भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 183 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

आप दयाल हो, संसार-सागर-से पार होने वाला तुम्हारा पद पाकर क्या अमर होगा ना? सुख सम्पदा सब कुछ देकर जन्म-मृत्यु बन्धन का नाश करके परम पदवी देते यह सच सही, दयाल? अब तो मुझे दया करके भवसागर पार उतारोगे दयाल? कहो, कहो दयाल जी, तुम्हारा चरण शरण मिलै सुखदाई भवसागर पारि उतारा हो, यह बात सच है; दयालजी की जयकार पुकारने लगे। स्वामी जी मन विचारकर चुप रहे तो आगे श्री हुकुम चन्द जी ने कहा कि जो बात कहे उसकी सम्हाल रखो, पहिले सम्प्रदायों वाले भी तो कहते थेकि राम कहो, सो सो जन्म के पाप कट जायंगे और कल्याण हो, पर सो नाम जपनेवाले सब नर्क गये, ऐसी चापलूसी की यह दयाल-दयालमूल बात झूठी है। जब तक अपने कर्मों का फल नहीं भोगोगे तब तक छुटकारा नहीं हो--सक्ता चाहे लाख बार दयाल दयाल ही क्यों कहा वा किसी दूसरे देवता वा पीर पैग़म्बर को ही जपा; दयालदयाल करने से काम सिद्ध होता कोई नहीं देखा। जो यह नाम मुक्तिदाता होता तो कबीर जी के दर्शन करते कभी इस पार उतर गये न होते? दयालजी ने उत्तर दिया कि यह तो सच हैकि कर्मों फल तो सब भोगना ही पड़ सक्ता है, पर जो बात दयालजी कही, वह तो सम्प्रदाय की रीति थी सो मैंने भी कही, इस तरह दयाल स्वामी की बात का उत्तर पाकर स्वामी जी से श्री हुकुम चन्दजी बोले कि महाराज जी इन लोगों की बात पर आप क्यों ध्यान देते हैं। जब तक आप इन का खण्डन न करेंगे तब तक इन लोगों का ढकोसला दयालजी महाराज ऐसा बना ही ना रहेगा जी, जो जो भी संसार में गुरु बन कर बैठे सबही अपना अपना ही उल्लू सीधा ! यह लोग तो दयाल जी ऐसा शब्द कह कर न जाने कितना भोला भाला? तो सच ही बात कहो जी कभी भूल कर भी राम-कन्हैया-गोपाल रूप इन तीनो नामों स्मरण करना भी ? तो फिर दयालजी नामी कोई नया रूप नया-नया रूप तो नहीं बन सकता भला ऐसा नाम क्यों जपना? जो यह मनुष्य तन पा कर सत्यविद्या से हीन रहे तो वे भी मनुष्य न कहे जा कर पशु ही तो कहलाने योग्य मनुष्य का धर्म सत्य ही ग्रहण करना और असत्य को ही त्यागना तो सदा उचित ही है। सत्यवादी होना सदा प्रशंसनीय ही सब ही न माना; असत्यवादी का तो पग पग पर अपमान ही दयालजी ने तो उस असम्भव बात को ही सत्य मान सुना भी दिया जी! राम नाम मुक्ति दायक, कृष्ण नाम मुक्ति दायक जी! इन पाखण्डियों द्वारा चलाये गये दयाल नाम से ही मनुष्य जन्म का क्या उद्धार सम्भव? जब तक स्वामी जी इन सब बातों का खण्डन नहीं करेंगे तब तक यह भी दयालजी महाराज जी, इस ही तरह ढोल पीट पीट कर दयाल नाम सत्य ही बताते ही रहेंगे जी! हम तो स्वामी जी दयाल जी की बात से, ना ही दयालजी के चरणों से; हम तो उस परमात्मा, जो सब का पिता, जिस को सब जीव मात्र ही! कर पुकार रहे हैं उसी दयाल जी को हम सब सदा ही नमन करेंगे? इस विषय पर मुंशी जी, स्वामी जी द्वारा किए गए शास्त्र सत्य भाषण- खण्डन प्रति आ--हत हुए जिस से वे, अब आगे से इन सब को, नाम जपने वा सम्प्रदाय रूपी जाल को तोड़--ने का मन बना न सके सो अपने मन में हीन भावना लाकर दयालजी के चरणों से हाथ जोड़ कर क्षमा याचना की तथा आगे से दयाल जी का नाम न लेने सम्बन्धी वचन देकर वहां से चले गये। दयाल जी महाराज खड़े, खड़े ही विचार मग्न होकर रह गये, जिस दयाल जी का नाम जप कर उनके अनुयाई भव से पार उतरते थे, उस ही दयाल रूपी स्वरूप का आज जनता मन ही मन में उपहास करने लगी, तो वे अपने को अपमानित? समझ कर चुप हो गये, दयाल सम्प्रदाय रूपी नाव आज मझधार डूब चुकी जैसी लगने लगी थी। उस समय स्वामी जी ने मुंशी जी को मन की व्यथा कही! जिसे सुन मुंशी जी प्रसन्न हुए, कि स्वामी जी प्रसन्न हैं? सो आज की सभा सब के न केवल मन को ही मोह सकी अपि--तु सब को उस पथ का पथिक बना दिया जिस पर चल कर वे ज्ञानवान्! बनने लग गये थे स्वामी जी क्या दयाल सम्प्रदाय? स्वामी दयाल जी दया से दयालजी बन गये! किन्तु दयाल, जो सबका पाप हर लेता भवसागर पार उतारने का काम करता है? दयालजी का ऐसा रूप जिस से दयाल जी को भी सब संसार रूपी सागर पार कराने--वाले रूप में ही स्वीकार किया गया दयाल स्वामी को आज स्वामी जी कैसा बना गये? स्वामी नारायण मत, राधा-स्वामी मत, मत सम्प्रदायों के, सब मत मतान्तर लोग 62

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · पृष्ठ 62, कुल 183 में से · BharatKosha