एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान्के मुख का प्रकाश बढ़ चला था, केवल नयनों तथा अधरों द्वारा ही नहीं वरन् रोम रोम द्वारा यह दिव्य प्रकाश विस्तीर्ण होने लगा। वह अब मनुष्य का रूप त्याग चुके थे और विश्व को अपनी शरण में बुला रहे थे। उन्हें नमन करते हुए, "हेमवती नमः, महादेवी नमः, सर्वदा कल्याणकारिणी, सकल सिद्धि प्रदात्री, प्रकृति रूपिणी, नमोस्तु नमोस्तु" इस प्रकार की स्तुति करते हुए जो प्रार्थना की, वह इस प्रकार, साम्बके शब्दोंमें! "नमस्ते रुद्ररूप, नमस्ते कल्याणी रूप, नमस्ते सर्वशक्ति, नमस्ते सर्वज्ञता, नमस्ते सर्व- गति-मति, नमस्ते सर्वव्याप-अव्यापकारिणी, नमस्ते सर्वेश्वर ईश्वरी, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते सर्वदा, नमस्ते नमः! नमस्ते कल्याण-रूपिणी, नमस्ते शिवे, नमस्ते जगत्पिता के रूप! नमस्ते सर्वव्यापी-विभो, नमस्ते ईशा, नमस्ते ईशानी, महेश्वरा! जगत्के इन दोनोंको प्रणाम जो एकरूपतामें प्रवेश करचुके, अपनी इच्छासे अव्यक्त, अपनी सर्वव्यापकतासे, प्रकृति का रूप! केवल इतना कहा, दोनों हाथ जोड़कर जो, सिर झुका दिया था।" सकल दृश्य केवल प्रकाश द्वारा व्याप्त दिखाई दे रहाथा। केवल प्रकाश केवल प्रकाश जो प्रज्वलित हो रहा था। केवल एक स्वरूप उस प्रकाश का ही दिखाई पड़ने लगा, केवल उस प्रकाशका स्वरूप कैसा होगा भला? एक ज्योतिर्मय प्रकाश जो कि सब पर छाता गया, केवल उस प्रकाश, केवल उस प्रकाश द्वार सर्वत्र, प्रकाश ही प्रकाश ही प्रकाश छा गया! विस्मितभाव से खड़े सब लोग केवल उस तेज प्रभा की ओर, जो केवल एक, केवल एक ही दिशा सब ओर प्रकाश कर ही दिया था। केवल उस तेज प्रकाश का स्वरूप यह समस्त जन न केवल रूप ही देख रहा, केवल उस रूप को देख रहा? केवल एक रूप, केवल, केवल ही केवल प्रकाश दिखाई पड़ने लगा। यह सब केवल दृश्य प्रकाश हीथा। यह जो प्रकाश था यह, किसका प्रकाश था? इस प्रकाश को जो देखरहा था साम्बके उस स्वरूप द्वारा जिसे वह शिव-मय रूप मानकर ही प्रत्यक्ष ही देखरहा जन का मन, वह मन किसका! इस प्रत्यक्ष उस स्वरूपको क्या कहोगे यह? यह तो केवल रूप था, केवल एक स्वरूप मात्र! केवल रूप, केवल रूपी यह प्रकाश? प्रकाश का रूप, जो सब कुछ सब कुछ त्याग चुका? जो सब केवल अपने स्वरूप को त्याग केवल प्रकाशमय था, केवल प्रकाश रूप, क्या वह शिव? केवल रूप का जो दृश्य रहा, वह केवल रूप ही रूप प्रकाश तथा केवल रूप प्रकाश को केवल एक उस रूप को जो सब रूप त्याग कर सब कुछ रूप, केवल एक ही उस तेज--मय प्रकाश? केवल यही रूप? क्या रूप यही? केवल एक रूप केवल। यह जो सब कुछ था सब कुछ त्याग चुका तथा केवल रूप सब जगत त्याग कर, सब जगत रूप सब कुछ त्याग कर केवल यह केवल प्रकाश स्वरूप था, केवल यह स्वरूप यह रूप क्या? यह केवल स्वरूप, केवल स्वरूप सब जन देख रहाथा, सब समस्त ही स्वरूप उस प्रकाश द्वारा सब रूप त्याग रहाथा केवल, उस केवल रूप स्वरूप को सब जगत देखरहा, यह सब प्रकाश स्वरूप का दृश्य। यह प्रकाश केवल स्वरूप प्रत्यक्ष स्वरूप सब कुछ त्याग कर उस स्वरूप, जिस का स्वरूप सब कुछ त्यागकर ही स्वरूप में बदल गया केवल उस रूप स्थान सब को केवल प्रकाश स्वरूप केवल रूप त्याग कर केवल प्रकाश रूप स्वरूप त्याग कर, केवल रूप ही जो त्याग केवल त्याग सब जन सब न सब मात्र। केवल एक ही, केवल ही सब कुछ सब को त्याग रहाथा, केवल त्याग मात्र यह रूप था? स्वरूप का केवल त्याग त्याग था, केवल त्याग का केवल त्याग था? सब केवल त्याग त्याग सब को केवल त्याग को ही रूप का त्याग सब त्याग जन का मन ही केवल त्याग। इस स्वरूप का रूप यू.टी.आईके रूपमें सब देखरहा होगा, केवल इस स्वरूप का रूप? इस स्वरूप का स्वरूप क्या? यू.टी.आई का केवल रूप क्या था, सब लोग उस त्याग स्वरूप को स्वरूप को त्याग के ही रूपमें, प्रत्यक्ष का केवल उस त्याग स्वरूप का त्याग देखा? जिस को देखा वह रूप था क्या त्याग का रूप या यह त्याग स्वरूप का स्वरूप था? केवल स्वरूप का स्वरूप ही त्याग रूप था? सब जन जो देखरहा, केवल त्याग मात्र ही त्याग सब जन देखरहा तथा इस यू.टी.आई स्वरूप का त्याग स्वरूप त्याग कर त्याग ही त्याग सब त्याग त्याग सब का सब जन सब त्याग 278