एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउस उपद्रवकारी मनुष्य को यह बात ठीक तरह समझ लेनी चाहिए कि भारत का हर सच्चा नागरिक जो चाहे या नचाहे रूप में भारत का अन्न खाता अथवा कपड़ा पहनता है; या भारतीय डाक्टरों की चिकित्सा अथवा जीवन औषधि पाता अथवा भारत भूमि द्वारा प्रदत्त आमोद-प्रमोदनों अथवा पद, प्रतिष्ठा को, जो भारतमाता अथवा उस समाज का अंग अथवा अंश बनकर सब कुछ भोगता हुआ सुखिया रहता है उसका धर्म बनता, कि कृतघ्न न होकर कम से कम भारत का तो सम्मान करे ही जिससे उस देशद्रोही रूप में उस उपद्रवकारी जन को समझना तो चाहिए कि व्यवहार में वह कोई भी रूप क्यों न अपनाए पर परमात्मा के सच्चे न्याय रूप में उसका सुख केवल इस बात समझकर नष्ट अवश्य होगा क्योंकि, इस स्थिति का उसका कोई सच्चा साथीदार बनेगा, न माता पिता, रिश्तेदार, सब उससे अपना संबंध केवल स्वार्थ रूप ही मानकर या अज्ञानतावश ही निभाएंगे, न्याय रूप में परमात्मा की कचहरी में वह अकेला ही ही होगा? तो विचारना का रहेगा भला? कृतघ्नता का न्याय बनेगा? जो मनुष्यता के सर्व ही विपरीत या पाप में गिना गया, इसके सिवाय और क्या रूप उपद्रवकारी को प्राप्त हो सब समय या रूप में विचार सकते हो? न्याय रूप ही तो ऐसा सत्यता का एकमात्र व्यवस्थापक कहा जाएगा हर समय अपने विचार को शुद्ध रख, जिससे कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य परमात्मा स्वरूप को समझ कर ही पालन कर के श्रेष्ठ कर्मों का फल प्राप्त कर सके, ना कि केवल शरीर को सन्तुष्ट रूप रख कर ही सुख अनुभव करता रहे; या तो ऐसे रहो, जिससे कि सबका कल्याण हो या सबका अहित करने वाले उस वातावरण से स्वयं को अलग कर निर्भय बना कर सब को प्रेरणा देकर जीवन सफल किया जाए जिससे स्वयं सब कुछ श्रेष्ठ बनते हुए सब को सन्मार्ग प्रेरणा देकर शुद्ध, पवित्र हो कर न केवल अपना भला, बल्कि सब का ही कल्याण कर प्रभु कृपा प्राप्त, सबको ही उस परमात्मा रूप सच्चा साथीदार तो हर एक जीवात्मा का केवल प्रभु, और केवल परमात्मा ही अपना एक सर्वसमर्थ सच्चा और जीवन-दाता परमेश्वर रहा और सदा रहेगा भी केवल परमात्मा रूप सच्चा प्रभु सब का ही, सब ही का स्वामी सदा प्रभु सब समय में सहारा दे तो सकता है पर मनुष्य न बात को न मान कर केवल स्वार्थ, या सब कुछ अपने कर्मों द्वारा सब कुछ सोच कर ही अहंकारपूर्वक कर्म, विचार करता हुआ, हर समय केवल भ्रम में भटकता हुआ ही परमात्मा शक्ति अथवा कृपा से वंचित हो जाता, जो कि सबसे बड़ा पाप विचार वास्तविकता त्यागकर या सब कुछ नश्वर समझ त्यागने वाले मनुष्य को किया, जब सब कुछ त्याग कर सब कुछ प्रभु को, अपने सब विचार समर्पण करता हुआ प्रभु शरणागत हो सब रूप से हर एक का सच्चा कल्याण करता हुआ सब कुछ पाकर भी, वास्तविकता त्यागे बिना रहता, तो भगवान, परमात्मा, विचार भला? या तो प्रभु सब नियम सत्यता त्याग करता, जो प्रभु शरण केवल परमात्मा की ही कृपा समझकर त्याग करता, प्रभु का भक्त, सब संसार को त्यागकर केवल प्रभु कृपा पर निर्भर करता, वह प्रभु कृपा वंचित क्यों रहता? परमात्मा भक्त की वास्तविक स्थिति ही, यह होगी, कि प्रभु का सब प्रकार का सहारा, प्रभु कृपा से सब प्रकार केवल ईश्वर के ही सब कुछ समझ सकता है प्रभु कृपा से सहज रूप से सब का पालन प्रभु, स्वयं ही सब कुछ करा रहा, तो न तो कोई व्यक्तिगत द्वेष रखता है, न किसी बात का पश्चाताप करता हुआ रोता है, हर समय केवल हर सांस प्रभु का स्मरण ही, हर पल प्रभु का ध्यान करता, इसके सिवाय प्रभु कृपा का कोई रूप नहीं बल्कि प्रभु की शरणागत अवस्था को ही मनुष्य जीवन का एक मात्र रूप या परिणाम कहा गया व माना जाएगा परमात्मा की सच्ची शरण ही मनुष्य जन्म को पाकर हर एक को सच्चा रास्ता दे कर हर समय प्रसन्न रख कर अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा सकती, केवल प्रभु शरण ही सब प्रकार मंगल रूप व हर अनिष्ट निवारण करने वाली बन सकती, प्रभु कृपा केवल हर एक का सब रूप से सब रूप में कल्याण सब अवस्था में व सब काल में करेगी परमात्मा का स्मरण ही सब कुछ रूप में सच्चा सहारा जीवात्मा का बन कर सच्चा फल देकर परमात्मा स्वरूप दर्शन करा कर प्रभु कृपा का पात्र बनाता होगा या नहीं? केवल प्रभु शरण ही जीवात्मा रूप मनुष्य व केवल प्रभु ही हर प्रकार से समर्थ रहा अथवा रहेगा, सब जीवात्माओं परमात्मा रूप ही तो है सब रूप में प्रभु का ध्यान कर ही तो सब प्रभु, हर रूप में सब कुछ प्राप्त हो सकता है, सब कुछ केवल प्रभु सब कुछ करने वाला, प्रभु! सब प्रकार सब कुछ देने वाला व केवल प्रभु ही हर बात का हर समय हर रूप से सब रूप सत्य प्रदान करे, भगवान्! केवल कृपा करो सब पर सब व केवल प्रभु ही सब को दया कर, सब का कल्याण ही हो सकता प्रभु, कृपा करो प्रभु! 262