एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँच श्लोकों तक तो इस महाकाव्यके रचनाकालके सम्बन्धरूपमें ग्रन्थ--रचना-उद्देश्यका ही काव्योचित चमत्कारका प्रतिपादन कर अब ग्रन्थ के प्रारम्भ में जो मङ्गल रूप पद कहा गया था उसकी व्याख्या की आवश्यकता समझ-बूझकर ग्रन्थकी रचना क्यों, किस प्रयोजन से कीगई, मङ्गलके पद का क्या भाव हृदय में समाविष्ट था इसका अब वर्णन इस काव्य द्वारा करते हैं। इस काव्य में जिस पावन चरित्र तथा उस चरित्र के अधिष्ठाता का गुणकीर्तन कियागया है उस का स्वरूप क्या था तथा वह गुणकीर्तन किसप्रकार कियागया इसपर प्रकाश डाला गया है, सो कहते हैं कि उस पद के द्वारा केवल इतना मात्र संकेत कर देने परकि 'जिनके द्वारा' मात्र कह देने से तो काम नहीं चला, सो कैसा स्वरूप उन का था इस बात को स्पष्ट समझने के लिये यह कहा गया है, सो पहिले अर्थ को समझ लें। जो भव्य जीव जो भी आत्म या पर का स्वरूप देखते हैं, सो बिना ही जाने वा, बिना जीवादि के यथार्थ स्वरूप जाने नहीं हो सकता, जिस से संसार का अन्त हो जाय, ऐसी मुक्ति अवस्था के लिये जो भव्यजीव प्रयत्न--के पात्र--अधिकारी हैं उनको जो उपदेश या प्रेरणा इस ग्रन्थ द्वारा दी गई है उसका तात्पर्य ही मोक्षमार्ग को न समझने वाले अज्ञानी जनों के लिये यह ग्रन्थरूपी दीपक है। ग्रन्थकार को भी मोक्ष पद को प्राप्त करानेवाला सिद्ध हो सके यह भी, कारण ग्रन्थ की रचना करने में मुख्य तथा प्रधान हेतु समझा जा सकता है। इस प्रकार ग्रन्थ के निर्माण का जो प्रयोजन, वह भव्य जीवों को सन्मार्ग की ओर ले जाने का साधन रूप सिद्ध हो यह इस काव्य से, स्पष्ट समझ लिया जासकता है। सिद्ध-जीवों का स्वरूप तो सब ही शास्त्रों में, कर्म रहित होने से शुद्ध ही कहा गया है। सो इस पावन स्वरूप का कथन करने वाला ग्रन्थकार कैसा होना चाहिये! ऐसा ग्रन्थकार भी शुद्ध होना चाहिये तभी वह इस प्रकार का ग्रन्थ लिखेगा! सो उस ग्रन्थकाररूप पवित्र आत्मा को जो अपने ही स्वरूप का अनुभव कर रहा है ऐसा जो सम्यग्दृष्टि है उस आत्मा को सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान तो है ही, साथ ही सम्यक् रूप आचरण भी उसका हो सकता है। यह ग्रन्थ-कर्ता का गुण है। ग्रन्थ-रचना में, ऐसा यथार्थ-ज्ञान आत्मा युक्त ही हो कर ग्रन्थ को प्रमाण बना सकता है। जब भव्य जीवों को इस ग्रन्थ का आदर करना हो अथवा इस ग्रन्थ से लाभ उठाना हो तो इस ग्रन्थकारके स्वरूप का मनन करना बहुत ही जरूरी बात समझी जाय, सो ग्रन्थ-रचना का जो भी कारण है, भव्य जीवों के कल्याण की भावना मात्र है, ग्रन्थकार किसी भी लाभ के लिये, चाहे वह ख्याति के रूप-में प्राप्तहोती हो अथवा द्रव्य के रूपमें मिलती हो, अर्थ-सम्बन्धी प्राप्ति का ग्रन्थ कर्ता कभी भी अभिलाषी नहीं होसकता। केवल पावन चरित्र रूप सिद्ध-पद का वर्णन ग्रन्थ-कर्ता ने किया, भव्यजनों को उस ओर, आत्म-स्वरूप साक्षात्कार करने के लिये, साधन के रूप में, सिद्ध-पद को प्राप्त हो कर जो सब से बड़े ग्रन्थकार हुए हैं उनका रूप इस ग्रन्थ में बताया गया है जो कि भगवान् ऋषभदेव थे। ऋषभ देवने केवल ज्ञान प्राप्तकर, सब ही जीवों के लिये कल्याण का मार्ग बताया। ज्ञान ही तो आत्माका स्वरूप है, जो सब ही संसारी जीवों में विद्यमान है। उस ज्ञानात्मक स्वरूप का वर्णन इस ग्रन्थ में किया गया है, जिसका मनन प्रत्येक मुमुक्षु को करना आवश्यक समझा गया है--यह सब ही भव्य जीव, जो इस ग्रन्थ को मन-वचन और काय से पढ़ते हैं वे-भी इस पदके अधिकारी बन जाते हैं। इस काव्य का भावार्थ यह, कर्मों के विनाश करने वाले पद को प्राप्त करने के लिये उस पद का स्वरूप तथा उस स्वरूप वाले गुरु का पद सब ही जीवों को, जो भव्य हैं और जो संसार से पार जाने के लिये उत्सुक हैं उस पद को प्राप्त कर सकते हैं, इस लिये इस काव्य का आशय यह ही हुआ समझ लेना चाहिये कि यह ग्रन्थ, मोक्ष को चाहने वाले भव्य जीवों का, "मोक्ष को देने वाले भगवान् का यह स्वरूप है। उस स्वरूप को तुम सब मनन करो जिससे, संसार के जन्म और मरणरूपी चक्र से मुक्ति पा सको।" यह भाव बतलाते हुए "केवल ज्ञानके इस स्वरूप को प्रकट किया" ऐसा अर्थ समझना चाहिये। इस ग्रन्थ-कर्ता ग्रन्थकारने जो कथन किया है, कार्य-रूप कारणका कथन समझ कर सिद्धान्त रूप में समझ कर ग्रहण तो करना ही चाहिये, पर केवल उस कथन रूप वचन के बलपर ही मात्र विश्वास कर लेना ही उचित 123