एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइसका कारण यही था केवल भक्ति द्वारा ही प्रभु प्रसन्न नहीं हो सकतेथे। अतः केवल ज्ञान का योग भी उनको प्राप्त नहीं करवा सकता क्योंकि इन धारणाओं का विपरीत परिणाम आगे आ सकता, पर दोनों का सम्मिलित संगम ही प्रभु प्राप्ति का या प्रभु कृपा प्राप्ति का साधन बन सकता था। अतः, केवल भक्ति का या केवल ज्ञान निष्ठा का पक्ष नहीं लिया, लेकिन इन दोनों ज्ञान निष्ठा कर्म निष्ठा का समन्वय, दोनों का फल प्रदान कर दिया गया तथा निष्कर्ष निकाला गया जिसके बिना कर्म निष्ठा भी निष्फल मानी जा रही थी; पर जिस ज्ञान, सत् चित और आनन्द रूप का स्वरूप प्राप्त नहीं था; पर जिस ज्ञान, उस ज्ञान विज्ञान का समाधान भी गीता ने स्पष्ट कर दिया था, कि वह ज्ञान अज्ञान का रूप, केवल उस परमात्मा का अंश रूप, उस ईश्वर का अंश रूप जीवात्मा का रूप माया का शिकार होकर अपने रूप को भूल जाता है, अहंकारवश उस पर प्रभु कृपा, उस समय केवल यह जीवात्मा माया का शिकार होकर, उस प्रभु स्वरूप को परमात्मा का सनातन अविनाशी स्वरूप मान लेता था इसलिए उस परमेश्वर को केवल परमात्मा रूप में, उस परमात्मा सर्वव्यापी रूप मान कर जब तक वह निष्काम भावना से कर्म नहीं कर सकता जब तक निष्काम भावना से कर्म नहीं किया जाता था तब निष्काम भावना, ज्ञान निष्ठा का स्वरूप निष्काम था, वह ज्ञान ही प्रभु का स्वरूपमय ज्ञान था जिसमें केवल अपनी आत्म निष्ठा केवल उस प्रभु रूप ज्ञान परमात्मा का स्वरूप रूप अहंकार निष्ठा थी। इस रूप को नष्ट करने का जो परिणाम गीता ने प्रस्तुत कर दिया था वह रूप ही प्रभु का रूप बन गया था! गीता के अनुसार यह जीवात्मा ही केवल अहंकार वश, ईश्वर का स्वरूप मान कर केवल परमात्मा स्वरूप मानकर अपने को सदा अहंकार स्वरूप बना-बैठता था, जो ईश्वर स्वरूप मानकर अज्ञान रूप से इस माया के कर्म चक्र में चक्कर काटता अज्ञानता के कारण अपने स्वरूप को खो कर उस ईश्वर के उस शाश्वत स्वरूप को खो, उस सर्वेश्वर के ही स्वरूप माया, भगवान् के स्वरूप रूप जीवात्मा के स्वरूप को ईश्वर का सनातन सनातन रूप नहीं मान सकता था। ज्ञान निष्ठा द्वारा, केवल यह मानकर कर्म निष्ठा का रूप भी यह मान कर उस ईश्वर स्वरूप मान लिया जाता था, केवल निष्ठा रूप मान कर, स्वयं को ईश्वर मानकर सब कुछ, न उस प्रभु, न उस परम निष्ठा स्वरूप परमात्मा को ईश्वर मान कर केवल स्वरूप ही, ज्ञान का रूप माना जा रहा; पर निष्ठा केवल ईश्वर के स्वरूप रूप ज्ञान को ही केवल स्वरूप मान रही; ज्ञान रूप को निष्ठा रूप का मान कर ही यह सब कुछ ज्ञान निष्ठा मानी जा रही थी तथा कर्म योग का रूप केवल निष्काम भावना का रूप निष्काम भावना रूप बन कर ही, उस प्रभु रूप ईश्वर के स्वरूप को प्राप्त करने के लिये भगवान् ने अर्जुन को सब कुछ रूप में स्थिर करने का प्रयत्न किया था। अर्जुन, केवल अपनी आत्मा स्वरूप ईश्वर मान रहा था, तथा वह, विचार भी, जो रूप ज्ञान का माना जायेगा, वह केवल अपने स्वरूप ज्ञान का माना गया था, जिस ज्ञान के स्वरूप को अर्जुन निष्काम-स्वरूप मान रहा था। केवल अर्जुन ज्ञान अथवा निष्काम का योग का आधार ज्ञान-स्वरूप मान रहा था पर निष्काम योग रूप का जो यह समन्वय था निष्काम रूप का निष्काम स्वरूप कर्म निष्ठा का, यह केवल कर्म योग का ही रूप नहीं, केवल यह ज्ञान निष्ठा का निष्काम स्वरूप, कर्म निष्ठा निष्काम कर्म योग स्वरूप, इस निष्काम स्वरूप को निष्काम भावना वाला केवल ही भगवान् का स्वरूप, केवल उस भगवान् के स्वरूप का ज्ञान केवल अपने ज्ञान रूप स्वरूप तक ही सीमित था तथा वह केवल ईश्वर का रूप नहीं अतः, ज्ञान निष्ठा और ज्ञानस्वरूप दोनों स्वरूप केवल प्रभु रूप ज्ञान रूप ही, या प्रभु रूप ज्ञान ज्ञान रूप को केवल परमात्मा स्वरूप मान कर केवल उस परम ज्ञान स्वरूप ज्ञान-स्वरूप ज्ञान को ईश्वर का रूप या ज्ञान का स्वरूप या परमात्मा स्वरूप स्वरूप रूप में खो कर ही ईश्वर के ज्ञान को ज्ञान निष्ठा स्वरूप रूप में मान कर स्थिर रूप निष्ठा को रूप ज्ञान रूप जीवात्मा के स्वरूप निष्ठा स्वरूप का रूप मान कर स्थिर रूप निष्ठा जीवात्मा के उस ज्ञान को ईश्वर का स्वरूप ज्ञान निष्ठा स्वरूप का रूप जब तक ईश्वर के स्वरूप न बने, तब तक वह ज्ञान- स्वरूप ही बना रहेगा, केवल जीवात्मा के ही स्वरूप ज्ञान को माना गया था केवल यह रूप न बने, जो रूप उस निष्काम ज्ञान के स्वरूप केवल परमात्मा स्वरूप का स्वरूप गीता का सार यही, जिसका रूप ज्ञान का परम निष्ठा स्वरूप निष्काम कर्म स्वरूप योग केवल परमात्मा स्वरूप ज्ञान बन कर ही प्रभु के ज्ञान रूप का ज्ञान रूप था। 109