भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विचारशीलता जहां नहीं, या घट गई या लुप्तप्राय हो, जीवन-व्यवहारों का संचालन या तो प्रवृत्त प्रकृति द्वारा बने ढर्रे-खांचे पर ही भार की तरह हो, अन्यथा व्यक्तिगत स्वार्थों का ऐसा घोर रूप प्रकट हो सकता कि समाज के अंग रूप माता-पिता केवल सुख की लालसा तृष्णा मात्र संतानोत्पत्ति के पश्चात् कर्त्तव्य धर्म का निर्वाह न कर उन्हें दूध--मुंह पर छोड़ दोनों अलग--अलग दिशा में गमन दे लें, अथवा जो माता गर्भस्थ पिंड, या नव जात शिशु संहारकारिणी हो सकती। जिसके पास विचारशील मन, या विवेकवान् हो सकने योग्य हृदय, दोनों का अभाव समझ पड़ता, जो विचारहीन ही सब कुछ अपने लिए उचित मान बैठते अथवा एक दम पशुता पर ही उतर भी आते हों, तो आश्चर्य कैसा होगा? विचारहीन तो कह बैठ भी सकते कि विचारशील का काम केवल शास्त्र चर्चा तक ही सीमित रहे, जहां तक उस ज्ञान द्वारा मिले सुख की रक्षा का कर्त्तव्य ही उपस्थित हो जाता वहां फिर? ज्ञान क्या तब तक केवल विचारहीनता की ओर हाथ बांधकर देखेगा? या तो वह सब कुछ ही विचारवान् विचारहीनता के प्रति समर्पण करके अपने कर्त्तव्य समाप्त कर देगा? विचारवान् की यह कर्त्तव्यनिष्ठा इस रूप में सदा उपेक्षित रहकर समाप्त होवेगी? या विचार मात्र का ही रूप केवल रहेगा! इसलिए कर्त्तव्य निर्वाह केवल ज्ञान या मात्र ज्ञान विचार तक ही नहीं, ज्ञान केवल सुख भोग का साधन या उपभोग ही बनकर न रह जावे वरन् विचार निष्ठावान् बनकर कर्त्तव्य का रूप भी धारण करे, जहां विचार ज्ञान दोनों हों। विचार कर्त्तव्य के रूप, जहां भी ज्ञान धर्म की रक्षा का प्रश्न आवेगा वहां, यह ज्ञान केवल बातों का रूप धारण करके ही रह जावेगा तो वह ज्ञान ही क्या हुआ कहलाता ज्ञान कभी समाप्त हो जाता या संशय का कारण भी बन सकता? तब फिर ज्ञान कैसा विचार का रूप, या केवल विचार बनकर, जहां पर ज्ञान कर्त्तव्य को ही न रख सके वहां विचार का ही क्या मूल्य रह जावे, जो ज्ञान सब कुछ देकर भी न तो अपने को और न ही दूसरों संकटों से बचा सके, वह ज्ञान संकट कारक हो कर विचारवान् को भ्रमित अवश्य ही कर सकता हो सके, उस ज्ञान रूपी ज्ञान को, न ज्ञान कहा जा सकता केवल विचार। यह भी संभव, कि ज्ञान सब कुछ देकर भी जब केवल विचारहीनता का ही रक्षक, या ज्ञान का रक्षक न होकर केवल विचारहीनता के अनुकूल ही काम करे, अथवा विचार शून्य, बनकर ही रह जावे, तब कैसा कर्त्तव्य पालन? तो विचारहीन सब कुछ, ज्ञान शून्य सब कुछ ही? तो कर्त्तव्य क्या है? इस बात को, जो ज्ञान केवल विचार मात्र? ज्ञान केवल विचार ही? विचार कैसा जो ज्ञान का ही नाश कर देवेगा? विचार सत्य ज्ञान को धारण करे, ज्ञान कर्त्तव्यवान् बने! ज्ञान ही ज्ञान! ज्ञान विचार का रूप नहीं! ज्ञान केवल नाम पर ही कर्त्तव्य का रूप न दे सके मात्र ज्ञान के स्थान पर तो विचार का ही रूप सब कुछ हो ही सकता। ज्ञान कर्त्तव्यवान् बनकर ही ज्ञान रूप द्वारा ही कर्त्तव्य बनता है, जो न केवल ज्ञान रूप ही बना रहे, वरन् जो ज्ञान कर्त्तव्य रूप को अपनावेगा, वह विचारवान् कहला कर कर्त्तव्य का रूप भी लेगा। विचार केवल मन की ही बात तक सीमित न रह जावे, जो ज्ञान के अनुकूल हो, उस विचार युक्त विचार मन का नाम ज्ञान कहा जा सकता कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान रूप कर्त्तव्य कहलाता या ज्ञान रूप, जिसे जो सब कुछ ही कर्त्तव्य रूप ही? तो कर्त्तव्य विचारवान् बनकर सब कुछ ज्ञान का ही रूप देकर सब कुछ अपने विचार को ही सब कर्त्तव्य विचारवान् का रूप देकर कर्त्तव्य का ही ज्ञान रूप सब कुछ ही करता जहां पर कर्त्तव्य का नाम ही कर्त्तव्य का रूप ही कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान का रूप ही ज्ञान, सब कुछ ही? ज्ञान का विचार तो ज्ञान ही बना! ज्ञान रूप तो ज्ञान बनकर ही रह गया फिर ज्ञान केवल विचार का रूप देकर क्या ही करेगा? कर्त्तव्य मात्र का तो रूप नहीं! ज्ञान का नाम ही ज्ञान रूप ज्ञान बन कर कर्त्तव्य के रूप में अवश्य आवेगा, तब ही वह विचार का रूप होगा। तो विचारवान् कर्त्तव्य रूप सब कुछ बनावेगा, जो ज्ञान सदा कर्त्तव्य ज्ञान रूप बनकर रह सके, तो कर्त्तव्य विचार कर्त्तव्य ज्ञान रूप कर्त्तव्य का केवल ज्ञान रूप, तो ज्ञान कर्त्तव्य का रूप देकर ज्ञान रूप ही कर्त्तव्य रूप ही सब कुछ बन सके ज्ञान रूप, "जो ज्ञान का रूप कर्त्तव्य ज्ञान ही सब कुछ।" इस तरह ज्ञान का कर्त्तव्य केवल ज्ञान रूप ही न होकर कर्त्तव्य द्वारा ज्ञान रूप हो तो कर्त्तव्य का ज्ञान ही कर्त्तव्य हो कर ज्ञान बनकर कर्त्तव्य ही हो जावेगा। 232