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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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सच्चिदानंद परमात्मा को नमस्कार होवे! इनके सहाय से प्रथम संस्कार विषय का विचार आगे किया जाता है? संसार में जितने पदार्थ, सब एक परमाणु से लेकर वा अनेक कार्य रूप होके वा आगे परिणाम को पावेंगे, सब एक परमाणु रूपी मूल ही से बने, वा परमात्मा ही सब जगत् को उत्पन्न वा संहारक वा पालक सर्वेश्वर कर्त्ता--धर्त्ता सबीका सर्व काल शरीरी! वो निराकार निरंजन, सर्वान्त--र्यामी सबका ही पालक! सृष्टिकर्त्ता वो अजन्मा प्रकाश, सर्वशक्ति दयावन्त ज्ञानमय, सबके ही मन बीच, व्यापिक सार! सो आप विचार कीजिए, वा सर्वान्तर्यामी रूप जान कर, अंतरात्मा से भय करो जी; अंतरात्मा रूप ही तुम रहो, अपनी आत्माको मत रोको; अंतरात्मा सब बातों का ज्ञान रूप, अपनी आत्माको जानो! संसारी जो मनुष्य सब परमेश्वर की आज्ञापालक प्रजावत् वो उस परमेश्वर पिता रूपके ही स्वरूप प्रजापालक सब एक समान प्रजावत् ही जाने परन्तु परस्पर सब मनुष्यन के ही वा अपने आत्मारूप ज्ञान प्रमाण होकर कोई भी अपने को वा पराई आत्मा सन्तान ही, अपने समान प्रजावत् सबको समझे ऐसा कभी भी परस्पर में ही दुःख ना उपजे संस्कार सो, अपने समान आत्माके सुख विषय दुःख ना ही कभी उपजे पिता वा माता वा अन्य वा अन्य सम्बन्धी के; सर्वकाल पिता ही सन्तान सुख को, सब संस्कार कर्म जान, विद्यावान् करके ही सब संस्कार कर्म जान अपने समान वा पर को भी, जो कि वो वा अपने संग सदाकाल संगी रहे; पराये सर्वकाल सुख से युक्त सब जन को वा सन्तान, सब काल ही, पिता की आज्ञा--का पालन योग्य सदा संसारी सब मनुष्यन को सब तरह से भी, अपने मन वचन से भी सब जन को सब सुख सन्तान विषय सदा काल जान कर सुख देवे, अपने सब को सब प्रकार सब सुख सर्व काल ही वा दुःख नाशक सुख दाता हो? ऐसा सर्वकाल जान अपने पिता रूप ही सदा रहे और जो कोई मनुष्य उत्तम विद्या वा वा जान के अन्य को देवे, अन्य पिता वा माता समान सुख भी, उत्तम ज्ञान सब विषय प्रमाण ही जान के सुख देवे सो उत्तम जन ही, उत्तम पिता ही; अपने माता वा वो जन, विद्या--दान का दाता, अन्य ज्ञान सब जान पिता रूप ही जान, वा वो उत्तम दाता ही; अन्य जन को वा जो ज्ञान देकर सन्मार्ग में चलाने वाला ही सब जन का पिता, सो अन्य सब जनका उत्तम पिता हो! संसारी सन्तान के पालक सब माता और पितावत् वा प्रजावत्, जो जन वा संस्कार विद्या सन्तान जान वा विद्यावान्--विद्यावती वा सन्तान सब जन वा सन्तान--सम्बन्धी वा पालक सब जन को उत्तमता से ही सन्तान को, गुणवान् करे, सो सब जगत् के सन्तान सब जन को सुख सम्बन्धी हो; जिस जन को विद्या वा संस्कार रूप उत्तम ज्ञान ना उपजा सो सब जन कैसे वा सन्तान उत्तम होवे, जब कि सन्तान को ज्ञान श्रेष्ठ ना होवे? जिस प्रकार से ही जैसा जन शिक्षा पा के सो सब जन बने; जिस जन पिता वा मां जैसा स्वरूप वा गुण संग जैसा बालक पा के सब प्रकार सब ही सो जन हो जाय, सो ही सब जन जाने; अपनी सन्तान को जैसा चाहेगा, वैसा ही जन बनायेगा ज्ञान से, जैसा कि सब प्रकार विद्यावान् सब जन जान सकता है? इसके बाद सब ही जान लेवे, जैसा कि वो विद्या ज्ञान ना--होने देकर वा ना जानेगा वो अपने समान मूर्ख ही बने, सब प्रकार सब जन ज्ञान रूप अभ्यास सब करे; अपना हित जान के; सब विद्या जान कर सब जन ब्रह्मचर्य-ब्रह्मचारिणी होकर विद्यावान् सब ही सन्तान सब प्रकार सब जन को सदा ज्ञान प्रकाश करे! सो वो सब जन ही सुख पा के सदा जन का हित जाने; पिता का ज्ञान सब ही बालक सब को जान के सदा सब जन ज्ञान दाता हो--कर सदा सुख ही दे। सो, वो ही जान ले जो कि सब जगत्, सब सन्तान, वा पिता प्रजावत् सबही सन्तान के जान कर सर्व जगत् में अपने सब प्रकार सब प्रकार का जानेगा; सब जन सदा काल सब जन प्रजावत् जाने, वो ही सब प्रकार से सब जन अपने वा अन्य सन्तान सब प्रकार के सब को अपने ही समान वा अन्य ज्ञानवान् सब को वा ही जाने, वो विद्या के प्रकाश विद्यावान् सब प्रकार विद्यावान् जान के, अपनी सन्तान सब जन को सदा ज्ञान सब देवे, सब काल 69