एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलेकिन जब वो वापस अपने कमरे की ओर लौट रहे थे तब वे एक कोने में सिसकियों की आवाज सुनकर अपने कदम वापस मोड़ते हुए दो-दो सीढ़ियां फांद कर ऊपर वाली बालकनी पर पहुंचे तो वहां पर उनके बड़े भाई विनोद कुमार रो रहे थे।... रोते-रोते वे कह रहे थे कि बाबू जी, काश!... आपके पास अगर पैसा होता तो... वे सिसकते हुए कह रहे थे कि उनका सपना था कि वे एक सी ए बनें लेकिन सिर्फ अपनी गरीबी की वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, वो अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहे थे। विनोद भैया बी.कॉम. पास थे लेकिन परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वे सी.ए. की पढ़ाई कर सकें। वे अपने सपनों को यूं टूटते हुए नहीं देख पा रहे थे। विनोद भैया को रोते देखकर वे खुद नहीं रोये, पर उनके दिल को बहुत ठेस पहुंची, और उस दिन के बाद से विनोद भैया की रुलाई कैलाश के दिल पर पत्थर की तरह हमेशा-हमेशा के लिए जम गई। वो रात उनके लिए टर्निंग-प्वाइंट बन गई जिसने उन्हें आगे बढ़ने के लिए न केवल प्रेरित किया, पर यह अहसास भी कराया कि वे आगे बढ़ेंगे, पर तब ही जब वे बाबू जी, अपने परिवार को खुश रख सकेंगे, अपने परिवार के लिए कुछ ऐसा कर सकेंगे जिससे कि वे उन सभी जरूरतों को पूरा कर सके जिसकी आज कमी थी। कैलाश जी ने तय किया कि पढ़ाई तो आगे जारी रखनी ही है, लेकिन साथ-साथ परिवार की आर्थिक मदद भी करनी होगी। अब सवाल यह था कि पढ़ाई और काम में तालमेल कैसे बिठाया जाए और ऐसा क्या किया जाए जिससे कुछ आमदनी भी हो सके? उस समय, जब कैलाश जी दसवीं कक्षा में थे तब वे मात्र 15 साल के थे। उनके पास न तो कोई बड़ी पूंजी थी और न ही ऐसा कोई हुनर जिसके बल पर कोई बड़ा काम शुरू कर सकते। उनके पास था तो सिर्फ विश्वास जिसने हमेशा उनका साथ दिया। उन्हें पता था कि काम में शर्म कैसी और काम छोटा या बड़ा क्या होता है? और जब, इरादे नेक हों और दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो, रास्ता खुद ब खुद बन जाता है। उन्हें उन दिनों पता चला कि दिल्ली की एक जानी-मानी कंपनी में टाइपराइटर की मरम्मत का काम होता है और अगर वे यह काम सीख लें, तो इसे वे पार्ट टाइम कर सकते हैं जिससे उनकी पढ़ाई का हर्ज भी नहीं होगा और घर भी चल पाएगा। उन्होंने हिम्मत बांधी, उस कंपनी में पहुंचे और काम सीखने की गुजारिश की। कंपनी वालों को उनके इरादों और उनकी लगन पर भरोसा हो गया और उन्होंने कैलाश जी को काम सिखाना शुरू कर दिया। कैलाश जी ने लगन से काम सीखा और दो महीने में ही टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम सीख लिया। काम तो सीख लिया, पर टाइपराइटर कहां से लाएं और कैसे बेचें? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर खोजने में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। उन्होंने पुरानी दिल्ली के कबाड़ियों से टाइपराइटर खरीदने का मन बनाया। जेब में पैसे बहुत कम थे इसलिए कबाड़ियों से टाइपराइटर तो खरीदे जा सकते थे, पर कैलाश जी जब कबाड़ी की दुकान पर गए तो देखा कि वहां पर काफी संख्या में पुराने, खराब टाइपराइटर ऐसे ही पड़े हुए थे। कबाड़ी से बात करने पर पता चला कि बहुत-सी कंपनियों में टाइपराइटर खराब होने पर या उन्हें बदलने के लिए लोग इन्हें कौड़ियों के भाव बेच देते हैं। कैलाश जी के लिए यह फायदे का सौदा था। उन्होंने कबाड़ियों से खराब टाइपराइटर खरीदे और अपनी लगन और मेहनत से उन खराब टाइपराइटरों को ठीक किया और अपनी पहली कमाई का जरिया बनाया। उन्होंने तय किया था कि वे सिर्फ टाइपराइटर ठीक ही नहीं करेंगे, बल्कि अपनी कमाई से बाबू जी के ऊपर परिवार चलाने की जिम्मेदारी के बोझ को भी हल्का करेंगे। कैलाश जी जब टाइपराइटर ठीक करते थे तो इस बात का ध्यान रखते थे कि टाइपराइटर पूरी तरह से सुधरे, ताकि ग्राहक को कोई शिकायत न रहे। इसके साथ ही, वे इस बात का भी ध्यान रखते थे कि उनके किसी भी काम से उनकी पढ़ाई का नुकसान न हो इसलिए वे टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम केवल खाली समय में ही करते थे। अपने इस पार्ट-टाइम काम से जो आमदनी होती थी, उससे वे अपनी पढ़ाई का खर्च तो निकालते ही थे, साथ ही घर के खर्चों में भी बाबू जी का हाथ बंटाते थे। कैलाश जी का जीवन काफी व्यस्त हो चला था। वे सुबह कॉलेज जाते, दोपहर में टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम करते, शाम को घर लौटते और रात को पढ़ाई करते थे। अपनी कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने टाइपराइटर रिपेयरिंग के काम को धीरे- धीरे इतना बढ़ा लिया कि अब वे न केवल टाइपराइटर रिपेयर करते थे, बल्कि उन्हें ठीक करके बेचते भी थे। टाइपराइटर बेचने के लिए वे कंपनियों के दफ्तरों में जाते और उन कंपनियों को अपने टाइपराइटर दिखाते। अपनी इस छोटी-सी उम्र में कैलाश जी ने टाइपराइटर बेचने के बिजनेस को काफी अच्छी तरह से समझ लिया था। टाइपराइटर के साथ-साथ कैलाश जी ने देखा कि कंपनियों को कई और चीजों की भी जरूरत होती है जैसे टाइपराइटर के रिबन, कार्बन पेपर, स्टेशनरी आदि। कैलाश जी ने सोचा, क्यों न टाइपराइटर रिपेयरिंग के साथ-साथ इन चीजों की भी सप्लाई शुरू की जाए। बस, यह सोचते ही उन्होंने इन चीजों को भी अपनी सप्लाई में शामिल कर लिया और इस तरह धीरे-धीरे उनका 306