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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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जिससे कि उसको यह तो हो सके कि उसके अन्तःकरण में--या जब तक वह, उस आत्मतत्त्व रूपी परम तत्त्व को प्राप्त कर सके तब तक मन को परम वश में करके अन्तःकरण के द्वारा, उस परम सुख रस रस को न पिये; इसके बिना उसे यह सुख आत्मसुख तो नहीं मिलके वासना रसयुक्त सांसारिक सुख मात्र ही प्राप्त हो सके, उस सांसारिक सुख; जिसके मन और इन्द्रिय विषय भोगी हों, उस परम शान्त या उस आत्म सुख रस को ना प्राप्त कर सके सो तो हो, पर उस रस को वह भी प्राप्त कर सके, जिसने अभ्यास रूप से--इस अन्तःकरण रूपी चंचल मन को वश करके उस रस को ना भी प्राप्त किया होय, तो भी उसको उस रस का कुछ स्वाद आने लगेगा और सांसारिक विषय भोग सुख को त्यागना भी आरम्भ होगा ही होगा, इस हेतु से अभ्यास द्वारा योग मार्ग, अवश्य ही सुख दायक; जिससे कि साधक को सुख ही सुख प्राप्त होय न कि क्लेश-दुःख और इससे भी आगे बढ़कर तो यही कहा जाता ही है जिस बात, ऊपर श्लोक २ में कहा कि जो पुरुष इस प्रकार योग द्वारा अपने अन्तःकरण को वश करता है जिसको कि इस योग द्वारा प्रशान्त मन--मन का वेग ना होना सिद्ध हो गया होता हुआ मन हो, शान्त तथा रजोगुण से रहित जो हो गया निष्पाप हो, ऐसा योगी परम सुख जो इसके लिये कहा कि उस परम शान्त योगी को, उस योगी के समान जिसके कि राग-द्वेष नष्ट, पाप-दोष नष्ट, निष्पाप होय, ब्रह्म भूत होके ब्रह्म--का ध्यान करने से ही प्राप्त, होता सुख ब्रह्म प्राप्त होने का। ब्रह्म सुख अथवा आनन्द प्राप्ति इससे क्या हो गई? सो ऐसा आनन्द शान्त योगी स्वरूप-सहित को, उस प्रकार से, ना भी प्राप्त हुवा हो; तथापि जो उस के सदृश न भी हुआ उसको वैसा सुख तो हो ही? इसी बात का निश्चय अगले श्लोक में किया गया कि जो मनुष्य इस प्रकार मन को एकाग्र कर ध्यान को लगाये योग अभ्यास करता, उसको सुख क्या मिलेगा? सो उसके लिये बतलाया कि योगयुक्त का पाप दूर हो जाता है, जो पापी हो, निष्पाप हो, जो दुःखी हो, वह सुखी होता है और इस प्रकार अपने को निष्पाप सा जानकर उसको सुख भी प्राप्त होवेगा, और आत्मिक सुख क्या कम है? यह सब सुख आत्मा से सम्बन्ध रूप ही तो हो सकता है सो इस प्रकार आत्म सुख से जो आत्मा का आनन्द रूप सुख प्राप्त होवे सो, उस सुख को वह इस प्रकार के सुख से जो ब्रह्म योग से प्राप्त हो, वह, सुख, प्राप्त हो; अतः २ प्रकार सुख के दिखलाने वाली-सुखद ही, यह योग क्रिया अभ्यास रूप से मन को एकाग्र करके ध्यान लगाने के ही तो यह फलदायी हो सकी फिर, इसमें तो सब ही सुख ही सुख; अभ्यास का फल भी सुख और योग का फल भी सुख ही सुख है; जिससे अन्तःकरण की शुद्धि का साधन और उस योग द्वारा जो सिद्ध हो सका सो; दोनों प्रकार से साधन के द्वारा सुख ही तो साधक को प्राप्त हुआ सो, तो ऐसा यह सुख दायक ही; सो अभ्यास से योग करना श्रेय, सुख का साधन ही हुआ ना कि इस से कोई दुःख का साधन सिद्ध हो; इसी कारण योग का अभ्यास करने के लिये यह साधन बहुत ही सरल बतलाया कि मनुष्य को सुख प्राप्त हो; इसके साधन से जो लाभ, कल्याण हो सकता सो अन्य और किसी साधन द्वारा नहीं होता, इस साधन को तो सर्वसाधारण प्रत्येक मनुष्य ही, सब प्रकार का लाभ प्राप्त कर सके सो इस अभ्यास द्वारा सुख ही सुख प्राप्त करने निमित्त यह योग कहा गया, उस को धारण कर, उस साधन द्वारा सुखी हो! इससे आगे के पद में जो आत्मा शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर किया गया सो उस का भाव भिन्न भिन्न स्थानों भिन्न भिन्न प्रकार से यह रहा सबसे पहिले पद 'युञ्जन्नेवं' में सदा ध्यान द्वारा योग का जो अभ्यास योग साधक करता उस का? सो साधन के लिये इस श्लोक पूर्व में आत्मा का अर्थ मन लिया; पर जो सदा लगावे मन, सो तो यह भी विचार उत्पन्न होता ही होगा, कि मन को सदैव लगाए रखने से तो यह कष्ट ही होगा 87