एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजब सम्यग्दर्शन का उदय हो जाता है, ज्ञान, वैराग्य की छाया स्वभाव सम्यग् दृष्टि का होता चला जाता है। जब तक आत्मा रूप ज्ञान का भेद-ज्ञान से शुद्ध स्वरूप का रस नहीं पीता है। तब तक सांसारिक भोगों रूपी मदिरा का नशा नहीं छूटे- गा। यह आत्मा पहले संसार में जो भी जो भी सांसारिक या अन्य प्रकार के भोग या रस लेता रहा तथा उन भोगों का त्याग भी किया था। वह तो एक रस से गैर-रस में गमन करने लगा था। रस तो सब संसार संबंधी राग-द्वेष रूपी कर्म बंधन का उत्पादक होता रहा, रस नष्ट तो, कभी नहीं हो पाया था। सो ही बात सम्यग् दर्शन रूप ज्ञान के द्वारा यह जीव रस के स्वरूप को रस के वास्तविक रूप को ग्रहण करने लग जाता है। तब अन्य सांसारिक रस, जो रस ही नहीं था जिसे हम, रस समझते चले आ रहे थे? जिसे अन्य सांसारिक वासनाओं को-एक तरफ त्याग कर ज्ञान के द्वारा त्याग रूप धर्म कहा जाता था, वह धर्म नष्ट होकर रस में बदलता, त्याग का परिणाम है, त्याग तो वह रहा ही नहीं उस रूप त्याग को तो संसार ही कहा जा रहा, राग ही! त्याग का क्या स्वरूप समझें? जब आत्मा के निज स्वभाव को जान लिया जाता है। तब यह संसार के समस्त भोगों का रूप, चाहे शुभ रूप ही क्यों न हों। जो कि सांसारिक संसार वासना के ही कारण हैं, इस प्रकार के जान कर यह आत्मा इस त्याग वाले रस को--यह त्याग रूपी रस, ज्ञान का रस नहीं बनता, त्याग नहीं? त्याग तो संसार रूपी त्याग हो गया, इस रस का त्याग होने लग जाता त्याग रूप जो कि इस रस स्वरूप को जान कर त्याग ज्ञान के रस का रस समझ कर रस लेता ही नहीं रहता, रस तो यह तब तक त्याग रूप रस समझ कर लेता रहा था? जिसे अन्य वासना का रस ही समझा जा रहा सो इस प्रकार से इस रस का त्याग, स्वयं रूप त्याग जब तक न हो पाता रहेगा, यह संसार रूपी त्याग चलता रहेगा जो कि यह जीव संसार का त्याग तो करता चला जाता रहा त्याग रूपी वासना स्वयं त्याग रूप में गैर-रूप से रस युक्त रूप बनता ही रहा रस तो छूटा नहीं था, रस रूप बना रहा सो केवल ज्ञान ही, हे भव्य जीव; यह रस ऐसा है कि जो कि इस ज्ञान के द्वारा सब ही रस का नाश होगा! हे भव्य! रस के रस को त्यागने के लिये त्याग का रस मत जान बैठो। रस तो ज्ञान के रस-रूप भगवान् के रस द्वारा ही समस्त रस छूटेगा... ॥ सो अब तू विचार कर समझ कर व रस रस को समझ जा! तू रस रस किसे कह रहा है, आत्मज्ञान के ज्ञान के रस को छोड़ कर अज्ञान रूपी रस को त्याग समझ कर-के, त्याग रूपी कर्म ज्ञान स्वरूप भगवान् को अज्ञान स्वरूप भगवान् मत समझ बैठना, रस आत्मज्ञान स्वरूप ज्ञान का होगा। ज्ञान तो सदा ही आत्मा का ही हो ही रहा ज्ञान रूप, सदा ज्ञान रूप आत्मज्ञान सम्यग् दर्शन रूप, ज्ञान का यह सम्यग्दर्शन ही ज्ञान का स्वरूप या स्वभाव कहा गया है। समझे? भगवान् का ज्ञान आत्मज्ञान सदा रस स्वरूप होता है, सो आत्मज्ञान सदा ही ज्ञान स्वरूप आत्मा का ही होवेगा, आत्मा के ही रस से, यह आत्मा उस ही स्वभाव को ग्रहण कर इस ज्ञान के द्वारा त्याग से परे हो कर उस रस के त्याग को ज्ञान स्वरूप आत्मा का सम्यग् त्याग करता या आत्मा स्वभाववान् बनता हुआ निज स्वरूप के रस त्याग के ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त होता हुआ, त्याग को त्याग रूप जान कर त्याग रूप वासना का रस त्याग रूप में मिटा कर निज आत्मज्ञान रस रूप को ग्रहण करता हुआ ही यह ज्ञान स्वरूप ही सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर आत्मज्ञान रूप रस द्वारा ही पूर्ण ज्ञान को प्राप्त करता हुआ यह जीव केवल ज्ञानी हो सिद्ध पद व पद को, पद के व स्वरूप को, जो कि ज्ञान का स्वरूप या आत्मज्ञान का रूप कहा गया है मोक्ष रूप में ही, सो ही ज्ञान स्वरूप का सम्यग् या ज्ञान का त्याग रूप रस का त्याग कर, सो ज्ञान रूप रस के ज्ञान रूप में त्याग देगा? सो ज्ञान त्याग रूप तो रस रूप हुआ करता ही कहा गया, त्याग का स्वरूप 181