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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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यद्यपि वह साधन केवल ध्यान स्वरूप साधन था, इसलिए उसके द्वारा सिद्ध होने वाला फल भी केवल मन की ही सीमा तक बना रहा, पर जो साधक-साधना का रस, रस का रहस्य जानता नहीं था, उसे ध्यान स्वरूप साधना का स्वरूप न समझ, केवल सांसारिक दृष्टि से उसके लाभ या स्वरूप समझना ही पर्याप्त न समझ, उसकी सत्यता सिद्ध करने हेतु प्रमाण मांग ही बैठा? वह प्रमाण क्या मांग बैठा केवल यह प्रमाण नहीं, चमत्कार स्वरूप ही मांग पर बैठा जिस रूप से ज्ञानियों, संतों का विश्वास उठता; पर जो सच्चे थे, स्थिति के ज्ञाता, स्वरूप ज्ञाता, साक्षात्कार भाव-युक्त मन की गति ज्ञाता, स्वयं मन ज्ञाता या स्वरूप मन ज्ञाता, पर जब वह सत्य का ज्ञाता, स्वरूप ज्ञाता, ज्ञान का पूर्ण ज्ञाता था उसने तो जान ही लिया न वह केवल ज्ञान के रूप को सत्य ही जानने वाला, उसे तो रूप का प्रमाण साक्षात्कार ही रूप में देना होगा जो रूप स्वयं देखना चाहता था? इसका तो यह अर्थ हुआ भक्तराज प्रह्लाद को ज्ञान पूर्ण था, ज्ञान रूप का भी ज्ञान था; ज्ञान का रूप केवल ज्ञान सीमा तक ही रहा यह जानकर ही उसने ज्ञान दिया, प्रभु तो सब घट में वास है; कश्यप तो ज्ञान रूप शब्द को, या उस शब्द स्वरूप लाभ को? शब्द के स्वरूप लाभ को समझ न सका इसलिए उसका ज्ञान रूप लाभ केवल शंका रूप में बना रहा, जिस रूप से उसका वह ज्ञान था; केवल रूप ही ज्ञान रूप का वास या वास का रूप ही ज्ञान रूप लाभ समझ लिया जाता क्या? सब कुछ सत्य रूप में प्रकट हुआ? ऐसा क्यों रूप का वास केवल ध्यान के रूप को समझकर ही ज्ञान का रूप माना गया, इससे वह साध्य रूप से सिद्ध न हो सका, इससे सब साधन व्यर्थ कहलाने लगा, जब तक ध्यान, साधन रूप स्वरूप ज्ञान का यह सत्य न ज्ञान में पूर्ण रूपमयी था, प्रह्लाद ने इस रूप का रस-रूप देखा समझा हिरण्यकश्यप तो इस रूप के प्रभाव को नहीं जान रहा था इसलिए उसने पूछा कि तू जो कहता रहा कि सब में ज्ञान, सब दिशा सब काल-दिशा का वास है तो बता कि यह जो, प्रह्लाद ज्ञान का साधन है या तू जो समझता है, या केवल यह प्रह्लाद का ज्ञान ही सब का वास जानकर समझ रहा, यह सोच कर सब का रूप ज्ञान का वास रूप समझ रहा था केवल प्रह्लाद ज्ञान का ही, इसी रूप जान कर ही यह सब में केवल ज्ञान स्वरूप वास रूप को जान रहा था रूप का स्वरूप ज्ञान, ध्यान स्वरूप का ज्ञान था, इससे कश्यप जान नहीं सका स्वरूप ज्ञान रूप ज्ञान रूप हुआ ज्ञान रूप का जो ज्ञान स्वरूप रूप का ज्ञान समझ सकता जो ज्ञान का वास केवल ध्यान रूप में ही था वह रस-रूप तो बन रहा था पर, इस रस का रूप, रस का वास, रस का ज्ञान, रस का साधन, सब कुछ जो ज्ञान था... तो वह सब तो प्रह्लाद रूप साधन समझ रहा, पर कश्यप कैसा! प्रह्लाद सब का प्रमाण था? सब का साधन रूप ज्ञान था? कश्यप अज्ञान रूप साधन रूप का साधन रूप में ही यह ज्ञान था, कैसा? जब वह, ज्ञान ऐसा समझता था, तो बता, कहां, कहां भगवान है? या तो इस खंभे में भगवान है? सब ओर, चारों ओर, जिस खंभे में तूने देखा! तो बता सब का रूप, प्रभु, जो सब प्रह्लाद का स्वरूप बन कर वास कर रहा है सब में सब रूप बनकर! प्रह्लाद क्या समझ रहा? ज्ञान स्वरूप रस, स्वरूप के रस साधन किया! या तो ज्ञान ही सब कुछ था, सब ज्ञान रूप वास का वास रूप सब रस का वास था; पर केवल ज्ञान रूप ज्ञान का वास रूप ज्ञान में ही था, ज्ञान रूप का प्रभाव साक्षात्कार का रूप! ज्ञान स्वरूप रूप का रस, ज्ञान स्वरूप का वास था! जब उस का वास दिखा तो, वह ज्ञान रूप साधन कैसे बन रहा? या तो प्रह्लाद का केवल ज्ञान रूप वास ही था सब, इसका रस कैसा था? केवल ज्ञान रूप सब मन का वास स्वरूप ही रहा या रस रूप का प्रभाव न था इसलिए ज्ञान रूप वास रूप हुआ जिससे वास काल-दिशा ज्ञान रूप प्रभाव के प्रभाव से यह सब साधन रूप ज्ञान का प्रभाव बना; इसलिए प्रह्लाद का यह साधन ज्ञान था, प्रह्लाद के इस साधन द्वारा सब साधन सिद्ध रूप हुआ था, जब वह कश्यप द्वारा पूछा गया; प्रह्लाद सब प्रकार सब ओर से? प्रह्लाद सब ज्ञान स्वरूप रूप रहा? कश्यप सब प्रकार क्या समझा? या तो वह भी ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान रूप समझ, जो ज्ञान के सब सत्य स्वरूप प्रकार सब रूप बना जिससे उसका ज्ञान प्रभाव स्वरूप हुआ ज्ञान रूप हुआ सब ज्ञान का स्वरूप रूप बनकर प्रगट हुआ जिससे कश्यप रूप ज्ञान सब मन का विश्वास हो गया जिससे ज्ञान रूप सब वास हो कर, जो ज्ञान के सब स्वरूप द्वारा सब घट में था, वह 82