एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजान लें! समझ लें कि, प्रेम का अंत पाप ही क्यों कहलाए? समाज जिसे वर कहे वह साधारणतः दो बातें लोग इस ओर कहा करते, प्रथम तो यहकि जो पुरुष नारी संसार के नियम से अथवा जन समुदाय द्वारा आपस में पति-पत्नी रूप ग्रहण किए गए होते हैं, या फिर जो समाज द्वारा बनाए गए रीति मंत्र से बंधे होते हैं वे ही एक दूसरे रूप रस गंध का भोग परस्पर लें? दूसरी बात वेकहते कि जहां वासना, अथवा इच्छा मात्र शारीरिक वासना तृप्ति की होगी वहां पर तो कामाग्नि ही प्रदीप्त हो, जो कामाग्नि वासना की तृप्ति के उपरांत समाप्त हो जाया करे, या यों कहें न केवल वासना की वासना मात्र हो, अथवा भोग मात्र की बात ही वहां हो। पर समाज से परे जब हम इस वासनात्मकता को पार करतेहैं कि जहां वासना का भोग मात्र ही काम न होकर दो प्राणों का दो देहों से परे सदा संयोग सदा समभाव सदा रूप रस गंध एक दूसरे में लीन होने वाला जीवन भरा प्रेम उत्पन्न होता जाता हो, जिसे दो एक दूसरे को जान, न कर भी पा सकते हों उस भाव को यदि कोई नाम वासना वासनात्मकता का देवे तो, वासना शब्द अपनी वासनात्मकता से परे हो, जो रूप रंग रस गंध से परे होकर केवल एक रस ही रह जाए उस रूप को वासना कहना उस पावन भाव ज्ञान का अपमान है। जो रस रूप से परे होकर उस वासनात्मकता को पार करके उस भाव दशा को प्राप्त कर लेता है जहां केवल प्रेम, केवल रस ही रस का भाव रह जाता हैकि न तो कभी प्यास की तृप्ति होती न रस का अंत हो, सदा नया ही नया भाव, समभाव से व्याप्त हो अंतरंगता से परिपूर्ण प्रेम का भाव ही भाव हो सदा ही ऐसा प्रेम बढ़ता ही जाए तो हे सखे, वासना शब्द को केवल वासना कहना ही वासना शब्द वासना के प्रति एक न्याय न कर पाना अथवा ज्ञान का कम होना, अज्ञानता भरा भाव या फिर भाव दशा मात्र समझ ना पाना ही तो कहा जा सकता है! क्या तुम नहीं कह सकते कि यह प्रेम, वासना का वासना से परे का भाव मात्र है। होगा न? सत्य, पर जब दो देह का ही अंत जब दो आत्मा के रूप सत्य को जान सकता है तो फिर वासना को मात्र देह के रूप ही क्यों, न फिर दो आत्मा सत्य ही जान कर इस दो देह द्वारा एक हो जाने की बात ही क्यों कही जाए? सत्य तो केवल, दो आत्मा का एक होना मात्र कहा गया पर दो देह का रूप ही? वासना का तो यह अर्थ निकाला गया, तो यह पाप कैसे कहलाए? यही तो रस भाव है! जो प्रकृति रस से साक्षात्कार से भरा, समभाव के रस ज्ञान वासना का अंत तो मित्र, न केवल रूप रस गंध मात्र वासना मात्र नहीं, बल्कि प्रेम, निर्मल प्रेम ही वासना है जो कि देह द्वारा भी एक होने की इच्छा तो करे परंतु सदा देह-भाव से ऊपर हो कर भी सत्य हो जाए। केवल वासना का ही नाम देह रस, रूप के रूप मात्र वासना-भाव को एक रूप दे... । देह-भाव मात्र वासना के रूप को जब हम एक रस वासना मान लेते हैं जहां देह वासना रूप में ही सब कुछ मान कर देह को सब कुछ मान कर केवल भोग मात्र ही? तो उस रूप को तो हम कह सकते कि केवल देह भाव का रूप रस गंध सब कुछ देह से संबंधित मात्र ज्ञान मात्र ही रह कर देह तक लेकिन देह-भाव वासना का रूप रस भाव भी न जाने, तो वो दो देह के रूप मात्र में वासना समझ कर वासना का उपहास कर अज्ञानता को ज्ञान कह, उसे वासना का नाम देकर पाप ही तो कह रहे। यह तो रस रस--है! जिसे जान कर वासना तृप्त हो उस रूप रस को प्राप्त हो जाए जो, जो देह के रस रूप ज्ञान मात्र ज्ञान मात्र न 12