एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि काम रूपी साँप का विष चढ़ता ही, क्योंकि कामके वशीभूतहोकरजीवका विवेक नष्ट होकर जाता है, तथापि इस विषका यह स्वरूप समझ करके इसका प्रतीकार करना ही तो विवेकीका कर्तव्यहै। काम रूपी सर्प का फण कामकी तृष्णा रूपी मणि युक्त जो दिखाई पड़ताहै उसीपर पैर रख देनेसे सर्पका मुखमण्डल पिसता, हां, उसकी तृष्णा दूरहोनेसे उसका पराभवहोता है। जो कामकी तृष्णा नष्ट नहीं करसकते वेही कामरूपी सर्पके फटके मुखमें पड़े रहकर यम का दूत अपने हाथमेंरहनेवाले यम दंडसे, उनके शिरपर प्रहार करके उनको पीडित करता है, उस समय, उनके केवल प्राणमात्र रहतेहैं और ऐसा दुख भोगते भोगते वे नारकीके समानहो जातेहैं... ॥ केवल इतनाही नहीं काम पीडित जीव काम क्रीडामें लीन होकर अनेक अकृत्यका साधन करके अनेक पापका अर्जन करता, काम से अन्धा हुवा मनुष्य तो मन चाहा बोलता, अनुचित कार्य करता, अन्याय को ही न्याय समझ कर बिना विचारे धर्मात्मा पुरुषोंका भी अपमान कर देता है। सारांश यह कि काम, जो पुरुष, हर समय में काम के वश हो जाता है वह सब, तरह के पाप कर्मों का ही संचय करता है। जो पुरुष काम सुखके लिये सब प्रकार के अकृत्य को करता है वह क्या अंत में यम यातनाको न भोगे ? धर्म शास्त्रके अभ्यासी इस काम को ऐसा दुष्ट कर्म कहते हैं। अतः वे इस विषय में कहते हैं क्यों? संसारके सब जीव, यदि वे चाहें तो कामके सब सुखोंका पूर्ण प्रकार से अनुभव करसकते हैं। पर क्या अनुभव से वे उस काम को तृप्त कर सकते हैं? कदापि नहीं करसकते? कभी नहीं, कदापि संभव नहीं है! फिर इसे क्या कहें? संसारका यह धर्म, अथवा यों कहें सब काम चेष्टा इसका कारण अथवा कार्य, जो कुछ भी इस काम का स्वरूप रहा, सो सब काम रूपी मूस में मन रूपी जो पारा भरा हुआ रहता है उसी को भस्म करदे, उस भस्म को एकत्रित कर कामदेव अपनी इच्छा के अनुसार नया रूप निर्माण कर के चलाता रहता है, काम के हाथ का यह सब खिलौना बना हुआ संसारका यह सब जीव रूप का खेल बना। अनेक प्रकारके फल जो फलते हैं वे-कमल-कमलके समान हैं। जो-कमल के समान काम रूपी फल हैं, सब काम भोगों द्वारा, काम-रससे सींचे हैं, सो भस्म होवें, सो सब जल जावें, इन फलोंको जो खा कर जी-रहना चाहतेहैं सो-सदाके लियेमर जावें, ऐसा भाव इस का समझना। जब सब काम और कामसेवियों का यह हाल है, तब कामिनी को त्याग ही देना, उचित होगा ना? जिस तरह, एक विष का भरा हुआ कटोरा ना पिया जाय तो, उस का प्रभाव किसीपर ना पड़ सके ना ही वह जीव उस का शिकार बने? ठीक उसी, तरह यदि किसी का भी काम रूपी फल का वा कामिनी का त्याग ना होगा तो उसका क्या होगा? वह सदा, ही इस कामरूपी मूस में, या इस प्रकारके संसारके जी-भरके भोगों रूप जो, फलहें उन काम-भोगों का ही रस, कामदेव को देता, वह कामदेव इन सब को ही तो मन रूपी पारेको भस्म कर नये रूप देता रहता। ऊपर सब कह चुके हैं, काम विकारको नाश करने का एकही साधन है, काम वासना को भस्म करना, सब प्रकार कामके वश न होकर मन तथा इन्द्रियों को वश में रखना ही श्रेय, हर प्रकारके सांसारिक भोगों का त्याग कर अपने ज्ञान को शुद्ध कर देना ही काम वासना का पूर्णतया नाश हो सकताहै, सो सब को इस बात को जानकर ही चलना चाहिये, कि काम वासना को नष्ट कर देनेका एकही उपाय है, जिसके द्वारा काम का नाश होसके। जो जो जीव इस संसारके भवभ्रमण में पड़ गये हैं वे सब जीव कामकी इच्छा के वश हो कर ही पड़े हैं। काम रूपी सर्प का पराभव ना कर, कामके! पंजे में फंसने वाले सदा कष्ट ही क्यों पाते? अतः कामको जीतने का उपाय करो, इसके लिये, जो उपाय इस ग्रंथ में बताये गयेहैं, उनका ठीक ठीक साधन करना चाहिये। काम का रस जो, काम इच्छा रूपी पारा का मूस जो मन रूपी कहागया उसके रस को पीकर काम नामक रसिया किसी को जीवित न रखेगा या सदा उसे संसारका ही कीड़ा बनाये रख कर कष्टही तो देगा? सो पुरुषों को सांसारिक मोह को त्याग देनाही श्रेय, सो जो जन इस प्रकार मन को जीतकर हर काम रस को त्याग कर ही अपने को पावन कर लेते हैं वे संसारके इस आवागमन रूपी दुःख जालसे छूट जाते हैं। सारांश यह, सब प्रकार काम वासना तथा संसारके सब ही प्रकारके दुःखों का मूल ही काम वासना है। कामके वश हो कर ही यह जीव सदा ही यम दूत के हाथसेपिटता हुआ सब प्रकारके दुःख भोग कर संसारके ही फेर में पड़कर ही कभी भी सुखको प्राप्त न होकरके, सदा कष्ट भोगता ही रहता है, अतः काम रूपी विषको त्यागो! जो त्यागेगा, वही 138