भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 322 में से

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जिसने किसी को धोखा दिया, विश्वास तोड़ा? जिसने भूख का ग्रास छीन लिया किसीका, किसी अशक्तपर जिसने अपनी ताकत का प्रयोग कर दिया, जिसने दो को लड़ा दिया और घर को फूंक कर तमाशा देखा, कौन इनका न्याय करेगा? क्या न्याय प्रकृति करेगी बिना किसी माध्यमके? माध्यम तो वह बनाए किसी को, पर जिसपर बीती तकलीफ न्यायका तो उसका कोई सम्बंध निकलता ही, प्रतिहिंसाकी बात छोड़ दीजिये कि किसीने एक हाथ मारा तो बदले में दो हाथ वो भी मारे, न्याय तो उसपर निर्भर न होगा न ही ऐसे न्याय को न्याय कहा जाना चाहिये। ये, जिसे "न्याय", कहा जाता रहा है वह न्याय शब्दका वास्तविक अर्थ रखता हीनहीं! न्याय किसी, बदले या हक लेने मात्र तक सिमट कर नहीं रह जाता बल्कि वह उस अधिकार की रक्षा करता हुआ न केवल उस व्यक्ति को ही रक्षा देता, न केवल उस हकदार को, न केवल उस उस हक खोने वाले को न्याय दिलाता बल्कि भविष्यमें कोई ऐसा न्याय को चुनौती न देसके ऐसी दीवार भी खड़ी कर देता। इस कारण न्याय की पद्धति इस रूप में नहीं सोची जा रही जैसी कि आमतौर पर सोची जा सकती, जिसे न्याय की प्रतिष्ठा मात्र ही मान लिया जाय। कृष्ण खड़े हुए, "आप अपने विचार बतायें बाद में इस न्याय रूप को रख दूंगा" नन्द ने अपनी बात रखी व समर्थन मांगा व बाकी लोग भी बोले। कुछ ने अपनी बात रखी व समर्थन मांगा व बाकी लोग भी बोले। कुछ ने अपनी बात रखी व समर्थन मांगा व बाकी लोगोंने। "अगर किसी का हक मार लिया हो, न केवल हक ही या उसका धन सम्पदा किसी ने छीन लिया, या किसी दुर्बल पर या कम तादाद वालों व किसी असहाय पर वार हो, तो न केवल उसको वो सब हक दिला दिया जाये जो कि अधिकार में था और छीन लिया गया बल्कि जिसे हक दिया जाये-उसका हक इतना सुरक्षित हो-उसकी तरफ कोई नजर उठाकर देखे इसके दो अंग होने चाहिए पहला यह, कि वो सशक्त होकर रहे ताकि कोई वार न करने पाए दूसरा न्याय यह" जो कृष्ण बाद तक लेकर चलते रहे कि सिर्फ न्याय नहीं बल्कि, जो जो परिस्थितियां न्याय के न मिलने देनेवाली या अन्याय को जन्म देनेवाली बनी उन सब को हल किया जाय जब तक न्याय प्रणाली पूर्ण रूप से सच होकर, हर परिस्थिति व व्यक्ति स्वयं सक्षम न हो जाये, हर परिस्थिति व व्यक्ति अपनी सुरक्षा खुद कर सके या कर ले, यह आवश्यकता न समझे उस समय आस-पास के लोग कुछ ऐसा समझे, क्या बाद में आने वाली परिस्थितियां इस कृष्ण न्याय-व्यवस्था द्वारा हल होने को सक्षम थीं या उस समय जितनी समस्याएं थीं उनके लिए, कृष्ण न्याय प्रणाली काफी थी या उस समय अन्य लोग अपनी सोच आस-पास सीमित रख कर सोचते रहे जो कि बाद में चल कर कृष्ण द्वारा ही हल की गयीं लेकिन तबतक अन्य राजाओंद्वारा अपनी सत्ता बढ़ाने के मद में किया गया अनर्थ काफी नुकसान कर चुकाथा या यह कह लें कि ऐसा चक्र-व्यूह-रचा, कौरवों ने, जिसमें खुद उनके हितचिंतकों का ही दम घुटता नजर आ रहाथा। ये न्याय प्रणाली क्या? कृष्ण द्वारा शुरू किया हर व्यक्ति सक्षम हो या न हो लेकिन न्याय तो सब जगह एक जैसा मिलेगा? या कृष्ण न्याय था, जो न्याय नहीं अन्याय? वो तो कह रहे निष्पक्ष न्याय का कोई अस्तित्व नहीं होता, न्याय तो उस पक्ष का होगा जिसके साथ अन्याय? वो कैसा पक्ष होगा उस पक्ष का क्या अर्थ था, वो क्या अपने आप बनेगा? या बना-बनाया रूप मिल जायेगा? या उस समय की समस्या रूप जब बात न्याय की आती सब इसका पक्षपात समझते, बल्कि निष्कर्ष यह न निकाला जा रहा बल्कि यह था कि, न्याय व्यवस्था सब जन तक पहुंचे इसलिए था, पर वो जन सब मिलकर एक समान ताकत बन सकें, जो हर जन तक न्याय पहुँचा सके ऐसी बात, या वो ऐसी प्रणाली थी जिसमें सब को आवश्यकता के अनुसार न्याय रूप दिया जा सकता बल्कि न्याय के पीछे एक ऐसा बल खड़ा था जोनिः-पक्षपाती भावसे न्याय करने सक्षम बनता? क्या स्वयं कृष्ण थे? क्या कोई संगठन? गोकुल के सब से सब साधन कृष्ण के हाथ में आ गए थे इस तरह कि बिना किसी दबाव के सब लोग? या कृष्ण ने ऐसा सोचा जिस तरह से सब का? यह बात आगे तय होनी थी कृष्ण द्वारा सोचे गए हर एक कदम से। पर वो जो भी कर रहे थे उस से न केवल गोकुल की एक जुटता नजर आ रही थी बल्कि उस गोकुल व्यवस्था द्वारा अपने विकास को भी देखा जा रहा था और कृष्ण खुद आगे बढ़ कर कह रहे, सहायता करने विचार बदलने की। 157

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