भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 322 में से

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जितने प्रत्येक परमाणु रूप से सब जगत् भरा साधिकार होकर रहता तिनका जो भोग्य सो भी सब विचार कर, त्याग किया था सो भी अपना सा, सो यह अज्ञान रूपी पिशाच सर्व को व्याप रहा सो विचार का प्रभाव ऐसा कि स्वरूप-ज्ञान उत्पन्न हुआ सो भोग्य त्याग को भी अविद्या का विलास जान कर भोग को भोग्य कैसा? त्याग कैसा? भ्रम मात्र जो त्याग, भोग रूप विकल्प का अवलम्बन था सोई अज्ञान था क्योंकि जो सब ब्रह्म ही का स्वरूप भास भया तब स्वरूप विश्राम-अविश्राम दोनों समान प्रतीत हो गये सो सर्व त्याग आत्म स्थिति का हेतु नहीं यह जो पर से पर तत्त्व साक्षात्कार रूप है सो स्वरूप स्थिति आत्मिक पद को प्राप्त भया कि जिस पद को प्राप्त होकर महा पुरुष ज्ञानी स्थित होते हैं सो पदवान्, रूप भया सो भी आत्म विचार, ज्ञानवान् हुआ, विदेह मुक्त हो, अकलंकपद हुआ, सो यह अज्ञान को तर गया सो मन के जीते मन जीता जब राजा के अज्ञान का अभाव भय तब ज्ञानवान् हो कर राज्य भोग करने लगा! भोगों को भोग्य जान कर न भोगे और न त्याग इच्छा करे? अज्ञानी की नाईं भोगों को भोग करता दृष्टिवन्त भासे किन्तु हृदय करके राजा सो स्वरूप की महिमा को प्राप्त भया। इति-श्री योग वा० वि० उप० चु० भो० हे राम! इस पर विचारपूर्वक देखो कि यह मन मन के जीते वश होता है वा न होता? हाँ, जो नर सर्व त्याग करके वन में जावैं सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग करके भिक्षा मांगें सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग करके वन में मौन साधे सो क्या? हे राम, जो नर सर्व त्याग कर काष्ट मौन साधे सो क्या? हे राम, जो नर अन्न, फलाहार, त्याग कर केवल पवनहार करे सो क्या? हे राम, जो नर नग्न हो कर शीत घाम भोगे सो क्या? इन से ज्ञानी नहीं कहाता और न अज्ञान तरता है? ज्ञानी वही है जो समता अवलम्बन कर केवल साक्षी रूप जान संसार व्यवहार करता हुआ सम बुद्धिमान् होकर न राग करे न द्वेष करे केवल साक्षी रूप जाने सो ज्ञानी है। त्याग वही जिस से वासना का क्षय हो सो त्याग उत्तम है। त्याग केवल एक देह से सम्बन्ध का जो क्रिया रूप हो सो त्याग अज्ञान है। त्याग केवल वासना रूप त्याग को कहा है। राजा चूड़ाला के त्याग मात्र से स्वरूप स्थिति न पाई, पर जब विचारपूर्वक वासना का क्षय किया तब स्वरूप स्थिति पाई, सो ज्ञानवान् राजा व रानी दोनों परस्पर यथार्थ ज्ञान के धारक थे और निष्काम होकर राज करते थे। दोनों का चित्त सम था। वासना शून्य, व न वासना करके भोग को भोगा था, न वासना करके त्याग को ही अङ्गीकार किया था, यह जो वासना का नाश सो त्याग और जो वासना सहित त्याग कैसा? वासना का त्याग सर्व त्याग है॥ राम उवाच॥ हे भगवन्! सर्व त्याग कर जब राजा वन में प्राप्त हुआ था तब क्या न त्याग हुआ, जो केवल देह से सम्बन्ध था वह तो त्याग किया था पर मन का त्याग न हुआ॥ श्री वसिष्ठ उवाच॥ हे राम! स्वरूप साक्षात्कार जो है सो आत्म विचार से होता है, कर्म उपासना मात्र करके नहीं, सो देह चेष्टा मात्र को कर्म उपासना कहते हैं। आत्म साक्षात्कार सो, जो चित्त के द्वारा साक्षात्कार रूप घट पट होता है सो नहीं, जो केवल देह चेष्टा व कर्म आदि क्रिया का त्याग सो त्याग नहीं कहाता॥ वसिष्ठ-उवाच॥ हे राम! जब राजा वन को गया, भोग-विलास छोड़े थे! राजपाट छोड़ा था सो त्याग सत्य नहीं था अज्ञान के कारण से सर्व त्याग कर वन में जा कर कन्द मूल खाता था पर वासना सत्य मन में थी, तब वासना का त्याग न हुआ, कर्म ज्ञान, जो चित्त घट--पटादि रूप हो कर ज्ञान का प्रकाश करता सो सत्य अज्ञान ज्ञान हुआ, ज्ञान के न होने से सर्व त्याग का क्या फल? वासना के नाश हुए बिना त्याग रूप भी जो त्याग कहाता सो वह स्वरूप स्थिति सिद्धि का कारण नहीं कहाता॥ हे राम! सर्व त्याग सो कहाता है॥ वासना अहङ्कार सहित चित्त जो अहङ्कार वासना से हीन हो कर साक्षी रूप हो, सो सर्व-त्याग कहाता है। जब चित्त की सर्व वासना-रूपी क्रिया क्षय होगी तब चित्त साक्षी भाव को प्राप्त होगा! फिर कैसा? आकाशवत् सर्वव्यापी रूप निर्विकल्प शुद्ध सच्चिदानन्द रूप जो निष्प्रपञ्च अहङ्कार से रहित पद है सो, निश्चय आत्मा स्वरूप है, चिन्मात्र है, परमानन्द सर्व का अधिष्ठान है, सो उस स्वरूप ज्ञान का स्वरूप सत्य त्याग चित्त का वासना से हीन होना है। सो त्याग कैसा है? सब वासना संकल्प रूपी सब जगत् को सर्व-प्रकार से त्याग करे, देह-इन्द्रिय के सर्व भोगों को, संकल्प-विकल्पों को क्षय करके शुद्ध परमात्म पद में स्थित, शुद्ध ज्ञान रूप मन का जो वासना रूपी त्याग सोई सर्व त्याग जान कर शुद्ध ज्ञानी कहाता सो राजा को न हुआ॥ 273