भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

एक राजा अपनी सेना को लेकर जब किसी वन तरफ निकला व प्यासा हुआ तो एक ग्वाले को वहाँ उपस्थित देख कर उससे जल माँगा तो उस ग्वाले ने शीतल सुगन्धित जल लाकर राजा को दिया, जिसको पाकर राजा का मन बहुत प्रसन्न हुआ, वह विस्मित हो विचारने लगा, यह ऐसा स्वादिष्ठ व सुगन्धित जल, अथवा इसके निकट का वातावरण इतना उत्तम क्यों, यह विचार विचार कर उसने ग्वाले को इस स्थान विषयक सब भेद पूछा जिसके उत्तरमें ग्वालेने कहा कि यहाँ एक महात्मा रहते, व जिनका यह सब उत्तम प्रभाव देखने में आ रहा, पर महात्मा किसीसे बोलते अथवा बात न करके मौन रहते वा ईश्वर के ध्यानमें लीन रहते हैं, जिसको सुनकर राजाको आश्चर्य हुआ क्योंकि केवल मौन? तब राजा उस महात्माके दर्शन को व उस जल को देख आश्चर्य करने लगा पश्चात् राजाने महात्माको, यह प्रश्न किया? एक बार किसी विषयक बातों का जो एक बार उत्तर दिया, सो उस उत्तर व उस महात्माके तपस्वी स्वरूप देखकर राजा विस्मित हुआ कि बिना तप के यह सब फल नहीं मिल सकते वा महात्मा केवल मौन नहीं है, किन्तु यह आत्म ज्ञानमें वा परमात्माके भी ध्यान विषय ज्ञान रखता हुआ सब भेद ज्ञान रखता जान कर के, जो एक बार जल का कारण का उत्तर मिला इसलिए? राजाको यह दृढ़ निश्चय हुआ कि इस महात्मा द्वारा, मेरे मनका अज्ञान दूर हो सकता है। जिससे कि राजा को भेद वा, अज्ञानताके कारण भ्रम था, जो दूर हुआ, अब मन शांत हुआ व राजा विचारने लगा कि, अरे मन! महात्माके केवल शारीरिक स्वरूपको देख धोखा खाया जिस पर अज्ञानताके कारण अज्ञानतावश यह भ्रम उत्पन्न हुआ था, उस अज्ञानता को, इन पूर्ण महात्मा ने शांत कर दिया आदि। इस लिए शिष्यका यह पहला कर्त्तव्य हो, जो सब प्रकार का मन शांत कर, पहले दिए हुए सब उपदेशको मन शान्त करके सुने, ना कि दूसरेके रूप रंगको देख कर, अथवा मन में यह बात धारण करके, ज्ञान ग्रहण करनेवाला शिष्यके गुण का पूरा लाभ उठाए तथा दूसरेके मन को भी अपने दुर्गुण अथवा चंचलता द्वारा ना ही कष्ट पहुँचाए? जिससे दोनों तरफ हानि होनेका सम्भव जान कर पश्चात् जो कुछ शिक्षा का लाभ, अथवा सन्मार्ग का बोध हो सके आदि। चौथा नियम यह कि प्रत्येक को इस बातका सदैव ध्यान हो कि जब व किसी सत्संग वा शुभ कार्य पर या किसी सत्-संग स्थानपर जाएँ तो अपने मन को काम-क्रोध विकारों से तथा मन की चंचलताके या विषय वासनाओं से बचाए रखें, ना कि सत्संगपर जा कर भी, वासनाओं विकारों को मन द्वारा अपने अन्दर बसाए वा विचार करे, कि दूसरा किस कर्ममें है, क्या कर रहा, ना ही उस कर्मको अपने अन्दर जगह देवे वा, अपने मन को, शांत रखे वा, जिस मन द्वारा सत्संग अथवा सत्संगके उत्तम उपदेशको ग्रहण करके अपने आचरणको शुद्ध बनानेका सदैव यत्न हो सके ऐसा करे, "सत्संग मनुष्य के लिए सब से उत्तम साधन है" इस लिए मन को सदैव सत्संगके वचनों पर ध्यान दे कर शुद्ध रखने की यत्न करे। सत्संग विचार को शुद्ध करे, अशुद्ध को सब त्याग देवे, क्योंकि सत्संग ही ऐसा है कि जिस से सब प्रकार का लाभ मिले इसलिए केवल सत्संग का ही लाभ ग्रहण करना चाहिए जिस लाभ से प्राणी सब ही सब प्रकारके क्लेशों से छूट कर शान्तिको प्राप्त कर के ना कि, इन वासनाओं वा सांसारिक प्रपंचों द्वारा तन-मन, बुद्धि-चित्त, सब कर्म, कर्मेन्द्रियों, सब को दूषित बनाकर अज्ञानता विस्तार कर ले। इस लिए जब सत्संग रूपी साधन मिला हो, जिस कल्याणकारीसाधन, सच्चा सन्मार्ग मिला हो, तब मन को एकाग्र कर सत्संग रूपी रस ग्रहण कर के जो कुछ अशुद्धता वा विकार था, उस को दूरकर व अपने अज्ञानको दूर करने का जो सब लाभ का पूरा लाभ उठाए? सो ही उस साधन व ज्ञान दाता दाता का भी यश होगा तथापि यह खुद संसार को छोड़ जाएगा? सो सब गुण का साधन ही सच्चा सत्य कार्य कहा गया पाँचवाँ नियम यह उपदेशका तथा जो उपदेशको मन द्वारा धारण किए हुए पूर्ण सत् गुरु स्वरूप, जिस आज्ञा का पूर्ण रूप पालन करे व उसी अनुसार अपने मन को सब ओर से हटा कर, उस एक चरणमें वा, उपदेश में, ध्यान को पूरा लय करे... । अर्थात् सो, उस आज्ञा रूपी हर एक बचन द्वारा आज्ञा अनुसार अपना मन लगा कर सब ओर ध्यान को ना भटकावे ना ही मन रोके, ना ही मन को इस बात तरफ दौड़े कि यह क्यों हुआ वा वह क्यों हुआ सो, इस प्रकार अहंकारको दूर कर शुद्ध मन को गुरुके हर बचन रूप चरण आज्ञा में, अर्पण कर के सब प्रकार अज्ञान रूपी, मोह 136