एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् को यह बात सब पता चली तो, उनहोंने विचार करके अर्जुन को कह दिया होगा देखकर आ, तो वो सब गये तो उसने बताया कि ऐसा अजब कौतुक था, कि वो सब सब तो तालाब से सब अलग पानी पीतेथे, अलग-२ भी, कभी दो इकट्ठे भी हो, पर जो सब एक ही घटमें आतेथे तो वो सब ३ इकट्ठे बैठते नहीं थे सब, महाराजा ने सब बात को सुन कर कहा ऐसा होगा कि कलिजुग में सब एक ही नांव के नीचे बैठेंगे पर वो सब न्यारे, बिराने से होकर बैठेंगे कोई किसी की नहीं सुनेगा तब उसने पूछा ३ बाणों के बारे में, उसने तो जितने निशाने बांधे सब खाली गये, सिर्फ एक लगा जिससे बबूल गिरा तो महाराज बोले जितने भी निशाने बांधे वो तो सब संसार रूपी निशाने थे पर वो काम नहीं आये पर, एक निशाने जो प्रभु नाम का लगा वो काम कर गया क्योंकि वो, कभी खाली नहीं जाता प्रभु नाम का किया हुआ सिमरन व्यर्थ नहीं जाता सो वो सब समझदार थे सब वो भी थे जो सब बातों को समझ गये पर हम लोग बातें सुनते जरूर हैं पर मन में नहीं उतारते जिसका कारण हम वो बातें भूल जाते हैं, क्योंकि मन में और बातें जो, हम सब सांसारिक बातें ज्यादा भर के रखते हैं, सो जिस बात को ज्यादा भरेंगे वो, ही याद रहेगी या प्रभु का नाम याद रहेगा या फिर सब काम काज याद या सब संसार याद रहेगा, प्रभु का नाम याद रखना नाम सिमरना मुश्किल नहीं, नाम जपना कोई देर का काम नहीं सिर्फ, भाव से बैठ कर प्रभु नाम में मन लगाना है महाराज त्रिलोचन प्रसाद जी, परमार्थप्रकाश, परमात्मानंदजी तीनों संत एक ही गुरु भाई थे और सब एक ही रास्ते पर चलते थे पर जैसा प्यार संत-- महात्माओं जैसा होना चाहिये वो संत कहते थे, सब को ऐसा प्यार था कि जैसा एक रूप हो या ऐसा भाव दोनों तरफ, प्रेम-प्यार सब को, सब काम ही ऐसा मन लगा कर करते थे जैसे कहा गया, "एक से दो भले, दो से भले चार" पर यहां पर तो सभी का एक भाव था ऐसा होना बहुत बड़ी बात होती है सब एक ही तो काम कर रहे थे, सो जो कुछ भी वो कर रहे, वो सिर्फ प्यार ही प्यार था सब में, सब का सब को सुख देनेवाले थे सो प्रेम-प्यार से ही सब, सब कुछ करते सो ऐसा ही होना चाहिये था, पर जैसा सोचा था, वो वैसा नजर न आया तो देखा कि अब ३ का क्या फैसला निकलता १ बैठा विचार में लीन मन को प्रभु के २ बैठा देख रहा था कुछ देर बैठ कर, कुछ विचारने के बाद वो भी निकला... २ निकला... ३ तो बैठा समाधि लगा के, वो सोचता कि कोई न छेड़े; वो समाधि में मस्त था सो बैठ सो वो चला ही गया था, सो वो संत शांत रहकर सब नजारे को देखता, तीसरा फिर खड़ा हुआ वो सोच, कि जो ज्ञानवान् थे वो प्रेम-प्यार से अलग ही बैठा था, प्रभु का नाम तो सिमरन ही रूप से किया "जो प्रभु का नाम जपते सिर्फ वो ही नहीं, जो प्रेम प्यार बांटते वो भी प्रभु के प्रिय कहलाते" सो वो सब संत परमात्मा के रास्ते ऊपर चलते महापुरुष प्रभु परमात्मा के सब रूप ज्ञान से वो सब कुछ समझ गये, प्रभु के नाम रूप अमृत रस, जो वो सब प्रभु से मांग रहेथे वो सब कुछ उसके पास ही था, महाराज केवलानंद जी सब कुछ देख रहेथे सब कुछ जानते सब कुछ समझ रहे थे उस प्रेम-प्यार, त्याग-वैराग्य भाव को देख कर मन बहुत खुश हुआ पर बाहर कुछ न बोले कुछ शांत भाव बैठे देख रहेथे वो सब कुछ देख रहे, पर वो अंतर्यामी सब कुछ जानते विचार कर रहे, वो सिर्फ देख, सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने कोई दखल न दिया, इसलिए सिर्फ सब कुछ देखते ही रहे ताकि किसी दूसरे को, किसी बात पर कोई ऐतराज न हो-सो वो सब कुछ देख कर किसी तरह का दखल नदेकर अपनी मौज में मस्त-मगन होकर केवल केवल प्रभु नाम सिमरन में लीन होकर ही आनंद प्राप्त करने लगे 189