भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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यम का दूत उसका गला घोंट कर उसके प्राण हर ले गया और--इन्द्रियोंका सब व्यापार बन्द हो गया और चेतन्य--आत्माविहीन उसका शरीर लकड़ी समान हो गया । वास्तव में विचार कर देखा जायतो जिसने सब दिया, उस दाताको भूल? जिस दयालु प्रभुने, इस मानव देहको देकर प्रभु, भगवद भजन रूपी विशाल महल दिया उस पर भी इस काज को न करके केवल संसार विषय भोगों का ही स्मरण किया। विचारवान पुरुष इस नश्वर शरीराभिमानी मानव संसार को देखकर, उस मानव को धिक्-धिक् कहकर उस पर क्या दया नहीं करेंगे? उस मानवपर दयाही करेंगे? विचार करो, जिस पर दयाका ही काम हो? उस मानव जीवन पर! विचारवान पुरुष कहेंगे, इस मानव जीवन निष्फल! इस जीने का क्या? इस विचारवान पुरुष को इस बातका अभिप्राय यह नहीं कि संसार निर्वाह का काम छोड़कर निकम्मे बन कर आलस्य करो, पर केवल उसका लक्ष्य क्या? भगवान्को भूल कर केवल सांसारिक प्रपञ्च फैलाकर अन्त समय यमदूत द्वारा दण्डित होना ही? शास्त्रकारों का मत यह भी नहीं कहा गया कि गृह त्याग कर भेष-धारी साधू बनकर केवल माला फेर कर ही अपना समय समाप्त करो। शास्त्रकारों का मत यह भी नहीं कहा गया कि गृह छोड़? फिर क्या करें? अपने काम छोड़ दें? केवल एकाग्र बैठें? शास्त्रोंका यह मत यह है। अपनी मर्यादा पूर्ण जीवन रूपी कर्म करते हुये अपने उस परमेश्वर का नाम स्मरण आदरपूर्वक करो, उस परम दयालु परमात्माके चरण कमलों का गुण गान अपने कल्याण की इच्छा करते हुये कभी-कभी समय निकाल कर एकाग्र होकर उस परम पिता उस ईश्वर का नाम जप कर प्रभु की भक्ति रूपी नौका द्वारा इस संसार समुद्र को पारकर लेवें। भगवान् का भजन केवल सन्यासियों का काम नहींहै यह शास्त्र का वचन नहीं बल्कि भ्रम पूर्ण! केवल परमात्मा का नाम स्मरण मात्र का शास्त्रोक्त या भक्तिशास्त्र का उपदेश ही ऐसा नहीं मिलता है, जिस का निर्वाह गृह त्याग द्वारा हीहो। सत्य बाततो यहहै संसारी गृहस्थी को ईश्वर स्मरण तथा भजन शास्त्रानुसार अति सुलभ, सहज, सरल एवं सत्य बात यहहै, कि ईश्वर नाम स्मरण घर पर ही बैठ, अपने सब काम करते हुए मनन रूपी नौका द्वारा ही भव सागर पारकर सकोगे। हर मानव नाम का संशय समाप्त करने को केवल मन एकाग्र करके ईश्वरका ध्यान अपने हृदय मन्दिर में ही दर्शन करवा देगा। भगवान् सर्वत्र सब जगह व्यापक रूप से हर समय विद्यमान रहता, सन्यासीयों रूप में? केवल एकांतमें? हर बात का विचार, हर कार्य अथवा विचार रूपी मनका एकाग्र ध्यान, शांत चित्त प्रभु नाम का जप सब प्रकार सिद्ध करता है। इस में किसी को भी कोई संशय नहीं होना चाहिये। केवल शांत रूप एकाग्र मन प्रभुके ध्यान हेतु सब बातों को त्याग कर हर कार्य को कर सकते हो। उस एका-ग्रता भगवान के ही ही शरण केवल भगवत भजन अथवा ध्यान द्वारा पूर्ण फल प्राप्त हो परमपिता की दया द्वारा ही। हर मानवके मन रूपी घोड़े को लगामकी भांति नियम रूपी लगाम से नियंत्रण करके उस पर विजय पा सकोगे। यह तो भगवान्के अनन्य भक्त कबीरदासजीने अपनी वाणी उपदेशके रूप मेंकहा गयाहै; फिर भीमनुष्योंको सन्देह निवारण करने के लिये; जिस प्रकार कि, किसी व्यक्ति को कोई विचार अथवा विषय चिन्ता सताती होवे अथवा अपने किसी मित्र सम्बन्धीकी सम्मति से उस का निवारण सुगमता पूर्वक होजाय, तैसेही अज्ञानरूपी का नाश ही नाम सत्संग रूपी प्रकाश में ही इस बातका निर्णय ज्ञान द्वारा होगा। केवल विचार करो जिस प्रकार मनुष्य रात को घर पर बैठ कर एकांतमें या छत ऊपर, आकाश-मण्डल की ओर दृष्टि लगा कर देखता रहताहै कि यह क्या है? उस समय उसको यह कौतूहल ज्ञान न होकर कि यह सब रचना किसी बनाने वालेकी है। केवल तारे तो देखे, परन्तु ज्ञान यह नहीं, कि चन्द्रमा की भांति प्रकाश को देने वाला ईश्वरका नाम प्रकाश ज्ञान से ही होगा। हर मानव सब कुछ देखता हुआ, विषय के मद मस्त होकर यह सब कुछ भूल-भाल कर केवल उस रचना देखकर केवल यह सो-चता रहा, अब क्या? फिर क्या हुआ, उस चन्द्रमा अथवा उस तारे केवल रूप को ही देखा, परन्तु ईश्वर के उस व्यापक ज्ञान का दर्शन न कर सका। जब वह सूर्य उदय हुआ, तो उस ज्ञान रूप प्रकाश से ही संसार भर का ज्ञान हुआ। इस प्रकार ज्ञान, उस ज्ञान प्रभु की कृपा द्वारा यह तो केवल विचार रूप में ज्ञान हुआ, परन्तु ज्ञान का मूल उस परमेश्वर की प्राप्ति का ही तो शरण लेकर ही हो सका जो ज्ञान का मूल ज्ञान का सार रूप माना गया। इस प्रकार भगवान् नाम जपना संसारी मनुष्य को संसार रूप से पार होने का साधन बताया, जिस को सब शास्त्रकार एकमत होकर कह गयेहैं, कि यह सब कुछ सत्य है । 173