एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंविचार यह था उसका, शरीर को स्वास्थ्य लाभ पहुंचे तथा दिमाग को शांति मिले और काम का भारमय बोझ हल्का होकर फिर से नवीन रस उत्पन्न करे जीवन को आगे गतिशील बनाने योग्य जो कि उस २ मासके अवकाश अंतराल में प्रायः-सा खो गया लगता था काम की अधिक व्यस्तता हेतु, पर हुआ तो कुछ और उल्टा ही, पर परिणाम इस तरह एकाएक तो नहीं हुआ था, जिसके लिए वह या तो वातावरण अथवा समय को कारण मान सकता पश्चात् में स्वयं को कारण ठहरा कर तो ग्लानि अनुभव कर सकता? फिर भी स्वयं को दोषी न मान, पर समय परिस्थिति अनुसार ही? नहीं ऐसा सब कुछ अपनी विवशता का रूप लगता? दोनों का परिणाम एक जैसा मानकर चलना स्वयं को कम गलत या गलत ही नहीं सिद्ध कर सकने का अनुकूल अवसर खोज लेना मात्र होगा प्रत्येक का विचार या फिर स्वयं सोच पर निर्भर था, समय जिस तरह का रूप ले रहा तथा उतार-चढ़ाव उपस्थित कर रहा, परिस्थितियों का बहाना ही मात्र सहारा सोच- समझ अपनी ही सही, यथार्थता को मान कर तो चला जाता समय का ही प्रभाव था अथवा मनुष्य स्वयं अपनी समस्या या उलझन रचने वाला बन बैठा-- जिसका अंतिम रूप ही दुखद अथवा सुखद या फिर दोनों ही न होकर मात्र समय का जैसा रूप उपस्थित होता जा रहा उसी को उसी रूप में ही स्वीकार किए जाने की विवश स्थिति रही, जिसे न चाहा गया अनचाहा! स्वीकारना वास्तविकता के ही विपरीत ठहर सकता था, पर सत्य यही था, जिसे स्वयं अपने ऊपर ही लागू किया गया था उस रूप, जिसे मन जैसा या उपयुक्त रूप दिया गया था, जिसे समय का परिणाम ही तो कहा जाएगा, जो स्वयं द्वारा तो नहीं रचा गया पर समय तो उस रूप साधारण ही उतार-चढ़ाव उपस्थित कर ही सकता था जिससे हर मनुष्य को गुजर कर उस भारमय बोझ को ढोते रहने को तय कर ही तो चलना पड़ा करता था जिसके न तो उस रूप में कोई नए ही लक्षण दिखाई देते जिस से भय या अन्य प्रकार की सोच को सिर पर सवार सा ही कर सकने योग्य समय का ही प्रभाव माना जाए या मनुष्य का अपने ही पग को डगमगा देने का कार्य कहा जाए जिसका परिणाम रूप ही तो सामने प्रकट था जिसको न चाहते हुए भी स्वयं सिर आंखों उठाए बैठा था या फिर अपनी सामर्थ्य से बाहर ही बात समझ कर शांत बैठ स्वयं को सहारा दे सकने योग्य नहीं रहा, यद्यपि था तो ऐसा कुछ विपरीत ही तो सब आभास पाकर ही शांत वातावरण खोज लिया गया जिसका लाभ कितना हो सकता था इसका सही प्रमाण स्वयं उपस्थित होता जा रहा था, जो वास्तविकता सामने आ चुकी उसकी वास्तविकता झुठलाई तो नहीं जा सकती, फिर भय किस बात लेकर मन भयभीत, संशयित! स्वयं वास्तविकता स्वीकार करने योग्य था या तो समय सब को अनुकूल बना दे, या स्वयं ही अपने पग पीछे हटाने होंगे या फिर सब को उस रूप स्वीकार करके चलना होगा जिस रूप में उपस्थित था जिसे स्वयं अपनी कल्पना के अनुसार अनुकूल बनाने की चेष्टा करके वास्तविकता खोकर केवल स्वयं को संतुष्ट करना, भ्रमित रखना मात्र ही तो सिद्ध कहा जा सकता था जिसका वास्तविकता खोज पाना स्वयं अपने ही ऊपर निर्भर, समय विचार का समय पर निर्भर कर तो बहुत समय व्यर्थ गंवाना आवश्यकतानुसार ही सिद्ध होना संभव था या हो भी सकता था, पर समस्या को स्वयं सुलझा लेने की क्षमता-योग्यता के बल पर यदि आगे का कदम बढ़ा कर परिणाम देखा जाए तो उस वक्त परिणाम रूप या तो स्वयं अनुकूल ही सिद्ध हो सकता था अथवा यह निर्णय तो फिर स्वयं के हाथ रहने का ही होता, समय तो अपना रूप तो स्वतः प्रकट करता केवल मनुष्य को उस रूप स्वयं को बदलना ही तो पड़ जाता, जिससे नए विचार जन्म लेते रहते जिससे मनुष्य को न तो इस बात दुख होता, न ही वह व्यर्थ का सोच कर बैठता? परिणाम तो हर रूप बदल ही रहा था पर स्वयं परिवर्तन को वह स्वीकार करता गया स्वीकार तो हो रहा था, फिर भी संशय क्यों उसके सोच विचार में समा बैठा था। समस्या का समाधान तो स्वयं अपने ही हाथ रहा था सब कुछ के उपरांत भी, यह जानते हुए, सब वास्तविकता को जानते हुए अपने कदम को पीछे ही खींच रहा जिससे न तो मन शांत रहकर कुछ सोच सकने योग्य था, न ही पग आगे दिशा विशेष की ओर बढ़ पाने का ही दम भर सकता, जिस का हल स्वयं अपने ही विवशता स्वीकार कर शांत होकर बैठ जाना ही था। 143