एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार जो जीव इस कर्मोदयके उदय कालके परिणाम करता है उन परिणामोके निमित्तसे आगामीकालमे कर्मबंध होता है इसलिये आत्मा कर्मके निमित्तसे इस संसारमे परिभ्रमण करता हुआ दुःखरूपी ज्वालासे जलता रहता है। अब कर्मका उदय कैसा होता है? इस बातको स्पष्ट रीतिसे समझाते हैं। प्रथम ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, इन चारों घातिया कर्मोंमेसे सर्वघाती-प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभाग बंधके पीछे जितने काल पर्यन्त बंधके योग्य स्थिति रहती है उसका प्रथम समयमे ही जो आबाधा कालका नियम है उस समयमे उस कर्मप्रकृतिके परमाणुओकी रचना करता हुआ स्थिति आबाधा कालके समाप्त होते ही प्रथम समयमे उदयमे आनेके योग्य स्थिति रचनाको करता हुआ बंध समयमे सर्व अनुभागको घटाता हुआ उस आबाधा कालमे सर्व अनुभागको न्यून करता है। इसतरह सर्वघातिया कर्मोंकी स्पर्धक रचना होती है। जो कर्म बंधके समय जैसा अनुभाग बंधा था वह उदयके समय उतनाही फल देता है। केवल ज्ञानावरण, केवल दर्शनावरण, निद्राद्विक, पंचम अंतराय, इन नौ प्रकृतियोंके बंधके समयका सर्व अनुभाग उदीरणाके समय सर्व अनुभागको उदयमे आनेके योग्य करता हुआ उदयमे आता है। बंधके समय जिस कर्मका जघन्य अनुभाग बंधा था वह उदयके समय जघन्य फल ही देता है। उत्कृष्ट अनुभाग बंधा था वह उत्कृष्ट फल ही देता है। इस प्रकार ज्ञानावरण आदिक कर्मोंकी रचनाका क्रम समझना चाहिये। भावार्थ-इस तरह जीवके मिथ्यात्व आदिके निमित्तसे बंधे हुये कर्मोंकी आबाधा समाप्त होकर उदय होता है। यदि यह जीव अपने परिणामोंको शुद्ध रखे तो नूतन कर्मोंका बंध न हो। कर्मोंका उदय आयेगा और अपनी स्थिति पूर्ण कर खिर जायगा। इसलिये हे चेतन ! अपने परिणामोंको शुद्ध कर ! आगामी आनेवाले कर्मोंसे आत्माका कोई संबंध न रहे। उदयमे आये हुये कर्म तुझे कुछ भी कष्ट नहीं दे सकते। अब आचार्य कहते हैं कि, जिसप्रकार ज्ञान चेतनाके द्वारा कर्मोंका नाश होकर मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसीप्रकार अज्ञान चेतनाके द्वारा यह जीव कर्मबंधको करता हुआ संसारमे परिभ्रमण करता है। अज्ञान चेतनाके दो भेद हैं-एक कर्मचेतना और दूसरी कर्मफल चेतना। इनमेंसे कर्मचेतना तीन प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञानी जीव मन, वचन, कायकी क्रियाको करता हुआ यह परिणाम करता है कि मैं इस कार्यको करता हूँ, दूसरा अज्ञानी यह परिणाम करता है कि मैं इस कार्यको कराता हूँ, तीसरा अज्ञानी यह परिणाम करता है कि जो दूसरा इस कार्यको कर रहा है वह बहुत अच्छा कर रहा है। इसप्रकार जीव मन, वचन, कायकी क्रियामे रत हुआ अपनेको कर्ता मानता है। यद्यपि जीव कर्मका कर्ता नहीं है तथापि अज्ञानके कारण अपनेको कर्ता मानकर कर्मबंधको करता है। कर्मफल चेतनाके भी तीन भेद हैं-एक अज्ञानी जीव सातावेदनीय कर्मके उदयसे प्राप्त हुये इष्ट संयोगोंमे सुखी होता है, दूसरा असातावेदनीय कर्मके उदयसे प्राप्त हुये अनिष्ट संयोगोंमे दुःखी होता है, तीसरा समभाव धारण करता है। इसप्रकार सुख, दुःख और समता परिणामके निमित्तसे अज्ञानी जीव कर्मोंका बंध करता है। तात्पर्य-अज्ञानी जीव मन, वचन, कायकी क्रियाओंको अपनी क्रिया मानता है, जिससे कर्मोंका बंध होता है। वास्तवमे अज्ञान चेतनाके कारण यह जीव कर्मोंके निमित्तसे होनेवाले सुख दुःखादिको अपनी आत्माका स्वरूप मान लेता है, इसलिये इस अज्ञान चेतनाको कर्मफल चेतना कहते हैं। जो जीव कर्मोंके निमित्तसे उत्पन्न हुये सुख-दुःखको भोगता हुआ अपने स्वरूपको भूल जाता है वह अज्ञान चेतनाका धारक है। इसप्रकार अज्ञान चेतना तीन प्रकारकी है-कर्म चेतना, कर्मफल चेतना और अज्ञान चेतना। इन तीनों प्रकारकी अज्ञान चेतनाओंका त्याग करके प्रत्येक भव्यजीवको ज्ञान चेतनाको ग्रहण करना चाहिये। जैसे कोई कामी पुरुष काम चेष्टाओंसे उत्पन्न हुई तृप्तिको ही सुख मानता है, वैसेही यह अज्ञानी जीव कर्मफल चेतनाके कारण अपने आत्माके स्वरूपको भूलकर अन्य बाह्य पदार्थोंमे सुख मानता है। कर्मफल चेतनाके कारण कर्मका उदय आनेपर जीव सुखी दुःखी होता है, कर्म चेतनाके कारण शुभ वा अशुभ कर्मोंको करता हुआ अपनेको कर्ता मानता है, अज्ञान चेतनाके कारण अपनेको देह स्वरूप मानता है, इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको उचित है कि वे कर्म चेतनाको भी त्यागें, कर्मफल चेतनाको भी त्यागें और अज्ञान चेतनाको भी त्यागें तथा ज्ञान चेतनाको अंगीकार करें। ज्ञान चेतनाके द्वारा ही संसारके कारणभूत कर्मोंका क्षय होता है। ज्ञानी जीव अपनेको शरीर स्वरूप नहीं मानता, कर्मोंका कर्ता नहीं मानता और कर्मफलका भोक्ता नहीं मानता। वह तो केवल ज्ञाता दृष्टा मात्र रहता है। इसलिये वह नवीन कर्मोंका बंध नहीं करता तथा पूर्वबद्ध कर्मोंकी निर्जरा करता है। यद्यपि ज्ञानीके भी राग-द्वेष होते हैं तथापि वह उन राग-द्वेषके परिणामोंको अपना स्वरूप नहीं मानता। वह जानता है कि ये सब पुद्गल कर्मके विपाक हैं। भावार्थ-जो जीव अज्ञान चेतनाको छोड़ देता है वह ज्ञानी है। ज्ञान चेतनाके प्रकट होनेपर आत्माको यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति होती है। उस समय जीव अपनेको देहादिकसे भिन्न, परभावोंसे भिन्न, ज्ञाता दृष्टा मात्र अनुभव करता है। यही ज्ञान चेतना सम्यग्दर्शन आदिकी साधक है। यद्यपि ज्ञानीके भी अज्ञान चेतनाका सद्भाव पाया जाता है तथापि वह ज्ञानीके परिणाम नहीं हैं, इसलिये ज्ञानी, कर्मफलको भोगता हुआ भी अलिप्त रहता है। अज्ञानी अज्ञान चेतनाके कारण बंधको प्राप्त होता है। इस अध्यायमे प्रथम अधिकारका वर्णन किया गया। 292