भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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तथा अचरजकी बात यह नहीं कि विरक्तजनों का समागम या विरह रूपी अमृत अथवा गरल का पान कोई साधु जन ही करे भी, जो यह काम किए बिना स्वतः सिद्ध परमानन्द स्वरूप होने पर संसार के समस्त सुख भोगों से परे हो कर उस पदवी को प्राप्त कर गया, या पहुँचने का अभिलाषी ? क्योंकि उनका तो यह सहज स्वभाव ही था जिसके न मिलने से संसार के सुख दुखको कुछ समझ सकते नहीं थे। जब तक आत्मज्ञानियों का यह संग होता था तो वह सुख मान लेते थे और नहीं तो चुप ! बल्कि अचरज तो तब हो जो कोई विषय भोगों विलासों में चूर रहने वालोंमेंसे भी तो कोई उस सुख तरफ ध्यान दे जो सब सुख ओरों ओर दुःख हरने सर्वव्यापी के भजन ध्यानसे ? कहने का भाव यह कि जहाँ तक बने तहाँ तलक संतों महात्माओं के सङ्ग उसीकी बात ओर उन का प्रेम प्राप्त करने का यत्न करे। उन के वचनों को सुन कर विचार करे तथापि यह जान रक्खे कि यह सङ्ग प्राप्त होना भी उस प्रभु की दया पर निर्भर है, जिसके लिये जब भी इच्छा जागे प्रभु परमात्मा से सदा ही सदा याचना वा विनती करते रहें। अस्तु, विचार का यह, जो न बन पड़े तो जब तक सच्चा सन्त न मिले तबतक तो परस्पर सत्संगियों से, महापुरुषों के ग्रन्थ वा पदों का पठन वा श्रवण करके उनका अर्थ मनन वा उनके उपदेश पर चलने की शिक्षा वा उस उपदेश पर, स्वयं ही वा दो चार मित्र, आपस मिलकर चलने का उपाय करते रहें। अरे भाई ! सन्त कभी सत संगी रूप, तो कभी ग्रन्थ रूप बन गये ! यह सत्य ही तो है। सत्य सुनो ! संत चरण रज रूप तो बन ही सकते हैं। सन्त चरण रज रूप कैसे बन गये ? आश्चर्य तो यह, वास्तव में ही सन्त तो रूप है, संत चरण स्वरूप का ध्यान करो, जिससे कि अन्त करण का सब मल धुल जाये ? यह तो न सन्त चरणों का ध्यान रूप हुआ। वास्तव में यह, मन जो कि किसी बात पर भी स्थिर नहीं ठहर सकता सदा इधर उधर भटकता रहता है, उस चंचल मन रूपी पापी पाखण्ड वृत्ति को सब से, सब ओरों सब भाँति तथा प्रकारसे खींच कर प्रभु प्रेम, प्रभु भक्ति रूपी सन्त चरण पर लाकर इस भाँति दृढ कर दिया जाये, जैसा किसी वृक्ष की जड़ पत्थरोंमें जमने से फिर वह सरदी गरमी तथा वायु की प्रत्येक मार को सहन कर सकती हुई न केवल स्वयं न गिरके मजबूत रहती है बल्कि दृढ़ वृक्ष रूप में अपने ऊपर भी अनेक पक्षियों तथा प्राणियों का आश्रय बन कर उनको सब तरह सुख पहुंचाती है। किन्तु इसके लिये जब तक इस चंचल मन पर संतोंके चरणों की मार, वा भक्ति रसामृत से सुवासित रंग न लगाया जायेगा तब तक यह सरदी, गरमी वा अन्य सब प्रकारके सांसारिक सुख दुःखों का मुकाबला नहीं कर सकता। इसलिये इस मनको मारना ही सब से उत्तम माना गया है, मनके जीते ही प्रभु के दर्शन संभव जान कर संतों ने उपदेश भी यही किया। अब विचार का रूप यह है, जिससे कि प्रत्येक प्रकार-का संदेह मिट सके, क्योंकि जब आत्मज्ञान रूपी सूर्यका प्रकाश होगा तब अज्ञान रूपी तम आप ही मिट जायगा। इस लिये सब से पहले उस प्रभु की दया से सन्तों का, सत्सङ्ग रूपी साधन प्राप्त करने की चेष्टा हो, फिर संतों के इस उपदेश पर ध्यान दें कि सन्तों ने क्या उपदेश दिया? क्या केवल संतों की दया? या प्रभु सन्मुख होने की दया का नाम है, इसलिये, जिस प्रकार सब सुख दाता, सब का पोषक दयालु प्रभु कृपा कर ही रहा, उस की दया समझ कर उस रूप ओर उस दयापर सब कुछ न्यौछावर करते हुए प्रसन्न न रहेंगे। सद्गुरु शरणागत होकर मनुष्य को भय से रहित होकर उस सर्वव्यापी के भजन सिमरन में लग जाना चाहिये जिससे कि सब प्रकार के संशय दूर होकर, उस परमात्मा दयाल जी की शरण का सुख प्राप्त हो सके। मायावती का मोह त्याग कर उस प्रभु के, जो सदा ही सबके साथ है अंग संग जान कर इस बात का अनुभव करे कि उस की शरण ही सब से बड़ी है, जिसके लिये अपने हृदय को शुद्ध करे। जो कि केवल प्रभु भजन से ही संभव है। 100