भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 322 में से

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पृष्ठ 168

जब राजा सो, पाछे जाग उठ्यो, ताहि बख्त एक रीछ-सा को जीव आय उछल कै बैठि गयो जा राजा पास, ताकौं सो राज देखिकै डर गयो पाछे वह रीछ बोलि उठ्यो ता सों अरे राजा तू क्यों डरै डरपो मत ताके बादि राजा कहै तूं कौन सो बताय हमकौ रीछ कहै ता सों, जो तू यह कहै मोकौ मारि, ताहि पहिचानि कै कही सकौंगो "जाकौ जस जस ही जानिये लोक, जो न जानै लोक तो, ता को जानि सकै कौन" तब राजा सो अचरज हो सोचन को लाग्यो कि यह जीव आय कैसे वचन बोलि उठ्यो जो यह जीव-जन्त सब हो सो ईश्वर निमित्त उपजाये अपने अपने विषय पायकै सब भोगत सोई भोगत ही रहै, भला मनुष्य? मनुष्य सो कौन, भला मनुष्य? मनुष्य तो काम-क्रोधदिक के वश हो काम कै, भला मनुष्य? जानि कै पराया धन लै कै घर भरे, अपना पेट भरै, पाप-पुण्य को जानै सो, मनुष्य जाकौ नाम है सोई यह रीछ जीव कहै जो कि ईश्वर-निमित्त यह बनाया सोई कहै तबै राजा कहै, "जो मनुष्य जनम लै कै, जग में सब सुख लै कर लै सब काम सिद्ध कै, पाछे ता ईश्वरकौ भजन करि लेय" तब ही सो अचरज हो सोच बादि कहै जो हम सब बात को समझै ऐसा कह कर के पाछे वह रीछ सो कहै अरे भाई तू सब बात को जाणनैहारा हो सो कहो कि हमारे मन मों इच्छा है ईश्वर को मिलने की सो कैसे हो जाय सकैगी सो बताओ सो तब ही सो रीछ बोलि उठा अरे राजा यह बात कहिये क्यों कर कि तू तो अहङ्कार करिकै अहङ्कार सो भरी गयो है ऐसा क्यों? तू सब को सब जानै है, यह बात किस प्रकार? भला जब यह बात ही तब सब काम सिद्ध हो तो बात ही क्या मनुष्य जनम पायकै मनुष्य? ता जनम पायकै भजन किया जाय? ऐसा रीछ सों राजा कहै, भजन बिना तो जीव का कल्याण नहिं होय सकै, राजा फिर कहै, ईश्वर सब निमित्त है परमात्मा सर्वव्यापी है जो सब संसार सब को बनाय राखै पायकै मनुष्य देह को परमात्मा को भजन करिकै सिद्ध होय तव काम परमात्मा ही से सब सिद्ध होय यह बात सत्य कहै यह बात सुनि, राजा सो रीछ कहै, अब तू सब कुछ जानि गयो है, अब तो भजन करि पाछे राजा के मन में आ गई कि रीछ को मारूं! मार, तलवार निकाल कर हाथ में लेय कर जब वार करन लगा, तलवार हाथ से ही छूट गई लटक गया हाथ-पाँव से फिर देखा--रीछ गायब हुआ! तब राजा को समझ आई बात, राजा विचार कर मन में बैठ गया ज्ञान उदय होने से वह सोचे, अब तो सब बात जान गया हूं सब भ्रम छूट गया अब तो मैं फिर राज-पाट को नहिं जाऊंगा जब तक परमात्मा का दर्शन नहिं हो जायगा तब तक राजा तपस्या कर के वन में रहेगा, यह बात दृढ़ कर ली उस वक्त "हे नाथ, तू ही मेरा सब कुछ" वो रीछ कोई और न हो कर ईश्वर का भेजा हुआ दूत था जो राजा को जगा कर चला गया, अब तो वह राजा, जो सब से सब कुछ जानता समझता विचार कर अपने स्वरूप को समझ कर सब से परे होकर, उस वन में रहकर भगवान नारायण का स्मरण करने लगा और एक दिन ज्ञान उदय होकर मुक्ति को पा गया सदा, जो भजन सो करता उस वक्त मुक्ति स्वरूप पद को प्राप्त हुआ जो परमात्मा के धाम को पा गया फिर कभी वह संसार चक्र में नहिं आया ॥? इस दृष्टान्त कथानुसार सार यह निकलता है कि मनुष्य अहङ्कार वश हो कर सब कुछ अपने को ही सर्वशक्तिमान मान बैठता है जब तक कि भगवान का अहसास उस व्यक्ति को न हो जाय, तब तक मनुष्य का मन शांत नहिं हो सकता जो भजन से ही हो सकता है इस बात को सदा याद रखो, सब से बात यह सार निकसी, मन को सदा प्रभु स्मरण में लगाये रखो जब तक सांस रहे तब तक भगवान का सुमिरन करते रहो तो जीवन का सब काम सिद्ध होकर मुक्ति मिलेगी 168

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