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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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अवश्य ही इसका परिणाम यह हो कि मनुष्य अंधा हो जाय! वैयक्तिक स्वार्थ बढ़ता जायगा; इसका प्रभाव सब क्रियाकलापपर पड़ता जाय विचार की परंपरा असीम विस्तार-क्षेत्रवाली होने और क्रियाकलाप सीमित होने से मस्तिष्क तथा हृदय दोनों पर ही प्रभाव का आधिक्य रहता हुआ यह सब कुछ केवल मानसिक क्रियाकलाप बनकरही वैयक्तिक जीवनकी सीमा में बंधकर संकुचित रह जायगा और वैयक्तिक संकीर्णता बढ़ायगा जो स्वयं व्यक्तिवादी सभ्यता बनकर विश्व शांतिमें बाधक नहोगी क्या? इस वैयक्तिक क्रियाशीलता का प्रभाव यदि अन्य किसी दिशा अभिमुख नहोजायगा तो, वह प्रभाव केवल एक इस ओर क्रियाशीलताको विकृत करनेवाला-- मात्र होगा; उसका वैयक्तिक क्रियाकलाप आवश्यकता से कम और वह विचार की ओर बहुत अधिक प्रभाव डाले सकेगा। विचार क्रिया का स्वरूप स्वयं बन जायगा आवश्यकता के कम रूप में उपस्थित होकर अपने रूपमें? केवल इस विचारमें विश्वास रखकर नहीं केवल इसपर ही सब कुछ छोड़ देना व्यर्थ होगा मस्तिष्कपर भार अधिकताका, यह उचित क्रियाशीलताका! यह समाज-रचना, इसका विकास नहीं; विकास नाम तो व्यक्ति अथवा समाजकी उस सब क्रिया शक्तिमें निहित क्रिया रूप विकास-शक्तिका उपस्थित होनाहै, जो केवल विचारमें नहीं; केवल विचारशक्तिके ही रूप द्वारा नहीं क्रियाशीलता का भी, कार्य को क्रियान्वितकरके ही जो समाज को इस स्थितिमें लाने का कारण बनेगी शक्ति, जिससे स्वतः उसका रूप ही यह क्रियात्मकतापर आधारित क्रियात्मकता ही रूप हो इस वैयक्तिक क्रियाका भी जो समाज को इस स्थिति की ओर ले जायगी जिस दिशा में विचार और यह रूप दोनों ही रह सकेंगे और समाज स्वयं एक ऐसे रूप में उपस्थित हो सके जिसकी क्रिया का यह विचार वैयक्तिक क्रियाकलाप की समानता और सहयोगपर आधारित बना रहेगा, तभी वह स्वतः न रहकर समाजकी सेवाका रूप बनसकेगा तो, जहां वैयक्तिक रूप का क्रियाकलाप मस्तिष्कपर ही अधिकताका प्रभाव डाले रहने की आवश्यकता होगी, वैयक्तिक क्रियाकलाप का स्वरूप स्वतः कम आवश्यकता लिये हुए, वैयक्तिक क्रियाकलाप उस रूप ओर रूपमें रूप धारण कर सकेगा जो समाज की ओर जानेवाले क्रियाकलाप का कारण बन सकने योग्य केवल इतना ही नहीं कि केवल विचार का प्रभाव केवल मस्तिष्कपर ही सीमित रहेगा; केवल विचारमें? फिर उसका प्रभाव व्यक्ति स्वयं पर प्रभाव डाले बिना क्रिया रूपमें क्यों न होगा? केवल मस्तिष्कपर ही प्रभाव का परिणाम तो विचार का यह रूप स्वरूप होगा ही, मस्तिष्क स्वयं विकृत होकर रहेगा ही, जिसका असर सब क्रियापर पड़े बिना न रह सकेगा जो केवल विचारपर ही बल देते रहकर वैयक्तिक क्रियाशीलताको संकुचित बनाते हैं; इस रूपकी क्रियाशीलता समाज को स्वस्थ रूप देनेमें समर्थ हो सके क्या? इसका तो रूप ही इस रूप में समाज बनकर सामने आवेगा, जो केवल एक ऐसे समाज का रूप बना सकेगा जो विचार, विचार, सब कुछ सोच और समझ तो सकता हैपर करनेके समय शिथिल होकर केवल उस रूप में केवल एक विचार बन जायगा, जिसे केवल विचार ही कहसकेंगे; कोई रूप क्रिया का नहीं होगा क्रिया व्यक्ति को क्रियाशील बनकर रूप देगी, व्यक्ति का विचार जब क्रिया का रूप ले; तब विचार सफल होगा ही, विचार मस्तिष्कपर कोई विकृत भार डालनेमें असमर्थ ही रहेगा और समाज-रचना, व्यक्ति अथवा रूप संबंधी सब क्रिया को स्वतः सफल बनानेमें समर्थ हो ही सकेगा। जब क्रिया स्वयं समाजके स्वरूप में निर्मित होती रहेगी और यह रूप समाज को स्वतः एक नया जीवन प्रदान करेगा जो व्यक्ति तथा उस समाजके परस्पर संबंधपर ही नहीं, वैयक्तिक तथा सामाजिक दोनों क्रियाओंके इस रूप और क्रियाशीलताको भी स्वस्थ रूप प्रदान करेगा, जिससे यह विचार; केवल मस्तिष्कपर भार ही न बनकर रह जाय केवल न रहकर, जब स्वतः समाजका रूप बनकर, नया स्वरूप; समाजको रूप की सहायता इन दोनों रूप क्रियात्मक और विचारात्मक जिनका मस्तिष्कपर प्रभाव पड़ता है। यदि केवल एक तरफका प्रभाव ही इन दोनों शक्तियोंपर पड़ा तो समाज विकृत बनजायगा और! केवल क्रिया एक विकरालता लेवेगी; या तो केवल विचार क्रिया शक्तिहीन रूप में समाज को बनायगा जिससे केवल शून्य रहेगा; क्रिया शून्य हो, जन-बल केवल विचारपर ही आधारित रह जाय तो समाज केवल विचारके ही आधार समाज का रूप बन जायगा, जिससे समाज का रूप और क्रिया दोनों नष्ट होकर ही, व्यक्तित्व केवल एक विडंबना वैयक्तिक रूप और उस क्रियाकलाप का जो क्रियाशीलता को रूप देवे, वह केवल हो; न तो केवल विचारात्मक भार क्रियाकी क्रियाशीलताको नष्ट ही करने पावे आवश्यकता का रूप यदि सब कुछ होने लगे तो न केवल एक व्यक्ति, न केवल एक मस्तिष्कपर, सब कुछ भार बनकर समाप्त होगा

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