भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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की दया, उनका प्रेम, उनका त्याग, इन सबके कारण जो स्थान इन लोगों का इन लोगों अथवा समकालीन जगत् के अन्य लोगों अथवा उनके परवर्ती लोगों के हृदय सिंहासन अथवा मानस में, प्रभाव रूप में था, कालान्तर में वह उनका स्वरूप न रहने पर भी, न केवल सुरक्षित रहेगा, प्रत्युत आगे चलकर जब लोग इस बात पर ध्यान देंगे, तब उनके प्रभाव का क्षेत्र और भी विस्तृत रूप में दृष्टि गोचर हो उठेगा, इस बात इसमें दो मत नहीं हो सकते और जो कुछ भी कहा गया, वह सब उनके समकालीन भी सत्य था। महापुरुषों के प्रभाव का क्षेत्र सीमित रूप से समकालीन कालजयी अथवा समस्त ही युग का होता है। उदाहरण रूप में जब स्वामी दयानन्द जी को ही लें, तो समकालीन तो जन समाज उनका था, पर उनका रूप क्या था और उनके प्रभाव स्वरूप ही उनका व्यक्तित्व था, उसका स्पष्ट रूप--उस रूप विशेष का प्रभाव व गुण--तो बाद वाले लोग भली प्रकार समझकर अपनाते चले आ रहे यथा मन पर जो छाप थी, कार्य कारण रूप दिखाई दे रहा स्वरूप स्पष्ट हो सकेगा। अतः जो कुछ स्वामी जी समकालीनता के संदर्भ में कहा! सब सत्य ही था, अतः जन मानस व पर प्रभाव समय बीतने कालान्तर में बना ही बना क्या रहेगा और अधिक उजागर होकर प्रकाश देगा, जो प्रेरणास्पद सिद्ध हो रहा है, यह निश्चित रूप जाना जा रहा इसलिए स्वामी जी, तत्कालीन सम्पूर्ण भारत देश के कोने-कोने में भ्रमण कर अपने ही नहीं, सामाजिक जीवन धार्मिक विचार धारा को ही एक नया स्वरूप दिया ही नहीं वरन् राजनीतिज्ञों को जागृत कर, जन आन्दोलनकारी बना ही तो रहे स्वामी जी देश को अमर कर जीवन दान दे कर चले; देश का जीवन बदले; उनके इस विस्तृत व्यक्तित्व को जहां तक, हो उजागर कर अपना लक्ष्य सिद्ध करें, यही सच्चा हमारा कर्तव्य "यथा शक्ति सब रूप से यथा ज्ञान यत्न से सब दिशा सफल करना" का नाम है। 303