भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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परमात्माका वियोग कभी किसी अवस्था विशेषमें नहीं होता, प्रत्युत परमात्माका वियोग सर्वथा असत् है? इसका उत्तर यह दिया गया कि उत्पत्ति और विनाश तो प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके होते हैं। प्रकृतिके कार्यके वियोगको तो हम वियोग मानते हैं, पर प्रकृतिके कार्यके साथ परमात्माका जो नित्य योग है, उस नित्य योगको नहीं मानते। यद्यपि प्रकृतिका कार्य और नित्य तत्त्व दोनों एक हैं, दोनों सत् हैं, प्रकृतिके कार्य और जीव का नित्य सम्बन्ध केवल परमात्माके साथ ही है। जब जीव परमात्माका स्वरूप ही है तब जीव परमात्माका अंश होकर भी परमात्माके वास्तविक तत्त्वको नहीं जान रहा केवल इस बात को, इस मूल बात को, इस तत्त्वको जान लेनेपर अज्ञानका नाश हो जायगा। मनुष्य जब तक इस प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर रख रहा है तबतक परमात्मासे अलग ही बना रहेगा। पर जब यह मान लेगा कि 'मैं केवल ईश्वरका हूँ? मेरा ईश्वर ही सब कुछ है? केवल मेरा प्रभुके साथ ही नित्य सम्बन्ध है? साधक जब केवल परमात्माको अपना मान लेता है तब वह प्रकृतिको अपनेसे अलग कर देता परमात्माको सब कुछ मान लेनेसे ही, यह जीव प्रकृति-संसारके बन्धनसे छूट जायगा। जब-- परमात्माको ही अपना मान ले, तो उसका मन, उस जीवका मन--चित्त सब कुछ ईश्वरके चरणोंमें लग जाय। फिर वह ईश्वरके चरणोंमें लीन होकर ईश्वरके साथ एक हो जाय तब वह ईश्वरके साथ सम्बन्धका रस पाने लगे तब वियोग कहाँ? परमात्मा तो सब जगह परिपूर्ण हैं। इस प्रकार जब वह परमात्माके स्वरूपको जान लेता है तब वह, केवल उस भगवान्के ध्यानमें रत रहेगा। जब ऐसा जान लेता है तब वह जीव सब जगह और सब कालमें परमात्माकी सत्ताका ही अनुभव करने लगेगा। जब परमात्माको सब कुछ समझता है तब वह संसारको ईश्वरका स्वरूप ही मानेगा। अतः, वियोगकी सम्भावना कहाँ रही? ईश्वरकी सत्तासे अलग न संसारका अस्तित्व है और न उस जीवका स्वरूप ही? जब सब भगवान् ही हैं तब परमात्मासे भिन्न क्या रहा? जब सब भगवान् ही हैं? केवल यह न जाननेके कारण ही जीव इस मिथ्या वियोगका अनुभव कर रहा है। जब वह इस बातको समझता है कि भगवान्के सब ओर होनेपर भी जो जीव अपनेको भिन्न मान रहा है उसका कारण उसका यह अज्ञान ही है कि वह भगवान्को अपनेसे अलग समझ रहा है, इसीसे वह भटक रहा है, पर जब, ज्ञान उत्पन्न होनेपर वह अपने स्वरूपको भी उस स्वरूपका ही अंश मानने लगता है तब उसका जन्म-मरणरूप यह सब प्रपञ्च नष्ट हो जाता है। सब कुछ परमात्माका ही अंश होनेके कारणसे ही, सबमें एक ही, उस एक परमात्माका अंश ही व्यापक होनेसे परमात्मासे अलग कोई नहीं है, परमात्माका स्वरूप सबमें व्यापक है। अतएव, परमात्माका नित्य-योग स्वाभाविक रूपसे सबके भीतर वर्तमान होनेपर भी अज्ञान, भ्रमके कारण उस नित्यको न जाननेसे जीव इस संसारके नश्वर सुखको ही सुख समझता रहता है। वास्तवमें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, उस ईश्वरके सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं! जब नित्य-तत्त्व ही सब जगह व्याप्त है तब जीवका यह जो वियोगका भाव है, वह केवल भ्रमके कारण ही है। जब मनुष्य अपने आपको इस भ्रमसे छुड़ा लेता है तब वह इस बातको समझ जाता है कि परमात्माका वियोग सर्वथा असत् है। सब ओर और सब समयमें केवल वही एक परमात्मा ही परमात्मा व्यापक हैं। इस प्रकारके तत्त्वज्ञानसे सब भ्रम दूर हो जाते हैं। परमात्माका कभी किसीके साथ वियोग नहीं होता। प्रत्युत परमात्माका वियोग केवल उस अज्ञानी व्यक्तिके मनमें ही रहता है। परमात्माका स्वरूप सर्वथा अखण्ड है। जो मनुष्य संसारके प्रपञ्चमें फँसा रहता है और भगवान्के स्वरूपको भूल जाता है, वह अज्ञानके कारण अपनेको परमात्मासे अलग मानता है, पर जो मनुष्य ईश्वरका भजन-कीर्तन करता है और भगवान्के स्वरूपका ध्यान करता रहता है वह इस संसारके आवागमनसे मुक्त होकर उस परमधामको प्राप्त कर लेता है जहाँ परमात्माका नित्य-योग रहता है! इस प्रकारसे जब मनुष्य अपनेको सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर देता है तब वह इस संसारके सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जब तक मनुष्य अज्ञानमें फँसा रहता है तबतक वह इस बातको समझ नहीं पाता कि उसका ईश्वरके साथ नित्य सम्बन्ध है, परन्तु जब भगवान्की कृपासे उसके भीतर ज्ञानका प्रकाश होता है तब वह सब संशयोंसे मुक्त हो जाता है। अतएव परमात्माके साथ कभी किसीका वियोग हो ही नहीं सकता। परमात्मा सर्वत्र और सब समयमें विद्यमान हैं। मनुष्यको चाहिये कि वह अपने सारे सांसारिक कार्य परमात्माके निमित्त करे और अपने चित्तको केवल परमात्माके ध्यानमें लगाये रखे। 264