एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइसका फल यह होगा कि सदा काल के संसारी जीव भी मोक्ष पद को प्राप्त कर सकते हैं। फिर क्या जो जीव कभी मोक्ष नहीं जाता तथा सदा कर्म फल भोग भोगकर दुख भुगतेगा। इस बात पर विचार करने से सिद्ध हुआ कि संसार अनादि सांत नहीं हो सकता व प्रत्यक्ष ऐसा तो सब सज्जन मानते ही सांख्यकार ने कहा, कि संसार का जो नाश पद सांख्य सिद्धान्त में कहा है वह सांख्य के मत अनुसार केवल प्रकृति का पुरुष से वियोग होना ही मोक्ष होना है। इसी प्रकार से अन्य दर्शन भी मानते हैं कि जीव जब मुक्ति में जाता है, संसार कहां? संसार से छूट ही जाता है। इस प्रकार से सांख्य मत में जीवात्मा का नाश तो सिद्ध नहीं होता केवल मोक्ष में जा के संसार के दुखों से छूट जाना कहा है। जैन मत में भी कर्म का फल भोगकर मुक्त हो जाने से कर्मों का नाश कहा है। कोई जीव ऐसा नहीं माना कि जो मोक्ष में न जावे सदा संसार में दुखों को भुगतता ही रहे। यदि कोई कहे कि जीव तो अनन्त हैं तो क्या वे सब मोक्ष में जा सकते हैं? हां जो चाहे जा सकता है जो मोक्ष के यत्न न करे वह नहीं जा सकता। यदि मुक्ति में सब जीव चले जावें तो संसार खाली हो जावे इस से कर्म व संसार कैसे अनादि सांत? इस विषय में? कोई जैन क्या कहे? हम सब जैन भाईयों से पूछते हैं कि? हे भव्य जीवो जो तुम सब को कहते हो कि कोई जीव ऐसा संसार में नहीं रहेगा जो कर्म भोग से कभी न कभी न छूटे, संसार का सब जीव उद्धार कर लेंगे। यदि सब कर्म भोगकर, संसार खाली हो गया तो क्या जैन मत में मोक्ष न, रहा वा मोक्ष की खाली रहा, कर्म फल वा ईश्वर का कर्म, फल का फल भी सदा नहीं रहा। अतः सिद्ध हुआ कि जो बात मुक्ति संसार विषय में जैन मत की है विरुद्ध सिद्ध हुई। अस्तु! हम तो यह, ही कहेंगे कि! संसार अनादि व मोक्ष अनन्त है। इस से सिद्ध हुआ कि संसार कभी खाली नहीं होगा। इस विषय में संशय न कीजिये। यद्यपि वे सब बात सत्य नहीं हैं, "सत्यम् ज्ञानम्, अनन्तं ब्रह्म, आनन्दं ब्रह्म, सनातनं ब्रह्म, अच्युतं ब्रह्म, विश्वातीतम्, विश्वं व्याप्य तिष्ठति, व्यापक सच्चिदानन्दं, निराकारं ब्रह्म, ज्योति स्वरूपं ब्रह्म, सर्वज्ञं ब्रह्म, सर्वेशं ब्रह्म, सर्वान्तरयामि, विश्वस्य, कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वस्य प्राणिनां, सर्वस्य सुखप्रदम्, सर्वस्य शरणम् वा अवलम्बनं च, सर्वेषां च पावनं, सर्वेषां च स्वामी, सर्वेषां च पतिः, सर्वेषां च सखा, सर्वेषां सुहृद्, सर्वेषां बन्धुः, सर्वेषां रक्षकः, सर्वेषां पालकः, सर्वेषां न्यायप्रदम्, निष्कामम्, सर्वव्यापकम्, सर्वव्यापिनम्, अजम्; मोक्ष प्रदम्, मोक्ष का दाता, मोक्ष का स्वामी।" इन विशेषणों-युक्त ईश्वर को, जैन लोग किस रीति से कह सकते हैं। इस विषय को हम संक्षेप में इस स्थान पर वर्णन कर देते हैं कि इन में से एक बात भी जैन मत में सत्य नहीं मानी जाती। क्या वे ऐसा कह सकते हैं? क्या जैनियों! तुम ऐसा कह सकोगे, कि? हम ऐसा मानते हैं, कदापि नहीं! अब विचार कीजिये कि, इन विशेषणों से, ईश्वर सम्बन्धी जैन मत में ईश्वर का होना व उसका प्रभाव कुछ भी सिद्ध नहीं होता। जब वे ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते तो ईश्वर के गुण, कर्म स्वभाव का मानना कैसा? जो जैन मत के, विचार से ईश्वर का होना सिद्ध नहीं होता तो जैन मत में, ईश्वर का होना प्रत्यक्ष नहीं माना, ईश्वर के गुण वा प्रभाव का होना प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकता। वे ईश्वर को स्वीकार ही नहीं करते तो वे, इस बात का यत्न क्यों करते हैं कि जैन धर्म में, ईश्वर का होना माना गया है। 275