एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदयानाथजी सबको सन्तुष्ट देखना ही तो चाहते इसलिए उन्होंने कहा, 'जो जो राम-नाम लिखकर भेजिएगा उन सब को नाम का चोला जरूर मिलेगा चाहे नाम और रूप का कोई विभेद या अधिकार नहो।' व्यास जी जब नाम लिखाने कार्यालय पहुँचे तो वहां लम्बी लाइन, खचाखच भीड़। लाइन में ही... कोई-कोई गप्प-शप्पबाजी कर रहे थे कि क्या पता, इन तीन लाख नामा-क्षरों वाला चोला या फिर किसी अन्य का या यह सब ढकोसला न हो। व्यास जी यह सब तो समझ देखकर व्यथित हो राम-दरबार गए व प्रार्थना 'प्रभो सब नाम जप तो कर रहे हैं? किन्तु नामाक्षर निष्काम कैसे? क्या सब आपका ही चोला पाकर तृप्त होना चाहते हैं? भक्तवत्सल कृपा कर इन पर निष्काम कृपा करो? सब नाम जपकर भवपार हो जायें और अपना यह महायज्ञ सब नाम प्रेमियों का! जहां दयानाथजी स्वयं भी आ बैठे, भक्तवत्सल कृपा करके पधारो क्योंकि इन लोगों तक यह बात इस रूप पहुंची जिस रूप को ना होना उचित था, ना ही या ऐसा भी कह दिया गयाकि दयानाथजी कहो तो, या अपना ही कोई रूप बनाकर भेज ही दें। अतः उन्होंने जो चोला धारण किया था, पीता- म्बर वाला, चरण में नूपुर झंकृत, कमरबन्द वाला, कलाई में हार शोभित चन्दन, की सुगन्ध बिखरता हुआ भक्तवत्सल श्याम रूप को उन सब लोगों ने देखा तो साक्षात् रूप में, पर वह रूप विलीन हो गया सब लोग विस्मय विमुग्ध होकर स्तब्ध रह गए! व्यास दयानाथ को देखो! चोला तो वो चोला! सब को दयानाथ को साक्षात् प्रणाम हो रहा था। व्यास कहने लगे, क्या देखा सबने? वो चोला सिर्फ दो चार नाम वाले नामा रूपी का नहीं रूप होता, दयानाथ का स्वरूप तो स्वयं चोला रूप। सब स्तब्ध, दयानाथ जी की साक्षात् लीला को देख सब प्रेम भाव विभोर होकर अब राम नामा-क्षर स्वरूप में लीन थे। "भगवान का रूप चोला धारण होगा? या वो जन-मन निष्काम चोला ही तो ना था!" सब को दयानाथ भक्त के रूप में, जो कोई रूप देख रहा था, सब अपने अनुसार? पर वो रूप सब सबको चोला रूप से परे था, उस स्वरूप का कोई चोला रूप नहीं दयानाथ तो भक्तवत्सल रूप में दयानाथजी जन के बीच स्वयं ही आ गए थे, पर सब चोला खोज "जो खोज रहा था वो तो मिला ही" हर कोई प्रसन्न, उस रूप को देख कर सब रूप लीन व्यास जी दयानाथ और भगवान रूप ही के अन्तर्यामी स्वरूप को जान उनका जो रूप था चोला के रूप स्वरूप से, उस रूप को देखना सब के ही भाग्यवान हो जाने का पर्याय स्वरूप दयानाथ के अन्तर्यामी स्वरूप व्यासजी जनमानस के बीच स्वयं स्थित हो स्वयं स्वरूप को जो देख पाते, उस रूप रूप का सब चोला रूप ही चोला रूप हो गया था, चोला क्या! वो तो चोला से परे चोला रूप से परे चोला रूप से परे दया-धाम ही तो जो दयामय रूप-- "वो रूप स्वयं रूप चोला था पर चोला से दयामय था" सब को यह रूप देख कर चोला का जो भ्रम बना हुआ था चोला का होना ना रूप से निष्ठा पर सब रूप में लीन, सब उस रूप में लीन हो जाना चाहिए? उस रूप को स्वयं देखना सब का लक्ष्य था? चोला तो वो चोला रूप, चोला स्वरूप सब स्वयं स्वरूप में लीन था? चोला का चोला रूप चोला ही तो सब जन का, तो वो ना रूप--का चोला चोला रूप रूप था। पर चोला रूप जन दयानाथ का रूप स्वरूप दयामय। सब के ही चोला को चोला से सब जन जोड़ रहे, चोला तो सब दयामय ही रूप रहा था, सब चोला रूप, वो ही चोला रूप--का चोला का चोला रूप दयामय स्वरूप हो गया, चोला चोला स्वरूप हो! सब लोग उस चोला रूप दयानाथ भक्तवत्सल रूप स्वयं स्वरूप दयामय सब चोला के रूप में स्वयं चोला बन गए, जो वो चोला रूप बन गए? या वो चोला ही बन गए स्वयं? दयानाथ का चोला स्वरूप ही सब का रूप चोला बन गया रूप में चोला का रूप चोला ही तो सब दयामय रूप दयामय ही तो हो गए चोला चोला रूप में लीन? वो तो चोला ही बन गए? चोला स्वरूप ही तो सब रूप चोला का चोला हो, पर वो सब तो, चोला रूप चोला रूप में ही चोला चोला रूप को चोला रूप से, चोला रूप चोला रूप में तो सब चोला रूप चोला को सब रूप सब का रूप चोला 111