एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह जानकर सब लोग चक्रवर्तीके निकट गये ओर हाथजोड विनय कर बोले स्वामिन् शत्रुने तो केवल दो सौही बाण मारे ऐसा सुना, सो यह चक्रवर्तीके तो एक ही बाण लगा होगा? सो बात तो इस भांति बनी ही, किन्तु इन तीन सौ; सात सौने बाण ऐसे लगाये कि कोई बाण तो बाण पर लगा जाकर, बाकी बाणों ने जहां तहां अंगो- पांगोंको छेदा जिस करके चक्रवर्ती के सर्वांगमें घावों के मारे एक तिल भर भी घाव विना ना रहा जिस चक्रवर्तीने मूर्च्छित हो प्राण छोडे यद्यपि कोई कहे कि जब इस भांति राजा रणमें मारा ही, तो सो ही मुक्ति जाना चाहिये सो राजा सर्वार्थ मे गया ही, सो तो मोक्ष जैसा ही सुखहै सो संसार की रक्षा निमित्त मरा था इस हेतु जहां गया, सो चक्रवर्ती का तो मोक्ष अवश्य ही था परन्तु उस भव में तो मुनि ही ना था सो राजा भरत जी की भांति ना हो सका सो संसार चक्रमें ही था, परन्तु उस भव में राजा सर्वार्थ सिद्धि में गया सो इस प्रकार से संसार का अंत ही हुआ सो आगे मोक्ष होगा, राजा तो ऐसा उत्तम जीव था जिसने ऐसा काम किया, परन्तु देखने वाले, जो रणमें ना गये सो उनका तो मन ही बिगड कर नरक गये सो कहो जहां चक्रवर्ती तो सर्व सिद्धि में चक्रवर्ती न कहलावे किन्तु देव कहलावे, सो वो, उस जीवको सर्वार्थ सिद्धि तक भेजने वाला तो नरक में, वो चक्रवर्ती काम-क्रोध कर सब सेना समेत चक्रवर्ती सद्-गति को पहुंचा सो जीव को उत्तम व पापी निमित्तोंसे कैसे फल मिलते हैं सब कोई इस बातको विचारे कि मन कैसा बलवान् है, जो काम इस जीवने कियाही सर्वार्थसिद्धि का फल उस जीव जिसने चक्रवर्तीको उपदेश किया उसने चक्रवर्ती को तो मुक्ति भेजी ही दी, परन्तु सर्वार्थसिद्धिवाला नरकमें किस लिये गया ऐसा कहो सो उत्तर कि वो जीव जिसने ऐसा उपदेश दिया वो उस ही बाण के घाव से मूर्च्छित हो, राजाने तो वो उपदेश याद कर तो घाव सह लिये सो मुक्ति गया और यह जीव जो, वो तो उपदेश भूल गया सो, वो नरक गया ऐसी कथा है॥ जो जन धर्म में पक्के होते हैं, वो उपदेश सब जीव न केवल नर ही देव, नारकी, वा तिर्यञ्च सब जीवों को उपदेश देते हैं केवल, सो सब को पाले, ना सब को सार भी कहे, जिसने धर्मको धारण कर लिया जिसने सब को सार कहा, नरक से बचने वाला जीव कहा जैसे नरक में सब को दुःख होता-होता किसी को सुख का लेश तक भी ना होता सो जीव दुःखी ही होता, सो वो जीव भी नरक में उपदेशी ही काम करता नरक में भी सब जीव को ऐसा ही फल सब जन पावे सो, नरक ही जावे, मन-भाव बुरा, फल, वो तो वो ही नरक गया जिसने वो उपदेश तो सर्वार्थ को दिया सो चक्रवर्तीको फल-होगा, उपदेशकको तो-वो फल उस जीव का फल उस उपदेशक को मिलता न रहा, नरक ही फल हुआ नरक में जीव दुःख से रो रो कर पुकारते हैं बचाओ कोई हमको बचाओ हमारी इन नाना प्रकारके कष्टोंसे रक्षा करो कोई तो सहायक बनो, कोई सहायता तो करो शरण शरण हमारी रक्षा करो कोई तो हमें तारो हम अनाथ हैं व शरण हैं हमको तो कोई शरण देवो ऐसा विलाप करते हैं तो कोई भी शरण न होता ना चक्रवर्ती होता ना वो राजा होता जिसने वो दो सौ बाण मारे थे वो भी सब ही नरक गये सो सब ही कष्ट सहते हैं नरक में सब ही रोते हैं नरक विषय सुखों न रहा! विचार करो नरक में शरण न राजा ना चक्रवर्ती अकेला नरक में जीव अकेला ही होता सब अकेला सहाय ना कोई ना ही सगा सम्बन्धी ना राजा ना ही चक्र होता है॥ धर्म केवल शरण जीवका ऐसा जान कर सब जीवों को जो धर्मका ही फल जीव समझता सो धर्म ही, वो ही शरण सर्व जीवों? सो नरक की शरण कौन सी है, वो तो धर्म शरण वो नरक से उद्धार करने वाला जीव होगा? जो जीव सर्व व जीवों को सब प्रकार शरण देता वो संसार में सार है, संसार के चक्रसे वो सब को सार न पावे, सो संसार शरण विहीन, वो नर व जीव अनाथ शरणहीन ही रहा जिसका आधार धर्म ही केवल रहा, ऐसा उपदेशक सारथी ही शरण ही धर्म कहा, सब जीवों को शरण देता सब उपकारी काम ही करता है, नरक सब जीव जाते सब उपकारी काम ना ही करता ना करता ही रहा, ऐसा जीव सब सब नरक जाते ही नरक का फल सब किसी जीवको फल तो होता ही नरक कर्मसे उपदेश सर्वार्थ साधन ही मुक्ति का साधन ही समझना ऐसा उपदेश का कथन 235