भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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संन्यास आश्रम का विचार ही न रहे तो फिर गृह, या अन्य आश्रमों का प्रयोजन क्या रहेगा, विचार ही विपरीत रीति का, या विपरीत परिणाम का होगा कि नहीं? सो इन सबका विचार जो जन न करके इस प्रकार का ही भाव निश्चय रूप विचार का निश्चय करते हुए इस जन्म में सब कुछ मान करके बैठते हैं, यह उनका विचार ही उनका विपरीत रूप में उत्पन्न होता है। सो इस सब का क्या रूप-रंग है सो तो इस जन्म रूपी समय में ज्ञान दशा में आ-सकना बहुत ही कम रूप लिए हुए ही माना है। ज्ञान का भी अधिकार विचार युक्त रूप से ही है-- अल्प रूप जन मात्र "न ज्ञानं न ध्यानं न च हरि कथा" इस प्रकार समझ कर अपने विचार को अल्प समझ कर अपने मन को ही सब कुछ मान कर सो सब जन रूप विचार का ही रूप अपने मन विचार में मान लेते हैं। एक जन ऐसा है, जो यह न समझ कर, न इस रूप को विचार कर, न इस रूप को, सब कुछ अपने मन का विचार ही मान कर, अपने मन को सब प्रकार से मन-माना ही रूप लिए हुए यह मान लेता है कि सब कुछ अपने ही विचार का रूप ठहरा हुआ है। न तो कोई ईश्वर का रूप है और न कोई रूप उसका जो माना हुआ है, न कोई गुरु का ही कुछ रूप विचार में आता है, सो यह सब रूप विचार का कुछ सत्य ही रूप लेकर ठहरा हुआ है। अपने विचार से अलग और कुछ नहीं है। न कोई ईश्वर है और न कोई उसका रूप है। न कोई गुरु है, न कोई संसार का रूप विचार का ठहरा हुआ है, सब विचार अपने मन के अनुसार ही मानना चाहिए। एक ऐसा; जो इस प्रकार अपने विचार, अभ्यास, अध्ययन तथा अपने विचार को, या उस ईश्वर को नहीं मानता, माया, संन्यास, सकाम, निष्काम, या अन्य किसी भी रूप को नहीं मानता तथा ईश्वर को ही सर्वव्यापी मान कर विचार करता हुआ यह, किसी रूप को भी नहीं मानता केवल ईश्वर के नाम को सर्वव्यापी मान कर सब प्रकार से ईश्वर को ही सर्वव्यापी मान कर अपने मन में जो कुछ मान लिया, सो ही सब कुछ मानता हुआ कहता है कि ईश्वर तो सब कुछ है, वह तो सब में है। एक ऐसा जन भी है, जिसने न ईश्वर को, संन्यास को वा उस रूप विशेष को कुछ भी नहीं माना है, न उस रूप को कुछ माना तथा न उस प्रकार के इस विचार को माना है कि ईश्वर का रूप ऐसा है, जो इस प्रकार अपने विचार को ही सब कुछ मान कर ठहरा हुआ है, सो ऐसा विचार भी विचार ही है। एक जन ऐसा है, "जो अपने विचार को आ-सकता हुआ कहे" जिस जन के इस प्रकार के सब विचार संसार में देखे जाते हैं जिसमें कोई अपने विचार को ही सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ यह भी विचार, सो इस प्रकार अपने विचार को ही ईश्वर का रूप मान कर अपने विचार का ही रूप संसार में देखता है। यह सब अवस्था, जो ईश्वर को नहीं मानते हैं अथवा किसी विचार को नहीं मानते हैं वे सब उस रूप को नहीं मानते जो कि ईश्वर का रूप कहा गया है। सो इस विचार को अपने मन में, ईश्वर का रूप अपने विचार का ही रूप ठहराया जाता है। ईश्वर का जो रूप माना जाता है वह सब अपने विचार का रूप है। इसलिए ईश्वर को सर्वोपरि, सर्वव्यापी मान कर ही सब कार्य करना चाहिए। 31