कर भीतर सोच समझ कर उठी; केवल भोगी जीवन ही सब कुछ नहीं कहलाता बल्कि एक संयम भरा जीवन, जिसमें हर क्रिया अध्यात्म को समेट कर ही हो सकी थी, न कि केवल बाहर भटक कर सब कुछ पाया जायगा? "आध-आध या कहें दस-दस पर शत का जो मेल बना उसी ने समाज रचना आरम्भ कर समाज को सही दिशा प्रदान की होगी" क्या यह अध्यात्म इस समय चल सकता था जब सब कुछ लूट रहा था, सब मिटा जा रहा था? तब ऐसा विश्वास केवल विचार से नहीं हो सकता था जिसके लिए किसी समाज रचना की खोज के बिना जीवन अधूरा रहता था और उस वैज्ञानिक आधार आध्यात्मिक धीरे-धीरे रूप से समझना ही उस समय सम्भव समझा? जिसे हर युग का सच कहा जाय। केवल विज्ञान उस तक नहीं पहुंच सका था; तब केवल अध्यात्म बिना विज्ञान सत्य के नहीं पा सकता; तब सब अध्यात्म खोज वैज्ञानिक 50