भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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पिता-पुत्रने बातचीत बन्द कर दी। दोनों भोजन समाप्त करके बाहर आये। बाहर आकर बड़े वैशम्पने छोटे वैशम्पसे कहा कि क्या बात है भाई? पिता-पुत्रमें यह बात क्या हुई। वैशम्पने अपनी विपदाका हाल कहा, जिससे सुनके व चकित सा रहके मन ही मन कहने लगाकि इसपर विपत्ति पड़ी है। वैशम्पने कहा कि भाई मुझे बड़ा सोच हुआ। उसने कहा कि तुम चिन्ता कुछ न करो। भोजनके उपरान्त जब सब मिलने गये तब बड़े वैशम्पने पिता-पुत्र दोनोंको सम्मुख पाकर जो बातचीत कही सो हम कहते हैं। उसने कहा कि हे तात आप बड़े हैं और हम छोटे हैं। कहिये आज कैसा, आपके भोजन करनेमें हुआ तब तो वह पिता-वैशम्प जो विवश होकर अपने पेट पर हाथ धरके कहने लगा कि हे तात मुझसे भोजन न हुआ। उस बच्चे ने कहा क्यों! कहा उसने कि; विवश हुआ, वैशम्पजीने पूछा कि आज क्या था जो आप ऐसा भोजन करके विवश हुए, कहा कि आज खीर में खाण्डके बदले किसीने नमक डाल कर दिया इसलिये अधिक खाई गई। उस बच्चे ने भी कहा कि पिता जी मुझे भी बड़ी भारी तृष्णा हुई सो अधिक खाकर भोजन पर विवश हो गया! सो यह वैशम्पसहित सब कोई हंसने लगे कि जो बात पिता कही वही लरिकाने भी कही- इसपर विचार कीजिये, जहां विषय की आसक्ति बढ़ गई और तृष्णा बढ़ गई वहां पेट भरके भी पेटका भरना नहीं माना जाता है, इस बातको वैशम्पजीने बड़ा भारी संकट समझा। क्योंकि पेट, सब वैशम्पका भर गया था। इसपर विचारना चाहिये-विषयासक्त जो लोग हैं उन लोगोंके पेट तो भरते हैं पर तृष्णा वैसीही बनी रहती है। वैशम्पजीने कहा कि जिस बातको तुम आनन्द का विलास मानते हो यह बात तो बड़े ही खेदकी जान पड़ती है, जैसा वैशम्पने कहा सो सुन के पिता ने वैशम्पसे हाथ जोड़ कर कहा कि हे वैशम्पजी महाराज कृपा कीजिये कि ऐसा फेर छूटे। वैशम्प कहने लगे कि सब आसक्ति पहले त्याग दो, तदन्तर यह फेर छूटेगा। उसने कहा "आसक्ति का त्याग वैशम्प जी कीजिये, जिससे भोग विषय वासना छूट-ही जाय, पर फेरके ही कारण प्राण न जाय सो उपाय कृपा कर कृपा कटाक्ष कीजिये" वैशम्प बड़े उदारके समान अपने भक्तपर कृपा दृष्टि करके व स्वरूप का ध्यान करके व वैराग्यके रस सहित हो कर बोले कि, हे भक्त सुनो, जो तुमने यह विचार किया; बड़ा ही शुभ विचारा, जिससे सब आसक्ति त्याग करनेके योग्य ही है, संसारके सब भोगोंको विष समान है, यह तो सब दुःखका ही कारण है। संसारका स्वरूपही दुःखका स्वरूप है। जब यह विचार दृढ़ होकर चित्त में बैठ गया सो तृष्णा जो छूटेगी, विषयों से विरक्त हो जाना ही परम सुखका मूल कारण रूप है। इससे तू चित्त स्थिर करके जो स्वरूप का ध्यान कर रहा था उसीपर चित्त लगाय रहो सो यह वैशम्पका मत, महापुरुषों का मत केवल ज्ञान ही का स्वरूप है, इससे सब को वैराग्य का स्वरूप समझ लेना चाहिये जिससे सब मोह, माया की जो छाया, इस बात रूपी सब भरम मिट जाय। यह तन जो व है, सो विनाशी न हो, मन को स्थिर न करो, केवल भजन ध्यान चित्त को दृढ़ करो, मन को एकांत करके ध्यान करने का अभ्यास ही व ध्यान का उपाय वैशम्पजीने कृपा करके जो कह दिया, सो तो सच्चा ही, पर जो, विषयाभिलाषी है, जिनके चित्त वैशम्प की कृपाका सो आनन्द लाभ नहीं उठाता सो वैशम्प के उपदेश, पर अविश्वास ही करें इसपर विचार करो, जो जो पद कहे सो सो, केवल मुक्ति का ही तो वैशम्पका मत ही तो है, दूसरा अविश्वासी सब क्या जाने कि सन् सन् का क्या पद होता? यह तो उस पुरुष जाने जो सुधी, जो केवल ज्ञान का साधन या वैराग्य का वा ईश्वरके जो ध्यान ज्ञान को दृढ़ करके जो ध्यान को करता, सो परम आनन्द के स्वरूपको क्यों न पाता? हां, मन विरक्त रूप सब तृष्णा काम को त्याग कर जो एकांत व हो, सब विषयको मन की जो जो बात है चित्त लगाय ध्यान कर सदा सन् रहकर तृष्णा को त्यागता सो ही, परम पदको प्राप्त होता व पावता। वैशम्प प्रभु का ध्यान कर, केवल अपने मन को जो संत, सो चित्त एकांत करि ईश्वर का ध्यान करके परम आनन्द रूपी वैकुण्ठ को प्राप्त, सो चित्त एकाग्र करके व सब विचार त्याग कर केवल जो ईश्वर का ध्यान ही चित्त में धार प्रभुके स्वरूपको मन में, स्थिर करके मन ही मन व हो, सब त्याग कर चित्त लगाय वैकुण्ठ वैकुण्ठधाम पावे, समझे? सो सोचो जरा, सब आनन्द रूप को सुख भोग सब पद को त्याग कर जो प्रभु भजन करे वैकुंठ पद सब आनन्द दाता पाया॥ 154