एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउन्होंने उत्तर दिया, "इसका निश्चय तुम ही कर सकते हो कि न्यायालय किस बात को उचित समझता अथवा धर्म संगत कि हम ईश्वरकी आज्ञा मानें अथवा" सात्विकों हो ! परमात्मा किस बात को उचित समझता अथवा धर्म संगत मानेगा पश्चात्तापियों को तो इस विषय में कोई भ्रम हो ही नहीं सकता कि वे अपने प्यारे प्रभुकी आज्ञा मानेंगे या उनके जो निर्दोषों को तो सताते किंतु अपने को उस प्रभु का भक्त या सेवक बताने का दम्भ भरते हैं। यह बात भी; कि क्या सात्विक कहलाने वाले लोग अथवा वे लोग जो सत्य का दम भरते, वाद-विवाद से जन मन को भ्रमित अथवा उद्विग्न करना चाहते हैं? अथवा वे शांत हो जाते हैं? ईश्वर उनकी रक्षा करता? उनका यह मत था कि जब सब लोग वाद-विवाद को ही न केवल त्याज्य किन्तु अशांति का रूप मानते हों तो, वे शांति भंग करने वालों की सभा में न तो भाग लेते थे और अपनी सभा में उनको स्थान न देते थे। इसके साथ ही वे ? यह निश्चय कर ही चुके थे कि यह वाद--विवाद विवादकर्ताओं अथवा उनका अनु-- सरण करने वाले निष्कलंक जन के लिए नहीं, अपितु उन लोगों के लिए ही था जिनका लक्ष्य प्रभु सेवा अथवा प्रभु के आज्ञा अनुसार आचरण न होकर केवल विवाद ही था। इसके साथ ही यह निष्कर्ष भी, कि विवाद के विषय में तर्क वितर्क का कोई अन्त नहीं, जिससे जन मानस में भ्रम के अतिरिक्त, लाभ तो हो नहीं सकता कि केवल वाद विवाद अथवा द्वन्द्व उत्पन्न होता रहता था। फिर भी, यह विचारणीय रहा कि यह निर्णय या नियम-विधान उस जन संघ द्वारा निष्पादित सम्मत्ति सम्मत माना गया जिसे केवल प्रभु शरण और प्रभु के आज्ञा-पालन की अपेक्षा थी अथवा उन पर थोप दिया गया जो प्रभु की ओर से जन व जन के कल्याण के लिए केवल शान्ति चाहते थे। फिर भी, ईश्वर उनकी आत्मा-व्यवस्था को भली प्रकार से जानता था, जिन्होंने प्रभु आज्ञा को सर्वोपरि मानकर प्रभु के आदेशों द्वारा जन, जो सम्भवतः इस कारण वंचित किया गया समझा जाने लगा कि वे सात्विक विचारों तथा निष्ठा अथवा ईश्वर उपासक होने के अधिकारी हैं, जन हितैषी बनते हुए ही ईश्वर कृपा के योग्य स्वीकार किए। इस प्रकार यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि सात्विक जन प्रभु की सेवा और जन समाज के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ रहकर, निष्ठा पूर्वक प्रभु की इच्छा जानकर ही पद आगे बढ़ा सकते अथवा अपना कर्त्तव्य पालन सम्पन्न कर ही रहे थे। इससे सात्विक मत वाले व्यक्ति अपने ही प्रभाव को खोते जा रहे थे जिसकी वे कभी उप युक्त व्यवस्था या पद मान कर लाभ उठा रहे थे। इधर, जो जन सात्विकों व्यवस्था द्वारा या प्रभु की शरण आकर अपना कल्याण चाहते थे वे प्रभु की कृपा से, न केवल लाभ प्राप्त कर रहे थे वरन् प्रभु की असीम कृपा से धन्य भी हो रहे थे। वे लोग उन धर्म-ग्रन्थों द्वारा प्रभु की कृपा को जान पाए थे, जिसे वे सदा प्रभु कृपा का साधन ही समझते रहे थे अथवा मानते आ--रहे थे। इतिहास के आधार पर हम यह जान ही रहे हैं कि धर्मशास्त्रियों या अन्य जन, जो धर्मशास्त्रों को पड़े; स्वयं सात्विक जन तो प्रभु जन को ही प्रभु भक्तिकारी मान रहे थे, इस पर जोर दे रहे; फिर भी प्रभु का प्रभाव बढ़ रहा इतिहास के साक्षी धर्म शास्त्र हैं। प्रभु जन उनकी आज्ञा मानकर जन का कल्याण कर रहे थे और सात्विक लोग धर्मशास्त्रों द्वारा प्रभु की कृपा से वंचित हो जाने का भय भी जन समाज में फैलाकर समाज सुधार नहीं कर पा रहे थे, पर ईश्वर सत्य बात प्रभु जन द्वारा ही जनसाधारण तक, सात्विक धर्मशास्त्रियों द्वारा ही नहीं, वरन् सब साधारण जन द्वारा भी पहुंचा रहे थे जो प्रभु सेवा से सम्बद्ध थे या जो जनसाधारण द्वारा प्रभु के रूप तक पहुंच रहे थे। प्रभु के भक्त जन कृपा प्राप्त कर, ईश्वर आज्ञा का उल्लंघन न कर धर्मशास्त्रों को महत्व देते हुए धर्मशास्त्र अनुसार ही अपने पथ पर अग्रसर होकर प्रभु को ही प्रभु मानते हुए ही प्रभुकार्य सम्पन्न कर रहे थे। प्रभु जन को जब कभी सात्विक लोग सभा विचार-विमर्श में बुलाते थे तब वे उस जन सभा में उपस्थित होकर केवल प्रभु महिमा ही गाते थे, जन का हित कैसे किया जावे उस पर ही वे बल देते थे। जन सात्विक जन, प्रभुभक्त जन, सब प्रभु के प्रभुत्व स्वीकारकर, सत्यता पूर्वक प्रभु की सेवा करते हुए प्रभु के लिए अपने प्राणों को भी न्योछावर कर देने को तैयार रहते अथवा प्रभु का आज्ञाकारी आचरण ही श्रेष्ठ 301