भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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भगवान् को यह चिन्ता कभी सतानेवाली अर्थात् भयभीत या व्याकुल नहीं कर सकती थी, कि प्रत्येक युग समाप्त होने, और नए युगके उदय या प्रवर्त्तन के समय प्रत्येक बार केवल प्रलयङ्करी शक्तियों का राज्य प्रसार कभी न समाप्त होगा, पर प्रत्येक नए प्रकाश के सम्मुख तामसी वृत्तियों पराभूत होकर ही रहीं हैं। हाँ, यह अवश्य ध्यान देने योग्य है कि प्रकाश-युग सदा सर्वदा अपनी पूर्ण शक्ति से चिर प्रतिष्ठित नहीं रह सका या रहता क्योंकि प्रलय के बीज भी तो थे ही, जो संहारक का रूप लेकर आते थे। पर जो कुछ सम्भव हुआ वह सब इसीलिए तो हुआ कि प्रत्येक युग, जो केवल ही युग का पर्याय ही बनकर न रहा वरन् उसने प्रत्येक युग-सङ्घर्ष स्वरूप बन कर अपना गौरव सिद्ध किया, और जो उस प्रत्येक युग के इस प्रकार सङ्घर्ष करके आगे बढ़ते हुए वातावरण के साथ अपनी पूर्ण आत्मीयता स्थापित करके अपने को प्रतिष्ठित कर सका। जो व्यवस्था काल और देश दोनोंकी सीमाओं का अतिक्रमण कर शक्ति के माध्यम स्वरूप अपने स्वरूप को खो दे उसका परिणाम भी तो यही होगा। इसलिए प्रत्येक युग की समस्याओं तथा उसके स्वरूप अथवा स्थिति विशेष प्रति स्वयं को अनासक्त ही, उस समस्या का केवल रूप जान लेने मात्र तक ही सीमित न रख कर, उसके निराकरण की दिशा स्वयं ही ग्रहण करने के लिये तैयार होना होगा, छोटे-छोटे, नये-पुराने हर पहलू को देखना और समझना, तत्कालीन परिस्थितियों के आधार लेकर ही समस्या का स्वरूप तो स्पष्ट कर लेना सम्भव नहीं या सम्भव कैसे होगा? केवल यह सोचना तथा समझना कि समय सब बातों तथा दशाओं को ठीक कर देगा यह भूल ही तो होगी और उसी भूल का परिणाम था, कि एक-समय के प्रसार का प्रभाव सब छोटे--बड़े पर ही न होकर स्वयं उस सम्प्रदाय विशेष पर पड़ा, जिसने यह सोचा। यह बात समझ, केवल यह विचार स्थिर रखकर, समय, काल, परिस्थित के प्रभाव द्वारा, केवल यह तो नहीं कहा, प्रत्येक परिस्थिति का त्याग किया? पर जो यह कहता है, उसने सब कुछ ही त्याग दिया और वह, केवल उस समस्या के रूपको देख कर अपना स्वरूप ही खो बैठा। प्रत्येक दिशा, तत्कालीन दशा और मन के भाव तथा रूप पर ही अवलम्बित होकर यदि व्यक्ति रह गया न हो, तो वह उस परिस्थिति के साथ मिलकर एक नयारूप धर सकता। समस्या का निराकरण क्या इस प्रकार सम्भव है? परिस्थिति को तो उस रूप में न देख कर जो केवल व्यक्ति तथा समाज विशेष को अपने प्रभाव से ग्रस्त कर सकने में समर्थ हो ही, पर समस्या के स्वरूप को, प्रत्येक युग, हर परिस्थिति का रूप समझकर जो हल करेगा, वह समस्या अपने यथार्थ स्वरूपको उपस्थित करेगी जिससे व्यक्ति को केवल न लाभ ही प्राप्त होगा वरन् उस से वह या समाज का प्रत्येक रूप किसी नये रूपको धारण कर समाज को कल्याण प्रदान करे, प्रत्येक मनुष्य तथा प्रत्येक व्यवस्था का यही न रूप, यही रीति और परम्परा भी होनी चाहिये। देश, समाज के रूप को, उस काल, उस देश, समय को, समझना होगा अथवा उस व्यक्ति विशेष द्वारा सम्पादित क्रिया विशेषको भी उस रूप तथा स्वरूप से देखना ही है, केवल समस्या रूप मान लेने से समस्या न हल हुई कभी और न समाधान सम्भव ही हुआ है। यह जानना होगा, कि किस रूप तथा प्रकार से। परिस्थिति जिस रूप में भी जिस पर भी पड़े, तो वह व्यवस्था विशेष रूप-रंग में प्रभावित होकर कभी तो साधारण जन स्वरूप धारण करके जन का रूप ले लेती है, कभी उस व्यवस्था द्वारा उपस्थित प्रभाव, तत्कालीन रीति-रिवाज और व्यवस्था को ही नया रूप देने में समर्थ होती है, पर व्यवस्था केवल अपनी शक्ति के आधार पर ही तो सम्भव होगी ही, इसलिये व्यवस्था अपने आप में अथवा जो व्यक्ति उस रूप में अपना प्रभाव रखता हो, उस प्रतिनिधित्व विशेष का परिणाम ही, उस समस्या के स्वरूप का निर्णय ही, जो रूप दिखायेगा। मानव का स्वरूप ही कुछ ऐसा बन ही गया तथा बना रहता आया जिसे वह व्यवस्था का नाम देकर स्वयं, यह तो कह देता था कि इस प्रकार हमारा निर्माण हुआ अथवा हम इस प्रकार के हैं अथवा हम उस, पर व्यवस्था का यह रूप न तो आजतक स्थिर रहा, तत्कालीन प्रभाव सदा अपने रूप में परिवर्त्तन ले कर रहा ही, अतः मानव का स्वरूप ही ऐसा परिवर्त्तनशील तथा चंचल बना रहा जिस प्रकार से वह अपने जीवन निर्वाह साधनको एकत्र करता सम्भवतः वह उसी प्रकार अपने को भी सब प्रकार रूप में परिवर्तित करता रहा परिस्थिति के रूप रूप सब ओर अपना यह प्रभाव दिखलाता ही, समस्या के रूप तत्कालीन साधन के रूप में स्वरूप उपस्थित करके उस रूप में न केवल उस साधन द्वारा बाधा पहुंचती हो, पर व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा स्वरूप दोनों को चोट पहुंचती है, जिससे वह नया स्वरूप ले, निर्माण के नए रूप धारण को सम्भव बना सका तथा 225