भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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तब यह जीव अपना स्वरूप भूल कर देहादि पदार्थों को, जिस तरह एक मूढ़ अपने पहने वस्त्रों तथा शरीर को देखकर खुश या दुःखी होता है, देहादि का सुख दुःख अपने ऊपर मान कर संसारीजनों समान सुखी और कभी महा दुःखी होता हुआ जन्म और मर कर इस भव रूप महा दुःखदायी कुण्ड में ही, अपने किये कर्मों द्वारा ही भ्रमण करता रहता हुआ कभी स्थावर कभी त्रस रूप चौरासी-लाख योनियों विषे अनादिकाल से ही परि भ्रमण कर रहा है। सो यह जीव अनादि से अविद्या को, जो कि अपने स्वरूप तथा देहादि को पृथकरूप से नहीं बतलाती स्वरूप को, जो देहादि को आत्मा मान मिथ्यादृष्टी, कर्मबन्धकपना जीव को करती है। सो अज्ञान जन्य देहादि का वासना रूपी अन्तःकरण रूप मलिन दर्पण समान ज्ञान है, सो मिथ्या ज्ञान है। ऐसे अज्ञान रूपी अन्धकार द्वारा आच्छादित रूप यह देहादि विषय को उत्पन्न कर के संसारिक सुख, जो केवल अज्ञान ही द्वारा सुख रूप भास होता हुआ क्षण भर का ही सुख है। सो इस अज्ञान देहादि सुख की लालसा रूप पिपासा द्वारा कि जिस तरह से कि कस्तूरी मृग अपनी नाभि में, जिसे स्वयं उसने धारण कर रक्खा उस सुगन्धित द्रव्य, जिस का वह स्वयं ही स्वामी है, उस की सुगन्ध से मोहित होकर उस सुगन्धित वस्तु को, जंगल में ढूंढता फिरता हुआ व्याकुल रहता है कि जिसका अन्त में, अपने ही अज्ञानान्धकारवश शिकारी के हाथ मारा, जंगल विषे ही समाप्त हो जाता इस अज्ञानान्धकार रूपी अविद्या को नष्ट करने वाली विद्यारूपी जो कि आत्मारूपी ज्ञान का प्रकाश कि जिसके उदय होने से अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट होकर जीव अपने स्वरूप को पहचान कर, अनादि से ही जो यह जीव इस भव रूप कुण्ड विषे जन्म मरण के अनेक प्रकार दुःख भोगता चला आ रहा उस दुःख रूपी कल्पित वासना के बन्धनों से छूट कर मोक्ष पद को प्राप्त हो जावे, जिसे प्राप्त हो कर यह जीव, अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो, अपने ही स्वरूप में आनन्द, जो कि अतीन्द्रिय सुख कहा गया है। उस आत्मानन्दमयी पद को पावे, जिसके समान कि इस जग, में दूसरा सुख अनुभव, जिस को सांसारिक सुख कहते हैं नहीं है, बल्कि उस सुख को, आनन्द का अंश कहा गया है। जिस तरह से कि सूर्य उदय होने पर अन्धकार जो कि प्रकाश के अभाव रूप केवल अज्ञान, अन्धेरा होकर प्रकाश युक्त नहीं, स्वयं प्रकाश होकर प्रकाश युक्त तेज पुञ्ज सर्व ओर फैल जाता है, तो सूर्य रूप प्रकाश के उदय होते ही स्वयं अंधकार रूप अन्धेरा नष्ट होकर केवल प्रकाश ही प्रकाश हो, जाता है। उसी तरह से ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने से अज्ञान रूपी अन्धकार जो इस जीव को जन्म मरण आदि अनेकों प्रकार के दुःखों का कारण था सो अज्ञान रूपी अन्धकार स्वयं नष्ट हो जाता है। जिस तरह एक ही दीप शिखा से अनेक दीप, प्रकाश के अभाव को दूर करते हुए सब अपने अपने प्रकाश-द्वारा, प्रकाशमय उस गृह को करते हैं। उस समय उस अन्धकार का लेश मात्र लेश भी नहीं रहता है। इसी तरह यह जीव जब उस परम प्रकाश को, जो कि ज्ञान रूप, जिस ज्ञान से पूर्ण होकर अपने शुद्ध स्वरूप रूप प्रकाश को धारण कर के स्वयं ही प्रकाशित सो अज्ञान रूपी अन्धकार जो इस जीव का अनादि से संगी था, जिस करके आत्मा को, देहादि का संगी मान कर आत्मा द्वारा कृत शुभाशुभ ही फल को भोग कर रहा था, जिस अज्ञानान्धकार द्वारा ही जीव मोह के वशीभूत होकर, कर्मों का बन्ध कर के इस ही भव रूप संसार रूपी कुण्ड में ही बार बार जन्मता व मरता रहा हुआ नाना रूप से कष्ट भोगता हुआ, अनेक योनियों में भ्रमण कर रहा था। सो इस ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने से अज्ञान का यह सब खेल ही समाप्त होकर जीव, उस मोक्ष सुख को प्राप्त होता हुआ, जिस सुख को प्राप्त हो आत्मा को फिर से इस संसार रूपी कुण्ड में, ना तो जन्म धारण ही कर संसार रूपी अनेक प्रकार के दुःख ही भोगने पड़ते हैं। उस पद को प्राप्त हो सदा काल के लिये अपनी शुद्ध अवस्था को प्राप्त होता हुआ यह जीव, अपने शुद्ध स्वरूप में लीन हुआ रहता हुआ उस आनन्द, जो कि सुख से भी परे सुख है, जिस सुख को न तो, मन या वाणी द्वारा वर्णन किया जा कर सत्य स्वरूप में किसी के सामने ही दर्शाया जा, सकता है। उस अतीन्द्रिय पद मोक्ष को प्राप्त हुआ सदा विराजता है। इस संसार का जीवात्मा रूप सूर्य जो ज्ञान के बिना बादलों में, छिप कर रह कर अपने पद को न पा कर अज्ञान रूपी बादल के उदय से जो कि अंधकार स्वरूप, ज्ञान रूपी न होकर; मोह रूपी जल की वर्षा अन्धकार रूपी जल द्वारा इस जीव रूपी पृथ्वी को सींचता हुआ जिस से संसार रूपी अनेक प्रकार के कर्मों 163