भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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किन्तु यह सब विचार तबही सार्थक था, जब उसका हृदय वासनामय संसारके विकृतियोंसे सर्वथा विरक्त हो चुका होता, वह वैराग्य की उस चरम सीमा पर्यन्त पहुँचनेमें समर्थ होता। वह यह सब सोचता तो अवश्य था, पर मन की चंचलताका वह सर्वथा विसर्जन कर पानेमें सफल नहीं हुआ था। कभी वह सोचता भी, कि क्या सच मुच इस समस्त दृश्य जगत्का कोई नियन्ता है।या सब पदार्थ अनादि सिद्ध हैं? सर्वज्ञता वास्तविक है? या केवल अपनी दुर्बल धारणा को तृप्त कर संतुष्ट रहना मात्रका यह एक भ्रम है। इस प्रकार अनेक प्रकार वितर्क वह कर तो रहाथा परंतु उस पर कोई भी विचार स्थिरता नहीं उपलबध करा रहा था, वह विचारो द्वारा केवल शब्द योजना तो रचसका, पर यथार्थ सत्य को वह प्राप्त नकर सका। वास्तव में विचार का रूप केवल उस कल्पित पत्र के समान ही है। जिसके आधारपर वास्तविकता की स्थिति कुछ भी संभव नहीं हो पाती। विचारोंसे केवल तर्कोंका ही जाल फैलाया जा सकताहै पर तत्त्व लाभ संभव नहीं हो सकता। अंततोगत्वा वह उस सर्वज्ञ देवकी पावन वाणी को संशयके ही दृष्टिकोण से, जिसे आज कलके वैज्ञानिक सत्य नामसे पुकारते हैं वह भी विचारनेका ही प्रयत्नकरता रहा। उसका विचार ऐसाथा जैसे कि कोई नौका के दो तख्तोंपर पैर रखकर पारहोनेका प्रयत्न करे। अथवा वह उस नौसिखिये के समान था, जो तैराकी; का पूर्ण सिद्धांत जानकरभी नदीकी अगाधधारामें कूदपड़ा था, जो तैरने की कलाका सिद्धांत तो विचारता रहता था पर हाथ-पैर मारने पर, वह जलतरंगोंके थपेड़ोंको सहनेमें असमर्थहोकर या डुब-कियाँ खाता था, अथवा चक्कर खा, कर विवश होकर अपनी जान गंवा बैठताथा। ऐसेही इस संसार चक्र से पार होनेके लिए केवल सिद्धांत ज्ञान पर्याप्त नहीं। ज्ञानके साथ तो उस प्रकारके क्रियात्मक बलकी आवश्यकता थी, जिससे कर्म रूपी जल तरङ्गो को रोका जासके। केवल ज्ञानके द्वारा, वैराग्यके अभावमें साधक पग-पग भटकता है, पग-पग विष की घूंट पीकर तृषा शान्त करनेका व्यर्थ यत्न करता है। यही कारण था कि उस युवक पंडित, का अन्तस्तल विकल्पों तथा तर्कों का ही एक ऐसा क्षेत्र बन चुका था।जिसमें मात्र एक संशय रूपी तृण ही उग रहा था। परिणामतः उसे, ज्ञान द्वारा मिलने वाला आत्मीय आनंद प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध होग-- तृषातुर चातककीनाई कभी अपने हृदयको शून्य समझने लगता था।तोकभी प्रत्येक विकल्पमें अपने ज्ञानी होनेका भाव अनुभव करके अहङ्कारसे मदान्ध होकर अन्य समस्त ज्ञानी संसारको तुच्छ समझता। विकल्प उसे चञ्चल बनादेते तथा कभी वह मोहग्रस्त होकर उस मद्यपकी भांति मदमस्त बना रहता। विकल्प हीउसे अज्ञानकी अंधकार गुहामें धकेलदेते जिसमें वह भटक कर मार्ग भ्रष्ट बनजाता। विकल्प कभी उसके हृदयको दुर्बल बनादेते जिससे अकारण भयभीत होकर वह जीवन से ऊबजाता। विचार रूपी आवर्त्त उसके विवेक रूपी जहाजको निगलने का प्रयास करते हुए उसे अशान्त बनाये रखते। इस प्रकार विकल्पों तथा संशयोंके गहन घनघोर तममें फँसकर वह दिशा विमूढ़ बनकर कभी इधरतो कभी उधर भटकता हुआ एक प्रकार से पागल बनरहाथा।उसे ज्ञानके आधार परपरम सुख तो दूर संसार रूपी महा दुःखसे भी मुक्ति नहीं मिलसकतीथी। उसने विचार किया कि इस विकट संशय चक्रसे छुटकारा पाकर मुझे, किसी सर्वज्ञके पास जाकर अपने सन्देहों का निवारण कराना चाहिए? यदि वह ज्ञान यथार्थ होगा, तभी स्थिर हो, शांत जीवन लाभ कर सकूँ गा, या फिर इस संशयके जल में डूबकर प्राण, दे दूँगा। इस प्रकार मन तथा हृदयके अंतर्द्वन्द्वमें उसका जीवन उलझ कर रह गया। जीवन के संशय विषैले बाणोंके समान उसे निरन्तर पीडितकरते रहते थे, पर इस बात का उत्तर वह किसी भी तरह, प्राप्त नहीं कर सका था, क्या सच मुच इस संसार चक्रसे छूटने का कोई उपाय भी होता है. क्या सच मुच इस असत्य संसार के उस किनारे पर जीवन नौका जाकर ठहरती है, क्या कोई ऐसा स्थान भी है जहाँ पहुँच कर इस मन की चंचलता सदाकेलिए शांत होजाय? क्या इस प्रकारके विचारों रूपी दल दल से पार होकर अन्तरात्मा की वह परम शुद्धावस्था प्राप्त होसकती है। जिसकेलिए लोग तप का आचरण करते हैं, जिससे कि जगत् के प्रलोभन भी उसके मन को विचलित नहीं करते। शास्त्र तो कहतेहैं... कि इस जग के ऊपर प्रत्येक वस्तु का जो यथार्थ स्वरूप ज्ञान करानेमें पूर्ण समर्थ हैं, जहां पर मन की सारी वासनाएं शान्त हो जाती हैं। पर क्या वे, सच ही सब कुछ जान रहे हैं।या, केवल दूसरोंको उपदेश देकर मात्र अपने शिष्योंकी संख्याबढ़ानेका ही, मार्ग इन ज्ञानीयों शास्त्रियों तथा पंडितों ने, निकाल रखा 199