एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्री गणेशाय नमः॥ षोडश अध्याय अर्जुन उवाच (तीन गुण) श्लोक 2 अभयं सत्व संशुद्धि ज्ञानं च योगं तथा दाने दमो च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् अहिंसा सत्यम् अक्रोधस्त्यागः शान्तिर पैशुनम् दया भूतेष्वलोलुपत्वं मार्दवं ह्रीरचापलं तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो न नाति "मानिता" भवन्ति सम्पदां दैवम् अभिजातस्य भारत श्लोक 3 तेज क्षमा धृति शौच मद्रोहो नाति मानिता भवन्ति संपदन्दैवी मभि जातस्य भारत। दम्भो दर्पो भिमानश्च क्रोध पारुष्यमेव च अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पद मासूरीम्। दैवी सम्पद विमो क्षाय निबन्ध नाया सुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवी म भि जातोसि पाण्डव। द्वौ भूत सर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थमे शृणु॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं "जना" न विदुरासुराः भारत हे अर्जुन डर का न होना मन की पवित्रता हो, यह ज्ञान का अधिकार बना रखने के लिये हो, योग स्थिति अर्थात् एक चित्त से ईश्वर चिन्तन का नाम है, सत मार्ग में या सत पुरुष को अन्न जल वस्त्र आदि से तन सेवा से तन मन धन सब दान करे, इन्द्रिय दमनशील हों मन को विषय से वश में रखे, इन्द्रिय दमनशील नाम मनको वशमें करे, यज्ञ, हवन आदि, विद्या, तप, सत्य से धर्म का पालन करना भगवान के लिये कर्म, निष्काम का नाम यज्ञ है और न किसी को कष्ट देना मन वचन कर्म से किसी प्राणी इत्यादि कर्म के विचार करने योग्य, स्वाध्याय, यज्ञानुसार कर्म का ज्ञान हो वेद विद्या पढे भगवान् नाम स्मरण चित्त में हो, मन वश में रहे ना ललचाये, दया, दान धर्म आदि कर्म सत्य वचन--सत्य आचरण में ही रहे, किसी को बुरा-भल अपमानित शब्द मुख से न बोले, यह सब गुण दैवी हैं आत्मज्ञान प्राप्त पुरुष को नहीं, जो ज्ञान पथ पर चलकर इन को प्राप्त कर लेता उस भगवान् भक्त को, अभ्यास रूप फल प्राप्त होता रहता है जैसे फल वृक्ष को, फल वाले वृक्ष झुककर धरती का सत्कार करते हैं झुक कर ही, फल मीठा होता... । दम्भी पाखण्डी! वेद मार्ग शास्त्र से जो विमुख कर्म करे या बात बनाकर झूठ बोले या छल कपट से कार्य को साधे और अपने आप को बड़ा रूप में दिखाये घमण्ड रूप न माने तो, यह अज्ञानता ही एक महा पाप अज्ञानता ही सब पाप कर्मों की जड मानी गई है यह अज्ञान ही ऐसा रूप धारण कर लेता है मनुष्य का पतन शीघ्रता से कराता ही रहता है। क्रोध सब नाश कर देता इस से ज्ञान का, विचार करने योग्य शक्ति सब मन्द पड जाती है। काम क्रोध लोभ मोह रूपी, असुरी सम्पद् जीव को कभी सुख से जीने नहीं ही यह सब काम क्रोध आदि के वशीभूत जीव रहता है, वह चौरासी लक्ष योनियों में ही भटकता रहता--मनुष्य योनि से भ्रष्ट होकर इन चौरासी लक्ष योनियों में भटकता हुआ जीव अपने कर्मों के अनुसार चलता हुआ कष्ट ही पाता है। यह अविद्या व अज्ञान से ग्रस्त रहता हुआ उस सुख को स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाता, इसी लिये बार बार चौरासी के इस चक्र चक्कर में फंसा रहता, जो ज्ञान मार्ग का ध्यान करते हुए इस पर चलकर जीव अपने स्वरूप को प्राप्त कर के उस सुख धाम को 19