भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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तथा अनेक प्रकार विषय भोगों करके तृप्त हो सकते वा नहीं सो कहो, इस वचन करके राजाने मन को वशमें कर लिया सो हेराजन् इस प्रकार, जब मन को वश करे, तब परम प्रकाश रूप आत्म तत्त्व ग्रहण करने का उपाय विचारै सो तुम सुनो। प्रथम तो शास्त्र के अर्थ का भली प्रकार विचार करे अरु वैराग्य भावना भी मनमें निरन्तर दृढ़ करे अरु ब्रह्म--विद्या पढ़े अरु बहुत काल पर्यन्त अभ्यास को विचारै सो सब संशय को, अरु अविद्यारूपी तमको नाश करैगी अरु विचार; अरु जो राग--द्वेष विषय--विकार करके तृष्णा उपजी, तिसकरके नष्ट जो स्वरूप आत्मप्रकाश तिसको उदय विचार करे। तिस चिन्मात्र रूप में जो अविद्याकृत चेत्याकार वासना का उदय है तिसको विचारकर नष्ट करै तब चिन्मात्र रूप उदय हो प्रकाशता भान हो, अविद्याकृत वासना का उदय तिसको बन्धन है, तिसकरि रहित आत्म पद प्राप्त होवै जिस काल राग--द्वेष अरु विषय की तृष्णा का--सा अविद्याजनित उदय जो चित्त विषे उपजा तिस चित्त को न तो यह चित्त कहे, ना अविद्या कहे॥ विचारि यह तो सूक्ष्म संशय, ... जब ना तो यह चित्त न अविद्यास्वरूप हो, तब ना यह चित्त कहावै कहा, अरु स्वरूप जो चेतन सोई सदा सो ही रहा; विचारवान को चित्त भी ब्रह्म स्वरूप ही दृष्टि आता है अरु सब जगत् वा जगत् के पदार्थ भी ब्रह्म स्वरूप हो भासते हैं, अरु जो राग--द्वेष अरु विषय वासना चित्त में न उदय होवैगी तो ब्रह्म ही भासेगा अविद्याकृत नहीं; अरु अज्ञान पुरुष को सब ही भ्रम भासता दृष्टिआवै है; अरु विचार सम्पन्न को सकल ही ब्रह्म प्रकाशता? संसार चित्त के ही स्वरूप उदय का नाम अविद्याजनित भ्रमा हुआ कहै अरु चित्त का ना होना अविद्या का ना होना कहिये सो, विचार ही का फल पावै। अज्ञान करके जो चित्त का उदय होता है, जब विचार किया तब उस अज्ञानका अभाव हो गया अथवा जो चित्त नाश हुआ तिसकरि मन का भ्रम भी नष्ट हुआ सो, अविद्या भी, अज्ञान भी, अरु चित्त का वासना स्वरूप जो चित्तजनित अज्ञानता थी, सो अज्ञानता नाश भई तब सब शांत हो, तिसते ही, अविद्याजनित जो ना दृष्टि था तिसको प्रकाशता अज्ञानता ही, अरु अविद्यावान् पुरुष को सर्व आपदा उपजे? राजा उत्तर दे तब हे, परम वैराग्य रूप पवन के प्रहारकरके तृष्णालता जो चिदा- काश की ओर उर्द्ध गमन को प्राप्त भई तिसको यह अज्ञानरूपी तम नाश करैगा सो कहो तिसको जो यह तम निवारैगा सो कहो अरु जो शुद्ध भावना के योग करि आत्मा प्रकाश को प्रकाशता भी करै अरु चित्त नाश भी, सो तो ही विचारता के योग करके न कि नहीं इतिश्री श्री विचार के उपशम के दो दो श्लोक के व्याख्यान में सप्तमः सर्गः, द्वितीय वा विश्राम तृतीय सर्गः विचारपूर्वकत्वम् विचार निरूपणः राजा अरु मनोनिग्रहपूर्वक अरु तत्त्वज्ञान को कहो सो तुम कहो अरु वैराग्यपूर्वकता को; अरु जो तुम कहोगे तिसको ग्रहण करके अहम् अहंकर्ता ओ अहंभाव अहंता अरु ममकार को त्याग के, सो सो तो अहंता के त्याग पूर्वक विद्या का साधन सो भी होवैगा अरु इस संसार के जो जो विषय रूप फल भोगने हैं? तिसकरि वा तृष्णा करि तृप्ताता को जो पुरुष चित्त को शांत अरु तृष्णा को शान्त करेगा तिसको सो विषय के फल प्राप्त ना होंगे; तिसकरके राग--द्वेष को नाश होवै अरु जो आत्मज्ञान को अरु विवेकवान् को होगा सो, विवेकवान् पुरुष शांत अरु शुद्ध आत्मा को ही ही भान करेगा, तिस प्रकार आत्मभावको अरु सो त्याग सो विवेकवान् पुरुष सब ही प्रकार से, अरु जो अज्ञान अविद्या युक्त होगा, तिसको अनेक प्रकार विषय भोगने का उदय हो, राग--द्वेष की वासना उदय भई तिसके द्वारा भोगे; सो सब अविद्या के कारण करके विषय सुख भोगने की अभिलाषा नित्य ही उदय अरु नाश को प्राप्त राग--द्वेष को देवेगा अरु राग--द्वेष का जो वासना का उदय तिस चित्त को, सो चित्त राग--द्वेष को अरु, चित्त राग--द्वेष को चित्त राग--द्वेष अरु चित्त वासना के दो उदय अरु चित्त अरु जो वासना का उदय तिसकरके जो विषय वासना को तो उदय होवैगा, तिसकरके सब नष्ट अरु नाश अज्ञानता ही सब को नाश करे अरु जो है सो सुख अज्ञानता ही उपजे इसका अरु जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो अज्ञानता रूप से सब का उदय सब जगत् का वासना का उदय हो सो राग--द्वेष स्वरूप संसार को जो चित्त अरु वासना का उदय हो सो जो विषय को ही अज्ञान का नाश न करेगा तब संसार के सब भोग के नाश अरु उदय, राजा ने संशय 85