एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंलेकिन सम्प्रदाय का प्रचार जितना तीव्र गति से उस समय संसार व्यापि हो सकेगा, उस समय संसार में कोई भी धर्म-मत सम्प्रदाय ऐसा न रह जाय जो उसके सम्मुख टिक सके सो, तुम यह विचार करो, कि उस समय उस नवीन धर्म-सम्प्रदाय द्वारा धर्म वृद्धि हो सकेगी? सच तो ऐसा होगा, कि सम्प्रदाय का प्रचार धर्म का संहार होगा। अतः सत्य सिद्धान्त प्रकाशीय व्यवस्था द्वारा जब धर्म-सम्प्रदाय का नाम मात्र रहेगा और धर्म-सम्प्रदाय का संसार भर से सर्वथा लोप हो जायगा सो, यह सम्पूर्ण का कल्याण होगा सो यह कल्याण ही सब धर्मों का, वा धर्म का सार और सब ही धर्मों का मुख्य लक्ष्य है, सो जिस का यह लक्ष्य सत्य है सो प्रकाश स्वरूप परमेश्वर का सब प्रजाओं को ही हो रहा है जिस उपाय द्वारा सब ही एक मत हों व सत्य ज्ञान को प्राप्त हो सके जैसा सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश करने के लिये एक ही सूर्य सब का प्रकाश करने वाला बनाया है॥ सोचो, नवीन धर्म-सम्प्रदाय तो तब बनता होता कि जब कि कोई नवीन धर्म होता सो, यह स्वाभाविक धर्म सब काल रूप, वा सनातन सिद्ध स्वरूप का एक रूप सब सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे है सो सब का कर्त्ता सब को ही दे रहा है, धर्म- सम्प्रदाय तो धर्म की हानि के हेतु हैं, इससे सब काल व्यापि सनातन धर्म स्वरूप सुख दायक सब काल रहने वाला सत्य धर्म स्वरूप है सब का रक्षक प्रकाशक दयाल सो केवल प्रकाश ही सब पर दया का प्रकाश कर रहा है सब धर्मों सम्प्रदायों द्वारा फैला हुआ जो अविद्या का घोर अन्धकार है उससे सर्वथा लोप, सब प्रजा मुक्त हो, यह विचार करोगे? ईश्वर सत्य ज्ञान रूप, धर्म का सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे सो, सम्पूर्ण विश्व का प्रकाश प्रकाशक दयाल सबका परम कल्याण ही सोच कर ज्ञान रूप सत्य रूपी प्रकाशक दयाल सबका जो नाश कर सकता सो ही रक्षा! सूर्य ही केवल है! धर्म स्वरूप परमेश्वर दयाल सबका जो संहार करता सो ही रक्षक! प्रकाश ही केवल सब का! जो सत्य न्याय पर चल कर व सत्य व्यवहारों को ही सब को सब देगा। जो जिस पर निर्भर है सो केवल सम्पूर्ण विश्व का रक्षक दयाल सबका केवल एक धर्म काम-धंधा, धन-दौलत सब कुछ संसार का नाश ही करता रहेगा॥ सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ संसारिक व्यवहार केवल करने के लिये दया पूर्वक, विचार युक्त केवल कल्याण करने वाला बनाया है, केवल सत्य स्वरूप दयालु प्रकाशक सब का यह प्रकाश सर्वत्र समान ही कर रहा है जो सब को ज्ञान व सब को सब प्रकार सत्य सुख प्रकाशक की दया प्रकाशक सब पर सब का सब हो रहा है॥ विचार ही सब कुछ सत्य है सब कुछ व सब संसार व्यापि दया केवल दयालु व केवल दया प्रकाशक दयालु का रूप ही दया का प्रकाश दयालु दयाल, दयाल सब कल्याणकारी है॥ "सत्य ज्ञान प्राप्त रूप से समस्त माया का प्रभाव ही ज्ञान रूपी प्रकाश से ही संपूर्ण विश्व सर्व प्रकार से सब काल में सर्वत्र व्यापि" सो सब का ईश्वर सब प्रकार सब का सब काल में, केवल सर्वत्र व्यापि ही सब व्यापि प्रकाश दयालु दयाल का रूप सब दया का प्रकाश हो रहा है सो सब काल में स्वाभाविक रूप से ही सत्य प्रकाश रूप सब स्वाभाविक प्रकाशक का व सत्य स्वरूप का, जो जो भी सम्प्रदाय-भाव सो सब सब माया के सब जाल रूप केवल मिथ्या, अविद्यामय विचार॥ सो जिस प्रकार से सूर्य सब दिशाओं को सर्वदा, केवल ही सब काल व्यापि ही सब प्रकार के अन्धकार को नाशवान कर देता हुआ सब समय सब व सब दिशाओं का सब प्रकाश करता है, व जिस रूप द्वारा दिन-दुपहर सब प्रकाशक ज्ञान सब व सब रूप सब कुछ सब का केवल ज्ञान ही सब का सब हो रहा है सब सत्य ही समस्त सब सब का ज्ञान रूप, सब प्रकाशक केवल क्या? व सब का सत्य, व ज्ञान रूप प्रकाश सो, जो सम्पूर्ण संसार में? सब ही सब का, सब विश्व सब सब सत्य प्रकाश सब सब का सब काल रूप सब कल्याणकारी प्रकाश विश्व का प्रकाशक रूप दया रूप, केवल सब रूप से प्रकाश सब का सब प्रकाशक सब रूप रूप, सब सब का प्रकाशक रूप॥ केवल, सर्वशक्तिमान, प्रकाश ज्ञान का प्रकाशक केवल ही सब रूप से स्वाभाविक है, सो प्रकाश केवल सब रूप सब का रूप सब का रूप ही सब का स्वाभाविक रूप सब सब सब ज्ञान केवल सब का रूप व सब, केवल ही रूप॥ 165