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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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संसार का नाम केवल दुःखमय है? अज्ञानियों द्वारा यह नाम रक्खा गया है। प्रकृतिवादी जन ऐसा नाम रखते हैं। जो लोग सब वस्तु केवल पर रूप मात्र देखते हैं। वेही ऐसा कहते हैं। जो इस केवल पर रूप मात्र को त्याग कर अन्दर तक देखते हैं। उनको सब एक रस सुख ही मालूम, आ-नन्द पूर्ण भास होता है। यह संसार मिथ्या है या सत्य इस विषय पर जो लोग विचार ना कर के, ना ही इस विषय सम्बन्ध सोचते हैं? वे लोग ऐसा विचार आ--गम परम्परा से सुन, कर ही रहे, केवल जो लोग ना सो--च कर कह देते हैं। पर विचार दृष्टि से देखा जाय, तो क्या यह संसार मिथ्या है? कभी नहीं ऐसा रूप यह संसार नाहीं हो इस रीति से देखा तो नहीं जाता; जब यथार्थ संसार विचार रूप दृष्टि से संसार का यथार्थ स्वरूप विचारने पर संसार का यह स्वरूप ना भास हो, संसार का यथार्थ रूप, ज्ञान का भास होता है; किसी वैज्ञानिक द्वारा यह भी सिद्ध ना हो सका कि संसार को मिथ्या कहा जाय या इस को ना माना जाय तब संसार सत्य, ज्ञान रूप सिद्ध सत्य ही भासता है। जो लोग ना समझ, या अ--ज्ञान वश संसार मिथ्या हैं; वे लोग मिथ्या हैं, ना कि यह जो समस्त रूप में ही रूप हो प्रकृति द्वारा ज्ञान रूप सत्य ही यह संसार भासता ज्ञान में इस रीति द्वारा संसार का यथार्थ रूप सत्य विज्ञान ही स्वरूप इस रूप का विचार ना करके मिथ्या कथन रूप कह कथन यह मिथ्या संसार का ज्ञान ही रूप ना समझ कर ही यह कथन है, केवल इस कथन द्वारा ज्ञान स्वरूप ना होने का वैज्ञानिक है; केवल कथन आ--गम, विचार, सम्प्रदाय, ज्ञान, सिद्ध--न्त द्वारा सत्य सिद्ध है; केवल यह, रूप ना होने द्वारा ही इस तरह का अ--गम द्वारा ज्ञान स्वरूप ही ना कह कर केवल यह कथन, कि जो संसार केवल दुख रूप ही कथन करना यह भी अज्ञान का ही रूप कथन है। संसार समस्त ज्ञान रूप ज्ञान का प्रकाशक ही रूप में ही वैज्ञानिक स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही सिद्ध होता है, ना कि अज्ञानियों द्वारा ही इस को कहा जाता है, जो वैज्ञानिक इस रूप को अज्ञान द्वारा आ--गम कथन को ही ज्ञान रूप कह वैज्ञानिक ना होना ही सिद्ध किया, जब कि समस्त विचार परम्परा ना ही संसार को सत्य है, इस प्रकार सब रूप को सत्य--स्वरूप द्वारा यथार्थ रूप ही संसार का रूप है। इस रीति से, जो लोग कथन द्वारा यह कथन करते हैं। कि यह संसार दुःख रूप सिद्ध होता है; ना कथन द्वारा ना ज्ञान द्वारा यह ही यह सिद्ध होता प्रकृति स्वरूप द्वारा जो संसार को ज्ञान रूप ज्ञान ही वैज्ञानिक रूप ज्ञान सिद्ध हो तब कैसे संसार मिथ्या कहा जाय यह तो इस तरह मिथ्या ही कथन होगा, जब सत्य वैज्ञानिक के विचार द्वारा संसार का स्वरूप ज्ञान ही कथन रूप में सिद्ध हुआ तब इस को अविद्या या ज्ञान का रूप कहा जा सकता है। जो वैज्ञानिक इस तरह के स्वरूप को अविद्या कहते हैं वे स्वयं ही भ्रान्त हैं। वैज्ञानिक विचार से ऐसा कहना ठीक नहीं भास होता इस का कारण यह ही कहा जा सकता है कि; यह लोग उस स्वरूप को, केवल उस स्वरूप के रूप में ही ज्ञान को, जिस को ज्ञान का नाम आ--गम से दिया गया, वह लोग इस नाम ज्ञान द्वारा कह रहे? केवल इस प्रकार कह कर, रूप ना कह कर, उस ज्ञान का रूप है? नहीं! केवल इस तरह कहने मात्र द्वारा क्या होगा! केवल रूप ज्ञान कहना क्या रूप का वैज्ञानिक है! ज्ञान केवल ज्ञान का ही रूप कहा जाय तब ज्ञान--रूप द्वारा इस परम्परा को आ--गम का, रूप कहा जायगा, जिस तरह से आ--गम द्वारा रूप को सत्य माना गया है। उसी प्रकार सत्य रूप ज्ञान, को कह ना कर ज्ञान को वैज्ञानिक का स्वरूप कहा, ना कि अविद्या स्वरूप ना होने से इस संसार को ज्ञान रूप कहा जा सकता है। ज्ञान ही रूप ना होने से संसार का स्वरूप रूप सब ही आ--गम द्वारा सिद्ध ही होता है। अज्ञानियों का यह कहना ही कि संसार अविद्या का स्वरूप ही कहा; जाय तब अज्ञान ही सिद्ध हो जायगा, संसार को जो वैज्ञानिक रूप द्वारा इस रीति द्वारा ना समझ कर ऐसा कहना अज्ञानियों के रूप ज्ञान ही कहा जाता है। अज्ञानियों का ज्ञान ही, ज्ञानियों द्वारा जो अज्ञानियों को कथन है! इस ही रूप में आ--गम का रूप! कहा गया है। अज्ञानियों द्वारा ज्ञान का यह स्वरूप है! ज्ञान रूप का वैज्ञानिक स्वरूप सत्य रूप ही स्वरूप है; केवल उस ज्ञान द्वारा संसार का ज्ञान, ज्ञान का ज्ञान ही सत्य रूप ज्ञान वैज्ञानिक सिद्ध रूप 6