भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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क्या यह संभव अथवा उचित समझा जाय कि मनुष्य जिस कामके करनेकी चेष्टा करे, केवल उसीका फल विचारशील बनकर भोगे अथवा अपने किये हुए उस काम विषयक अपने विचारके अनुकूल ही फल भोगे? प्रत्येक काम हमारी कार्यप्रणालीके अनुकूल ही समाप्त हो जायगा यह कभी संभव नहीं होता। हम जो कर्म करते हैं वह सब एक ही निश्चित परिणतिके अनुकूल नहीं होता, वरन् बहुधा ऐसा होता है कि हम जो काम जिस रूपमें करना चाहते हैं वह किसी न किसी रूपमें सर्वथा विपरीत ही हो जाता और न तो विचार, न इच्छा और न उद्योगकी क्रिया ही उस कामके परिणामको रोक सकती। तब क्या यह उचित समझा जाय कि केवल विचारके ही अनुसार फल दिया जाय? नहीं। जब मनुष्यका उद्योग सर्वथा अपनी कार्यप्रणालीके अनुकूल ही फल न ला सका तब विचारके अनुकूल फलकी आशा करना सर्वथा पागलपनके सिवाय और क्या कहा जा सकता है? कदाचित् यह कहा जाय कि यदि फलकी कार्यप्रणालीसे विचारकी प्रणालीको सर्वथा पृथक् कर दिया जाय तब तो इस विचारको निरर्थक और मनुष्यके ऊपर न केवल एक अत्याचार बल्कि अपने किये हुए कर्मके फल भोगनेमें भी सर्वथा अन्याय ही माना जायगा। तब इसका समाधान यह हो सकता है कि मनुष्यके विचारको हम सर्वथा व्यर्थ नहीं समझते, वरन् इतना अवश्य कह सकते हैं, कि उस फलका उद्योगके साथ कुछ तो संबंध अवश्य होना चाहिये। मनुष्यका विचार चाहे जो कुछ भी अपने उद्योगके संबंधमें रहा हो, यदि उस उद्योगके फलके रूपमें कोई परिवर्तन न हो तो विचारकी सत्ता सर्वथा व्यर्थ है, इसमें संदेह नहीं। प्रत्येक उद्योगके साथ जो जो विचार लगा हुआ रहता है उसके संबंधमें यदि यह देखा जाय कि विचार, उद्योगके साथ सर्वथा पृथक् अथवा संबंधित रहता है तब इसका निर्णय केवल यह होगा, कि प्रत्येक उद्योगके साथ विचारका संबंध अवश्य रहता है और उद्योग केवल मनुष्यके विचारका कार्य ही नहीं है, बल्कि उद्योगका एक रूप भी है। इस विचारका जो फल उद्योगके साथ संबंधित देखा जाता है वह फल तो कर्मके साथ उद्योगके परिणाममें आ ही नहीं सकता। उद्योगके फलसे पृथक् यह विचारका फल कर्मके साथ सर्वथा संबंध न रखनेपर भी उद्योगके साथ संबंध रखता ही है, और विचारका फल सर्वदा कर्मके फलसे पृथक् ही हुआ करता है, उद्योगके साथ विचारके संबंधका जो फल होता है उसका संबंध केवल विचारके ही साथ होता है, उद्योगके कर्मके साथ उसका कोई भी संबंध नहीं हुआ करता। अतएव यह मानना ही पडेगा कि फल उद्योगका सर्वथा पृथक् है और विचारका पृथक्। उद्योगका फल केवल कर्मके साथ उद्योगके संबंधका फल है--जो कर्मके फलके अतिरिक्त दूसरा और कुछ नहीं हो सकता, और विचारके फलके साथ कर्मके संबंधका जो फल होता उसका संबंध सर्वथा विचारके साथ ही रहता है। अतएव इस विचारके फलका कर्मके साथ कोई प्रत्यक्ष संबंध न होनेपर भी यदि यह मान लिया जाय कि विचारका फल और कुछ नहीं, केवल उद्योगका फल है तब समझना चाहिये कि हम फल उद्योगका नहीं वरन् विचारका ही फल पाते हैं और उद्योगका फल तो केवल प्रत्यक्ष रूपसे दिखाई देनेके सिवाय और कुछ नहीं-- विचारका फल केवल विचार, उद्योगका फल केवल उद्योग ही नहीं। इस विचारके फलको हम एक दृष्टांत द्वारा--अदालतके एक मुकद्दमेके संबंधमें, एक वकीलके उद्योगके दृष्टांत द्वारा समझ सकते हैं, कि वकीलका जो काम है वह कर्म है और उसका जो उद्योग है वह उसका फल उद्योगका फल होगा? अथवा उसके अपने विचारका फल होगा? अथवा दोनोंका? एक वकील अदालतमें इस विचारसे जाता है, कि वह अपने मुवक्किलको जिता देगा, और इस विचारके अनुसार वह उद्योग भी करता है पर उसका मुवक्किल... अवश्य हारता है तब वकालत का, जो केवल कर्म उद्योगका फल है वह विचारके सर्वथा विरुद्ध कर्मके रूपमें प्रत्यक्ष हुआ। यदि यह कहा जाय, कि वकीलका जो विचार था उसका फल वकीलको मिला और वकालतके उस वाद-प्रतिवादका उद्योग केवल फलके रूपमें था तब तो इस वाद-प्रतिवादका फल वकीलको हारनेपर भी प्राप्त हुआ और यह उद्योग सफल हुआ, यदि ऐसा मान लिया जाय तब वकीलके इस फल विचारका रूप भी उस विचारके प्रतिकूल ही समझना पडेगा और कर्मके विरुद्ध फलका होना मानना पडेगा। अतएव इस दृष्टांतसे यह सर्वथा स्पष्ट सिद्ध होता है कि उद्योगके साथ जो विचारका, उद्योग और फलके साथ संबंध होता है वह सर्वथा पृथक् है। वकीलके मुवक्किलकी हार कर्मके साथ उद्योगके फलका संबंध है और उस संबंधका फल विचारसे सर्वथा पृथक् हुआ है! यद्यपि वकील यह, कि उसका मुवक्किल निर्दोष है और वह निर्दोष होकर छूट जायगा और वकील उसको निर्दोष प्रमाणित करनेके लिये वकालत करता है, यद्यपि वह जानता है कि उसका मुवक्किल चोर है, तथापि वकालत करता है, यद्यपि वकील इस विचारके अनुसार उद्योग करता है और उस उद्योग-संबंधी विचारका फल अपने उद्योगके फलके साथ प्रत्यक्ष देखता भी है तब भी वह कर्मके फलके साथ विचारके फलका कोई संबंध नहीं देखता?

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