एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजब परमात्मा जीव को अपने स्वरूप बोध करा देता अथवा कराता, अथवा जीव परमात्मा स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर ले तब प्रकृति शून्य स्वरूप सब शून्य भासता, अथवा उस रूप दृष्टान्त स्वरूप समझता, अथवा इन सब दृश्यमान सांसारिक रूप प्रपंच स्वरूप शून्य महामाया अथवा रूप रस गंध शब्द स्पर्श प्रपंचमय स्थिति को पार कर अपनी सत्ता स्वरूप को जानता तब आत्मा या परमात्मा को भिन्न जान भ्रम मान कर अज्ञानता को दूर कर लेवे या, प्रकृति का सम्बन्ध आत्मा या परमात्मा स्वरूप भेद, अथवा भिन्न रूप जान कर या मान कर मुक्ति या मोक्ष पद को पा जाता जिस प्रकार कंचुकि नागिन छूट, अथवा सर्प रूप से कंचुकि भिन्न हो कर स्वतः नष्ट स्वरूप हो जाता या दूर हो जाता कंचुकि सम्बन्धित का ज्ञान छूट के, प्रकृति का त्याग कर परमात्मा रूप रस विहीन स्वरूप पाता, भिन्न भिन्न न जान एक रस पूर्ण स्वरूप जान के अपने रूप रस स्वरूप को, सो इस ज्ञान रूपी अमृत शक्ति स्वरूप को, बिना स्वाध्याय योग के बिना गुरु शक्ति के प्रकाश के ज्ञान, मुक्ति या परमात्मा को जान सके जिसके लिए कहा, आत्मज्ञान बिना सब, प्रकृति स्वरूप ज्ञान भ्रम या भ्रम का ही रूप या मिथ्या अविद्या का रूप है, सो कैसा है? जो जीव भ्रम में, प्रकृति स्वरूप या प्रकृति के प्रपंच रूप नाम रूपान्तर को सत्य मान कर या जान कर रूप रस के वश हो कर या आसक्त हो कर फंस रहा या, अज्ञानता स्वरूप काल के या उस प्रपंच के वश ज्ञान रूप स्वावलम्बन से, प्रकाश के ज्ञान या ज्ञान रूपी मुक्ति मार्ग को विस्मृत करता, जिस से जीवात्मा या जीव का नाम रूप रस प्रपंच स्वरूप, काल रूपान्तर प्रपंच में जन्म जनम कर भ्रम चक्र भ्रम में फंस कर, या उस भ्रम रूप विषय के अज्ञाना अन्धकार स्वरूप रूपी कूप में गिरता या गिर कर काल के मुख पराधीन हो जन्म मरण स्वरूप में पड़ दुःखों को भोग कर त्राहि त्राहि कर रोय परमात्मा से दया याचना करता जिस प्रकार कंचुकि का सम्बन्ध सर्प से छूट जाता है! सो इस प्रकार का विवेक जब प्रकट होता तब, "सब को सो जाने या जान कर या इस रूपी प्रपंच भ्रम को, या कार्यकारणात्मक कर्म फलादि जान कर, प्रकृति से पार पद पाता" जिस पद को प्राप्त कर जीव न तो इस रूप प्रपंच विकार रूप न ही इस प्रकृति रूप मायाजाल का भोग कर दुःख पाता या स्वावलम्बन पद को प्राप्त कर प्रकृति रूप प्रपंच से अलग पार हो जाता जिस प्रकार कंचुकि रूप सर्प विकार से रहित हो कर उस त्याग देता या त्याग कर अलग स्वरूप भोग कर पर रूप ज्ञान को प्राप्त कर मुक्ति को प्राप्त कर लेवे उस जीव रूप उस रूप परम पुरुष रूप को परमात्मा या परमेश्वर या जो परमेश्वर रूप उस रूप सत्य स्वरूप को जान लेता, जिस ज्ञान के बल, या उस ज्ञान के बल से? सो सो उस ज्ञान से? जिस ज्ञान स्वरूप को पा कर न शोक हो न ही मोह या जिस ज्ञान शक्ति द्वारा जी? सो कैसा या कैसा है? इस प्रकार का संशय या भ्रम ज्ञान रूप अज्ञान विचार को मिटा कर यह इस ज्ञान की महिमा स्वरूप ध्यान में लीन हो अज्ञान विचार को दूर कर के ज्ञान रूपी प्रकाश रूपी ब्रह्म को, सच्चि? आनन्द का ध्यान कर लेता, व मुक्ति रूप स्थिति मुक्ति रूप से प्राप्त होवेगा सो, हे ज्ञान रूप या दिव्य ज्योति! जिस ज्योति का तेज उस तेज स्वरूप में हो कर स्थिर तेज स्वरूप का साक्षात्कार जिस पुरुष रूप का मन-मस्तिष्क या विचार रूप या निर्मल शक्ति से, सो सो साधक निष्काम परोपकारार्थ ही कर्म करता हुआ सब का, प्रकृति से परात्परता को सिद्ध कर रहा हो, सो साधक ब्रह्म विद्या प्रकाशक कैसे बनेगा? क्योंकि उस काल में उस काल, स्वाध्याय नियम से रह कर स्वाध्याय योग को छोड़ कर निष्काम जन-हित रूप को सब त्याग कर ही तो ऐसा हो सके गा! जिससे कि सब जन! उस साधक के पद तक पहुंच सके! इसके लिए उस रूप ऐसा ही जो साधक होगा उस साधक ज्ञान रूप उस तेज को प्राप्त करने के पश्चात् ही ज्ञान तेज, प्रकाशक या ब्रह्म-पद को उस ज्ञान तेज रूप प्रकाश के ज्ञान किरण रूपी प्रकाश को सब ओर फैला कर ही तो सब रूप जन हित स्वरूप का कार्य करेगा जिस प्रकार से सूर्य अपने तेज को सब ओर फैला कर स्वावलम्बन से, तेज से, सब को प्रकाशक हो ज्ञान या तेज रूप को, सब प्रकाशक हो अन्धकार रूप व अज्ञा 103