एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार जब विश्वामित्र का प्रभाव बहुत बढ़ गया अथवा उनके प्रभावकी सीमा का पार न रहा तब यह बात सब ओर फैल गई। सब-जगह लोग विश्वामित्र के इस काम की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। वशिष्ठजी का यह द्वेष देखकर देवराज इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचते थे कि वशिष्ठजी को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर कोई विकार छू--तक नहीं सकता था, पर वे इस बात पर ध्यान न देकर विश्वामित्र को सता रहे हैं। क्या वशिष्ठजी मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? विश्वामित्र महात्मा वशिष्ठ की बात सुनकर अपने घर चले गये। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र को फिर कामधेनु के लिये बहुत तंग किया। वशिष्ठजी ने उनसे कामधेनु को छीना। विश्वामित्र ने सोचा, यह वशिष्ठजी बड़ा भारी अनर्थ कर रहे हैं। अब राजा विश्वामित्र ने इस बात का निश्चय किया कि मैं अपने बल से कामधेनु को वापस लाऊँगा। विश्वामित्र बहुत-से बाणों द्वारा वशिष्ठजी को मार-मारकर मार डालने लगे। वशिष्ठजी को विश्वामित्र ने बाणों से आच्छादित कर दिया। वशिष्ठजी ने मुसकराते हुए कहा, “हे राजन्! तू मुझे अपने बाणों से मारना चाहता है। तू क्षत्रिय-तेज से वशिष्ठ को पराजित करना चाहता है। यह असम्भव है। क्षत्रिय-तेज से ब्रह्म-तेज बहुत बड़ा है। यह कहकर वशिष्ठजी ने विश्वामित्र के बाणों को शान्त कर दिया। इस बात को सुनकर विश्वामित्र ने विचार किया, मैं ऐसा काम क्यों करूँ? उन्होंने सोचा कि मैं तप द्वारा वशिष्ठजी से ब्रह्मतेज प्राप्त करने का विचार करता हूँ, क्योंकि क्षत्रिय-तेज ब्रह्म-तेज के सामने कोई चीज नहीं है। इसलिए मैं तपस्या करूँगा। विश्वामित्र ने तपस्या आरम्भ कर दी। वे कठोर तपस्या करते-करते सब-कुछ छोड़कर वन में चले गये। विश्वामित्र ने ऐसा तप किया, जिस तप के प्रभाव से विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हो गये। जब इस बात का विश्वामित्र को पता लगा कि वशिष्ठजी मेरे से बहुत प्रसन्न हैं, इसलिए विश्वामित्र वशिष्ठजी के आश्रम में जाने का विचार करने लगे। वशिष्ठजी के आश्रम में जाने से पहले विश्वामित्र ने एक कुल्हाड़ी अपने पास रख ली। रात्रि का समय था। उस समय वशिष्ठजी ने अपनी पत्नी अरुन्धती से कहा, हे अरुन्धती! आज की रात बड़ी सुहावनी है। आज चन्द्रमा का प्रकाश बहुत ही अच्छा लग रहा है। अरुन्धती ने अपने पति वशिष्ठजी के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, महाराज! क्या बात है कि आज की रात सुहावनी दिखाई दे रही है? विश्वामित्र ने इस बात को सुना। उन्होंने अरुन्धती के वचनों को सुनकर सोचा कि वशिष्ठजी विश्वामित्र की प्रशंसा कर रहे हैं। वशिष्ठजी ने अपनी पत्नी अरुन्धती से कहा कि हे अरुन्धती! विश्वामित्र का तप विश्वामित्र के समान आज की चांदनी के समान चमक रहा है। यह बात विश्वामित्र ने सुन ली। विश्वामित्र ने वशिष्ठजी के चरणों पर कुल्हाड़ी रख दी। विश्वामित्र ने हाथ जोड़कर वशिष्ठजी से कहा, हे मुनिवर! विश्वामित्र को क्षमा कर दो। वशिष्ठजी बोले कि हे विश्वामित्र! यदि तुम पहले से ही ऐसा कर लेते तो आज तुम ब्रह्मर्षि बन जाते। जब तुमने वशिष्ठ को देखा तब तुम्हारे मन में एक बात थी और जब तुमने दूसरे को देखा तब तुम्हारे मन में दूसरी बात थी। जब तुम्हारे मन में दोनों बातें एक जैसी हो गईं तब विश्वामित्र ब्रह्मर्षि बन गये। विश्वामित्र ने वशिष्ठजी के चरण स्पर्श किये। विश्वामित्र ने सोचा कि वशिष्ठजी के चरणों में बड़ा भारी सुख है। विश्वामित्र के मन में कोई बात नहीं रही। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र को गले से लगा लिया। विश्वामित्र ने अपने मन में विचार किया कि जब तक संसार में मनुष्य अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करता तब तक वह कभी भी तरक्की नहीं कर सकता। जब मनुष्य किसी काम को अपना कर्त्तव्य समझकर करता है, तब उसका वह काम अवश्य पूरा होता है। जो मनुष्य अपने कर्त्तव्य को ठीक तरह से पूरा करता है, तब उसका यश संसार में चारों ओर फैल जाता है। ऐसे मनुष्य का नाम संसार में अमर हो जाता है। विश्वामित्र अपने कर्त्तव्य में लगे रहे। विश्वामित्र ने तपस्या की। विश्वामित्र ने अपने जीवन में तपस्या को मुख्य स्थान दिया। विश्वामित्र का यश चारों ओर फैल गया। विश्वामित्र ने सोचा कि मनुष्य का धर्म है कि वह अपने कर्त्तव्य का पालन करे। कर्त्तव्य का अर्थ है कार्य। जब मनुष्य अपने कार्य को भली प्रकार से पूरा करता है, तब वह संसार में यश प्राप्त करता है। विश्वामित्र ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र के कर्त्तव्य का पालन करने के कारण विश्वामित्र को अपने हृदय से लगा लिया था। विश्वामित्र एक तपस्वी थे। विश्वामित्र ने तपस्या के बल से ब्रह्मर्षि-पद को प्राप्त किया था। विश्वामित्र ने अपने जीवन में तपस्या को मुख्य स्थान दिया था। विश्वामित्र ने तपस्या के बल से संसार को दिखा दिया कि मनुष्य अपने कर्त्तव्य के बल से सब-कुछ प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार विश्वामित्र ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया। संसार में कर्त्तव्य का पालन करने से मनुष्य का यश चारों ओर फैल जाता है। मनुष्य को अपने जीवन में कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। कर्त्तव्य का पालन करने से मनुष्य का यश बढ़ता है। कर्त्तव्य का पालन मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। 295